तीनोँ पुत्रियाँ सौभाग्यवती वासवी, ( .मौलिक व शौनक) सौ. लावण्या, (सिँदुर व सोपान ) सौ.मोँघी ( बाँधवी ) (कुँजम व दीपम ) ,परितोष , अम्मा और पापा जी के साथ १९ वेँ रास्ते खार, बँबई के घर के आँगन मेँ...
[ मेरी नानी जी कपिला गोदीवाला की गोद मेँ हूँ ]-
श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा
श्री गुलाबदास गोदीवाला जी तथा उनकी माता जी "मोटा बा" [मेरी पडनानी जी ]जो १०३ वर्ष की थीँ जब भरे पूरे परिवार के सामने चल बसीं ]
गताँक से आगे : ~~
मैँ उस समय भारत कोकिला श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी जी की एक फिल्म
" मीरा " हिन्दी मेँ डब कर रहा था और इस निमित्त से वह और उनके पति श्रीमान्` सदाशिवम्`जी बँबई ही रह हरे थे। बँधुवर नरेन्द्रजी ने उक्त फिल्म के कुछ तमिल गीतोँ को हिन्दी मे इस तरह रुपान्तरित कर दिया कि वे मेरी डबिँग मेँ जुड सकेँ। सदाशिवं`जी और उनकी स्वनामधन्य पत्नी तथा तथा बेटी राधा हम लोगोँ के साथ व्यावसायिक नहीँ किन्तु पारिवारिक प्रेम व्यवहार करने लगे थे.
सदाशिवं`जी ने बँबई मेँ ही एक नयी शेवरलेट गाडी खरीदी थी. वह जोश मेँ आकर बोले, " इस गाडी मेँ पहले हमारा यह वर ही यात्रा करेगा ! "
वह स्वागत समारोह भी अनोखा ही था. पँतजी ने अपनी एक कविता सुनायी तथा माननीया सुब्बुलक्ष्मी जी ने माँगलिक गीत गाये. वह दिन आज भी याद आ रहा है तो मेरी आँखेँ वे स्मृतियाँ लिखते हुए बरस रहीँ हैँ ! सपना हो गये वे दिन !
आज बँधु के स्वर्गवास के दसवेँ दिन यह सँस्मरण लिख रहा हूँ - इस दस दिनोँ मेँ मैँने उन्हेँ न जाने कितना याद किया है ! प्रतिभा की मृत्यु के बाद मैँ इतना कभी नहीँ रोया. बँधुवर नरेन्द्र जी अजातशत्रु थे ! अपने मीठे व्यवहार से उन्होँने सारी बँबई को एक प्रकार से बाँध लिया था. अवधी के ख्यातिनामा कवि स्व. बालभद्र दीक्षित " पढीस" की स्मृति मेँ हम दोनोँ के परम मित्र डो. रामविलास जी शर्मा के सँपादक्त्व मेँ लखनुउ से प्रकाशित मासिक पत्रीका " माधुरी" का एक विशेषांक प्रकाशित हुआ था। बँधुवरने , जो उन दिनोँ प्रगतिशील आँदोलन से जुडे हुए थे , किसी की स्मृति मेँ एक कविता लिखी थी, जिसकी एक पँक्ति अब भी मुझे याद है , " एक हमारा साथी था जो चला गया " --आज वही पँक्ति अपने परम प्रिय कवि नरेन्द्र शर्मा के लिये दोहरा कर प्रभु से यह कामना कर रहा हूँ कि अगले जन्म मेँ भी हमारा और उनका साथ हो ! नरेन्द्र जी की तीनोँ पुत्रियाँ सौभाग्यवती वासवी, सौ. लावण्या, सौ.मोँघी ( बाँधवी ) तीनोँ ही सम्पन्न और सुसँस्कृत परिवारोँ मेँ ब्याही हैँ बाल -बच्चोँवालीँ हैँ अब चि. परितोष अपनी माँ की सेवा करने के लिये अकेला है. राम करे, वह चिरँजीवी, चिरसुखी तथा चिर उन्नतिशील हो तथा अपनी माँ , मेरी प्रिय सुशीला बेन को खुब खुब सुख दे! "
-- अमृत लाल नागर
~~~~ *समाप्त *~~~~~
बढ़िया लग रहा है यह संस्मरण. चित्र देखकर भी आनन्द आया.
ReplyDeleteधन्यवाद समीर भाई !
ReplyDeleteआपका आगमन उडन तश्तरी से
आकर और न जाने कितने लोकोँ
की सैर को निकल पडता है ! :-)
स्नेह
लावण्या
पूरा ही संस्मरण बहुत अच्छा रहा। सभी अवस्थाओं की, फोटो और लेखन के माध्यम से आपने अच्छी जानकारी दी। बधाई।
ReplyDeleteभावना जी.
