Saturday, May 26, 2007

श्री अमृतलाल नागर - संस्मरण - भाग -- ५

तीनोँ पुत्रियाँ सौभाग्यवती वासवी, ( .मौलिक व शौनक) सौ. लावण्या, (सिँदुर व सोपान ) सौ.मोँघी ( बाँधवी ) (कुँजम व दीपम ) ,परितोष , अम्मा और पापा जी के साथ १९ वेँ रास्ते खार, बँबई के घर के आँगन मेँ...
गोदीवाला परिवार-

[ मेरी नानी जी कपिला गोदीवाला की गोद मेँ हूँ ]- श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा श्री गुलाबदास गोदीवाला जी तथा उनकी माता जी "मोटा बा" [मेरी पडनानी जी ]जो १०३ वर्ष की थीँ जब भरे पूरे परिवार के सामने चल बसीं ]

गताँक से आगे : ~~

मैँ उस समय भारत कोकिला श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी जी की एक फिल्म्
" मीरा "
हिन्दी मेँ डब कर रहा था और इस निमित्त से वह और उनके पति श्रीमान्` सदाशिवम्`जी बँबई ही रह हरे थे। बँधुवर नरेन्द्रजी ने उक्त फिल्म के कुछ तमिल गीतोँ को हिन्दी मे इस तरह रुपान्तरित कर दिया कि वे मेरी डबिँग मेँ जुड सकेँ। सदाशिवं`जी और उनकी स्वनामधन्य पत्नी तथा तथा बेटी राधा हम लोगोँ के साथ व्यावसायिक नहीँ


किन्तु पारिवारिक प्रेम व्यवहार करने लगे थे.
सदाशिवं`जी ने बँबई मेँ ही एक नयी शेवरलेट गाडी खरीदी थी. वह जोश मेँ आकर बोले, " इस गाडी मेँ पहले हमारा यह वर ही यात्रा करेगा ! "

गाडी फूलोँ से खूब सजाई गई उसमेँ वर के साथ माननीय सुब्बुलक्ष्मी जी व प्रतिभा बैठीँ । समधी का कार्य श्रधेय सुमित्रनँदन पँत ने किया।

बडी शानदार बारात थी !

बँबई के सभी नामचीन्ह फिल्मस्टार और

नृत्य - सम्राट उदयशँकर जी उस वर यात्रा मेँ सम्मिलित हुए थे. बडी धूमधाम से विवाह हुआ. मेरी माता बंधु से बहुत प्रसन्न् थी और पँत जी को , जो उन दिनोँ बँबई मेँ ही नरेन्द्र जी के साथ रहा करते थे, वह देवता के समान पूज्य मानती थी । मुझसे बोली, " नरेन्द्र और बहु का स्वागत हमारे घर पर होगा ! "

वह स्वागत समारोह भी अनोखा ही था.पँतजी ने अपनी एक कविता सुनायी तथा माननीया सुब्बुलक्ष्मी जी ने माँगलिक गीत गाये. वह दिन आज भी याद आ रहा है तो मेरी आँखेँ वे स्मृतियाँ लिखते हुए बरस रहीँ हैँ ! सपना हो गये वे दिन !

