Saturday, December 16, 2006

प्रेम -- पाती


[ This is a poem which is a Love letter being written by a girl , away from her beloved -
she writes a love - story about a King & his Queen & how they quarreled but eventually got united & Ruled their Kingdom ]
[ There is also this fact interwoven in the JaggaNath Puri Festival , also known as the Great Chariot Festival in Orissa State of India where the Diety of Lord Jagat Nath = Lord of the Universe is taken out in a huge Chariot , pulled by franctic devotees & the King of Orissa sweeps the Temple for a single day -- here is a Pic. my poem got its kernel from this ]
मन से मनको लिख रही हूँ,
पाती एक अजानी प्रियतम !
पाती मेँ प्रेम - कहानी !
तुम भी हामी भरते जाना,
सुनते सुनते बानी ..
फिर कह रही कहानी !
कहूँ सुनाऊँ तुमको प्रियतम,
था राजा या रानी ?
सुनोगे क्या ये कहानी ?
सुनो, एक थी रानी बडी निर्मम !
पर थी वह बडी ही सुँदर !
ज्यूँ बन उपवन की तितली !
गर्वीली, मदमाती, बडी हठीली !
एक था राजा, बडा भोला नादान
रखता सब जीवोँ पर प्रेम समान !
बडा बलशाली, चतुर, सुजान !
सुन रहे हो तो हामी भर सुनो कहानी
अब आगे सुनो कहानी !

भोर भए , उगता जब रवि था,
राजा निकल पडता था सुबही को,
साथ घोडी लिये वह "मस्तानी"
सुनो, सुनो, ये कहानी !

छोड गाँव की सीमा को वह,
जँगल पार घनेरे कर के,
आया, जहाँ रहती थी रानी !
अब आगे सुनो, कहानी ..
रानी रोज किया करती थी
गौरी - व्रत की पूजा,
नियम न था कोई दूजा ~

छिप मँदीर की दीवारोँ से,
देखी राजा ने रानी -
मन करने लगा मनमानी !
किसी तरह पाऊँ मैँ इसको,
हठ राजा ने ये ठानी !
वह भी तो था अभिमानी !
पलक झपकते रानी लौटी,
लौट चले सखीयोँ के दल
-मची राजा के दिल मेँ हलचल !

पाणि - ग्रहण प्रस्ताव भेजकर
राजा ने देखा मीठा सपना
दूर नहीँ होँगेँ दिनी ऐसे,
हम जब होँगेँ साजन - सजनी !

रानी ने पर अपमानित करके,
ठुकराया उसका प्रस्ताव !
क्या हो, था ही क्रोधी स्वभाव !

आव न देखा, ताव न देखा,
राजा ने फिर धावा बोला--
अब तो रानी का आसन डोला !
बँदी बन रानी, तब आईँ
राजा के सम्मुख गई लाईँ
कारा गृह मेँ भेज दीया कह,

" नहीँ चाहीये, मुझे गुमानी !
ना होगी मेरी ये, रानी ! "

एक वर्ष था बीत चला अब
-आया श्री पुरी मेँ अब उत्सव !
श्री जग्गनाथ का उत्सव !
रीत यही थी, एक दिवस को,
राजा , झाडू देते थे ....
मँदिर के सेवक होते थे !

बुढा मँत्री, चतुर सयाना
लाया खीँच रानी का बाना कहा,
" महाराज, ये भी हैँ प्रभु की दासी,
-- पर मेरी हैँ महारानी ! "
कहो कैसी लगी कहानी ?

सेवक राजा की , सेविका से,
हुई धूमधाम से शादी--
फिर छमछम बरसा पानी !
मीत हृदय के मिले सुखारे
--बैठे, सिँहासन, राजा ~ रानी !
हा! कैसी अजब कहानी !

जो प्रभु के मँदिर मेँ जन आयेँ,
पायेँ नैनन की ज्योति,
प्रवाल - माणिक मुक्ता मोती !
यहाँ न हार किसी की होती !

अब कह दो मेरे प्रियतम प्यारे,
कर याद मुझे कभी क्या, वहाँ,
हैँ आँख तुम्हारीँ रोतीँ?
काश! कि, मैँ वहाँ होती !

-- लावण्या

2 Comments:

Blogger Dr.Bhawna said...

कहानी कैसे शुरू हुई और कैसे-२ मोड लेकर कहाँ पहुँची। पढकर आनन्द आया।

9:08 AM  
Blogger antarman said...

डो. भावना जी,

प्रोत्साहन की आकाँक्षा करते हुए,

स~ स्नेह,

लावण्या

2:07 PM  

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