ReplyDeleteमेरे अमृत लाल चाचा जी का लिखा आप सब के साथ बाँट कर खुशी हुई है मुझे १
आभार व स्नेह सहित,
लावण्या
आदरणीय मैडम,
ReplyDeleteइस समय अपने प्रोजेक्ट में अत्यंत व्यस्त था इसकारण आ नही पा रहा था… यह संस्मरण सभी तहों को खोल कर यह दिखा रहा है कैसे उस जमाने में भी लोग ने क्या-2 किया…।
हाँ दीव्याभ ,
ReplyDeleteहम अक्सर अनजान बने रहते हैँ कि हम, या हर पीढी आगे चली गये हमारे पुरखोँ के कँधोँ पे खडे होकर ही
आने वाले क को देखते हैँ पर कभी कभार, हम नीँव की ओर देखना भूल जाते हैँ. मैँ हमेशा भविष्य व भूतकाल
के बीच आज को एक कडी मानती हूँ -- एक अटूट श्रँखला मेँ बँधे हुए ,हम सब !
टिप्पणी के लिये शुक्रिया
स स्नेह
-- लावण्या
आपके संस्मरण हमें भी उस समय को जीने का मौका देते हैं।
ReplyDeleteआभार्।
और हां सृजनगाथा में आपका आलेख अच्छा है!
शुभकामनाएं
सँजीत जी,
ReplyDeleteधन्यवाद !
आपको सृजन गाथा पर मेरा लेख पसँद आया -
आपके साथ बीते हुए कल के परिवार के स्वजनोँ की स्मृतियाँ बाँट पायी ये विज्ञान के विकास के एक सुलभ साधन
का सद-उपयोग ही तो है !
स्नेह
लावण्या
दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।
ReplyDeleteचित्रों का बढ़िया संकलन अतीत की यादों में खींच ले गया! धन्यवाद।
ReplyDeleteलावण्या दी बहुत अच्छा संस्मरण है,हमेशा की तरह.आपसे सुन कर तो और भी अच्छा लगता है.नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.
ReplyDeleteसंस्मरण बहुत अच्छा लगा.नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
ReplyDeleteकमाल के संस्मरण हैं आपके पास। और, संस्मरण अमृत लाल नागरजी से जुड़ा है तो क्या बात।
ReplyDeleteअच्छा संस्मरण है
ReplyDeleteलावण्या बहन,
ReplyDeleteआपके पास विरासत,अनुभव,अनुभूति की
जो विभूति है उसकी संस्मरणात्मक प्रस्तुति
हम सबके लिए एक अनूठा उपहार ही है.
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प्रस्तुत श्रृंखला के चित्र और शब्द-चित्र
दोनों आपके अवदान के हस्ताक्षर हैं.
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आपका आभार.
डा.चंद्रकुमार जैन
bahut achcha laga aapka ye sansmaran padhkar...ek alag anubhooti hui! chitron ko dekhkar aanad aaya...thanx
ReplyDeleteश्री अमृतलाल नागर - संस्मरण के पांचों भाग इतने रोचक हैं कि एक ही बैठक में पढ़ डाले।
ReplyDeleteपं. नरेन्द्र शर्मा जी 'प्यासा निर्झर' में उनकी काव्य-रचनाओं की भूमिका पढ़ कर तो मैं आनन्दविभोर हो गयाः "कविता अविभक्त अद्वैत और
परिपूर्ण का प्रसाद है.....", ऐसा लगने लगा जैसे सारा दर्शन इस में समा गए हों।
सिने-जगत के आधार स्तंभ जैसे दिग्गज लोगों के बारे में पढ़ कर जैसे अतीत में पहुंच गए हों। भगवती बाबू , जुन्नरकर, किशोर साहू, लीला चिटनिस, देविका रानी की 'तन्दरुस्ती', बस यह कहिए कि हर नाम पढ़ते जैसे पुराने टाइम ज़ोन में पहुंच गए हों।
केवल रोचक या आनन्द की दृष्टि से ही नहीं, बहुत ही ज्ञान वर्धक संस्मरण हैं। सारे चित्र
collector's items हैं,
और लता जी के कर-कमलों द्वारा खींचे हुए पंडित जी और तुम्हारे विभिन्न मुद्राओं के फोटो तो देखने वाले हैं।
बड़े परिश्रम से यह सब संजो कर पढ़ने का अवसर देने के लिए धन्यवाद और बधाई।
महावीर
बहुत ही रोचक श्रंख्ला है। इसे आगे भी जारी रखें।
ReplyDeleteसंस्मरण बहुत अच्छा लग रहा है . बधाई..