आज बँधु के स्वर्गवास के दसवेँ दिन यह सँस्मरण लिख रहा हूँ - इस दस दिनोँ मेँ मैँने उन्हेँ न जाने कितना याद किया है ! प्रतिभा की मृत्यु के बाद मैँ इतना कभी नहीँ रोया. बँधुवर नरेन्द्र जी अजातशत्रु थे ! अपने मीठे व्यवहार से उन्होँने सारी बँबई को एक प्रकार से बाँध लिया था. अवधी के ख्यातिनामा कवि स्व. बालभद्र दीक्षित " पढीस" की स्मृति मेँ हम दोनोँ के परम मित्र डो. रामविलास जी शर्मा के सँपादक्त्व मेँ लखनुउ से प्रकाशित मासिक पत्रीका " माधुरी" का एक विशेषांक प्रकाशित हुआ था। बँधुवरने , जो उन दिनोँ प्रगतिशील आँदोलन से जुडे हुए थे , किसी की स्मृति मेँ एक कविता लिखी थी, जिसकी एक पँक्ति अब भी मुझे याद है , " एक हमारा साथी था जो चला गया " --आज वही पँक्ति अपने परम प्रिय कवि नरेन्द्र शर्मा के लिये दोहरा कर प्रभु से यह कामना कर रहा हूँ कि अगले जन्म मेँ भी हमारा और उनका साथ हो ! नरेन्द्र जी की तीनोँ पुत्रियाँ सौभाग्यवती वासवी, सौ. लावण्या, सौ.मोँघी ( बाँधवी ) तीनोँ ही सम्पन्न और सुसँस्कृत परिवारोँ मेँ ब्याही हैँ बाल -बच्चोँवालीँ हैँ अब चि. परितोष अपनी माँ की सेवा करने के लिये अकेला है. राम करे, वह चिरँजीवी, चिरसुखी तथा चिर उन्नतिशील हो तथा अपनी माँ , मेरी प्रिय सुशीला बेन को खुब खुब सुख दे! "
-- अमृत लाल नागर

~~~~ *समाप्त *~~~~~

श्री अमृतलाल नागर - संस्मरण - भाग -- ४

कुमारी सुशीला गुलाबदास गोदीवाला

श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा
गताँक से आगे : ~~

अपने छात्र जीवन मेँ ही कुछ पैसे कमाने के लिये नरेन्द्र जी कुछ दिनोँ तक "भारत" के सँपादीय विभाग मेँ काम करते थे.
शायद " अभ्युदय" के सँपादीकय विभाग मेँ भी उन्होने काम किया था. M.A पास कर चुकने के बाद वह अकेले भारतीय काँग्रेस कमिटी के दफ्तर मेँ भी हिन्दी अधिकारी के रुप मेँ काम करने लगे. उस समय जनता राज मेँ राज्यपाल रह चुकनेवाले श्री सादिक अली और भारत के दूसरे या तीसरे सूचना मँत्री के रुप मेँ काम कर चुकनेवाले स्व. बालकृष्ण केसकर भी उनके साथ काम करते थे.एक बार मैँने उन दिनोँ का एक फोटोग्राफ भी बँधु के यहाँ देखा था.
उसी समय कुछ दिनोँ के लिये वह कोँग्रेस के अध्यक्ष पँडित जवाहरलाल नेहरु के कार्यालय के सचिव भी रहे थे. इतने प्रतिभाशाली होने के बावजूद उन्होँने कभी, किसी से किसी प्रकार की मदद नहीं माँगी.

फिल्मोँ मेँ उन्होँने सफल गीतकार के रुप मेँ अच्छी ख्याति अर्जित की. उससे भी अधिक ज्योतीषी के रुप मेँ भी उन्होँने वहाँ खूब प्रतिष्ठा पायी.
एक बार तो मैँ उनसे नाराज़ भी हो गया था. यह ज्योतिष विध्या उन्होँने देवली जेल मेँ ही रहकर सीखी थी.जेल मेँ रहकर ही अल्मोडा के किसी पँडित की लिखी हुई एक अच्छी पुस्तक " सुगम ज्योतिष" उनके हाथ लग गई थी, उसे पढकर ही उन्हेँ इस विध्या का चस्का लगा था. उसके बाद उन्होँने और किताबे पढीँ थीँ - बँबई मे रहते हुए उत्तर और दक्षिण भारत के कई ज्योतिषियोँ से उनकी अच्छी जान पहचान हुई - कई अलभ्य पुस्तकोँ का पता भी उन्हेँ लगा और धीरे धीरे वह गीतकार के अलावा बँबई के ख्यातनाम ज्योतिषियोँ मेँ गिने जाने लगे.लेकिन उन्होँने कभी उससे आर्थिक लाभ नहीँ उठाया. हमारी प्रतिभा अक्सर उनसे कहती, " जेठजी -देवर जी ", यह बताइये कि हमारा इनका झगडा कब खत्म होगा ? " और बँधु हँस कर कहते," यह झगडा ही तो आपके प्रेम की निशानी है यह कैसे खत्म होगा ? "