ReplyDeleteYe sansmaran, amar hain jee. Sundar prastuti thee. Sil ko chhoo gayee.
ReplyDeleteआजादी के इस उल्लासमय पर्व पर आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
ReplyDeleteआज पहली बार आपके ब्लॉग को पढ़ने का सौभाग्य मिला ! पोस्ट बहुत पुरानी हैं पर ये तो कालजयी हस्ताक्षर हैं ! हमेशा नूतन और अमर रहेंगे !
बस गद गद और अभिभूत हूँ ! आज से पहले मालूम नही था , ये मेरा दुर्भाग्य था ! बहुत बहुत प्रणाम आपको !
naagar ji mere aadarsh rahe hain.
ReplyDeleteunhain jitna padho, unke bare mein jitna jaan lo trishna mitti nahin.
aaplog shresht kar rahe hain.
main to abhibhut ho gayi yahaan aakar, awismarniye
ReplyDeletelavanyam ji aapke blog par aakar achcha laga. snsmaran achche lage
ReplyDeletechitron k liye dhanwad. bahut achchha laga
ReplyDeletepura blog dekha maine, sare post v bahut hi pyara blog hai aapka, bahut pyara........
ReplyDeleteaapke paas yadi krishna nagar ka chitr ho to use v uplabdha karaiywga
संजोने में आप खूब निपुण हैं।
ReplyDeleteअच्छा पितृऋण चुका रही हैं।
बहुत अच्छा लगा।
अनेक शुभकामनाएँ।
दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएं...
ReplyDeleteachha laga..bhawnao ko aapne jis tarah net ke panno par ukera hai ..wakai ye kabiletarif hain...likhte rahiye...
ReplyDeleteकृपया इस ब्लॉग पर भी कुछ नया लिखें, पाठकों को प्रतीक्षा रहती है।
ReplyDeleteआपके और आपके पुरे परिवार को होली की बधाई और शुभकामनायें.
ReplyDeleteधन्यवाद
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteबहिन लावण्या जी।
ReplyDeleteमहान साहित्यकार श्रद्धेय नागर जी के पाँचों संस्मरण आद्योपान्त पढे। अच्छे लगे।
किसी अन्य साहित्यकार के भी संस्मरण
हों तो प्रकाशित करें।
बधाई।
जीवंत-प्रेरणादायी संस्मरण...अद्भुत संसार..कभी बुआजी (पूज्य महादेवी जी) के सम्बन्ध में भी लिखिए. क्या आपके ब्लॉग से कुछ सामग्री 'दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम' में दे सकता हूँ? आपकी सहमती होगी तो धारावाहिक देना चाहूँगा.
ReplyDeleteइस ब्लोग पर बाद मेँ
ReplyDeleteकई नई टीप्पणियाँ आयीँ हैँ
आप सारे गुणीजनोँ ने
पूज्य नागरजी चाचा जी की याद करते हुए अपने अपने श्रध्धा सुमन चढाये हैँ
उन्हेँ विनम्रतापूर्वक सर आँखोँ पर स्वीकारती हूँ -
कुछ नया आजकल
"लावण्यम्` - अन्तरमन " ब्लोग पर लिख रही हूँ -
वहाँ भी आकर पढीयेगा -
आभारी हूँ
आचार्य जी आप अवश्य जो भी सामग्री 'दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम' के लिये लेना चाहेँ अवश्य ले लीजियेगा -
सादर, सविनय,
--- लावण्या
अपने महान परिवार की saahityiak विरासत को आप आगे बढाइये
ReplyDeleteachchhaa lga , shubhkaamnaayen
अपने महान परिवार की saahityiak विरासत को आप आगे बढाइये
ReplyDeleteachchhaa lga , shubhkaamnaayen
खुसी हुई चित्र देख कर ..और संस्मरण पढ़कर भी.
ReplyDeletenice
ReplyDeleteHello Lavanyajee
ReplyDeleteBy going through you Blog, one amezed as to how well-informed you are. May I know ur Sun Sign..
I want to write a comprehansive write up on Pt Jee. Thus I just need to be in touch with you. I need one write up from you too remembering Papa.. Pls revert me on my email
raviraj1007@gmail.com
Best Regards
Raviraj
सुन्दर संस्मरण
ReplyDeleteआभार
Yah malika padhte samay,har baar aankhen nam ho jatee hain!
ReplyDeleteआपका ब्लॉग पढते समय एक से एक नाम किये व्यक्तियों के साथ ऐसा परिचय होता है जैसे वे बहुत अपने हों ।अमृत लाल नागर जी के सुंदर संस्मरण पढवाने का आभार ।
ReplyDeleteखंजन लेख. गजब
ReplyDeleteअति आनंद भयौ
सादर