बँबई मेँ रहते हुए ही उनका कुमारी सुशीला गोदीवाला से परिचय हुआ. यह परिचय बहुत प्रगाढ हो गया. उन्होँने एक कविता भी लिखी थी,मैँने कहा, " बँधु, किससे यह नेह नाता जुडा है ? इसमेँ बहुत गहराई है ! अब बस ब्याह कर लिजीये." " मैँ भी यही सोचता हूँ बँधु, " - बाद मेँ मेरी , प्रतिभा और नरेन्द्र जी की बातेँ हुईँ श्री गुलाबदास गोदीवाला जी के रेलवे मेँ काम करने के कारण प्रतिभा की पुरानी स्मृतियाँ जाग उठीँ -आदरणीय गुलाबदास गोदीवाला , कभी आगरे मेँ स्टेशन मास्टर रह चुके थे. उस समय आगरे मेँ रहनेवाले एक सँपन्न गुजराती वैश्य सज्जन श्री मधुवनदास शाह और उनकी पत्नी से गोदीवाला दँपत्ति की खासी जान -पहचान थी और मेरी स्वर्गीया सासजी स्वर्गीय शाह दँपत्ति की धर्मपुत्री थीम अपनी माता के साथ प्रतिभा का भी वहाँ बहुत आना जाना होता था . प्रतिभा ने कहा, " यह गोदीवालाजी कहीँ वे ही पुराने परिचय के न होँ ! " नरेन्द्र जी से उन्होँने यह बात बतलाई- उनकी होनेवाली सास जी ने इस बात का समर्थन किया और मुझे तथा प्रतिभा को अपने घर भोजन पर आमँत्रित किया. बातेँ स्पष्ट होने पर हम दोनोँ का नेह नाता भी गोदीवाला परिवार से तत्काल जुड गया - नरेन्द्र शर्मा और सुशीला गोदीवाला के विवाह की बात तब तक लगभग तय हो चुकी थी, अब और भी पक्की हो गयी.
क्रमश: ~~~~~~

Thursday, May 24, 2007

श्री अमृतलाल नागर - संस्मरण - भाग -- ३

[पँडित नरेन्द्र शर्मा और प्रसिध्ध छायावादी कवि श्री सुमित्रा नँदन पँत जी -- नरेन्द्र शर्मा के शादी के सुअवसर पर ]
अब गताँक से आगे : ~~
भगवती बाबू तो " बोम्बे टाकिज" से जुडकर बम्बई आये थे लेकिन मैँ फ्रीलाँसर था. तब तक दो तीन फिल्मोँ मेँ डायरेक्टर जुन्नरकर की फिल्म " सँगम" के गीत सँवाद लिख कर जब बँबई लौटा तो अपने मित्र फिल्म स्टार और निर्देशक स्वर्गीय किशोर साहू के साथ ही उनके घर पर रहने लगा. वह भी उन दिनोँ बम्बई की फिल्मी दुनिया मेँ नये सिरे से अपने को जमाने मेँ लगे थे और
" आचार्य आर्ट प्रोडक्शन" के साथ जुडकर " कुँआरा बाप" नामक एक हास्य रस की फिल्म बनाने की योजना उन्होँने मुझे बताई . किशोर मुझसे बोले," पँडितजी अभी पैसे की तो कोई बात तुमसे नहीँ कर सकता लेकिन तुम मेरी मदद कर सको तो बहुत अच्छा है -"

मैँ उन दिनोँ श्रीमती लीला चिटनीस के लिये एक फिल्म के सँवाद लिख रहा था और वहाँ की बहसबाजी से बहुत दुखी था. इसलिये मैँने किशोर का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. " कुँआरा बाप" फिल्म ने किशोर को फिर से फिल्म लाइन मेँ जमा दीया ! वह पहले श्रीमती देविका रानी के साथ " बोम्बे टाकिज " की एक फिल्म " जीवन प्रभात" मेँ हीरो बन चुके थे और उनके साथ मुझे भी अपूर्व ख्याति मिली मेरा काम बढ गया था - किशोर और मेरा दोनोँ ही का स्थायी अड्डा दादर के "श्री साउन्ड स्टुडियोज़ " मेँ ही रहता था. एक दिन वहीँ बोम्बे टाकिज से भगवती बाबू का फोन आया , " गुरु, हम आ गये हैँ ! " सुनकर मेरा मन खिल उठा ! मैँने कहा, " क्या नरेन्द्र जी भी आये हैँ ? " " हाँ आज शाम को डाक्टर मोतीचँद्र के यहाँ आओ, खाना - पीना भी वहीँ रहेगा "शाम को कोलिज स्ट्रीट पहुँच गया - नरेन्द्र जी को देखकर चित्त प्रसन्न हो गया ! नरेन्द्र जी मोटे तो कभी नहीँ थे परन्तु उस समय जेल की कष्ट यातनाएँ सहकर वह काफी दुबले हो गये थे. सन इकतालीस के अँत तक मेरी पत्नी और मँझला भाई स्वर्गीय रतन बम्बई आ चुके थे. रोटी पानी का जुगाड घर मेँ ही जम चुका था , इसलिये बँधुवर नरेन्द्र जी को अक्सर भोजन के लिये अपने घर बुला लेता था . इस तरह प्रतिभा ( मेरी पत्नी ) से भी उनका नेह नाता अच्छा जुड गया था. नरेन्द्र जी बडे ही पुरमजाक आदमी थे. हम तीनोँ मेँ खुलाव भी काफी आ गया था. वह आयु मेँ मुझसे तीन वर्ष बडे थे इसलिये प्रतिभा उन्हेँ " जेठजी - देवरजी " कहा करती थी. " जेठजी - देवरजी ", आज आपके लिये क्या बनाऊँ ? "
कभी कभी वह अपनी पसँद की चीजेँ उनसे बनाने के लिये कह भी दिया करते थे.

इसबीच हमने घूमकर लगभग सारी बम्बई छान मारी और इस तरह उनके पूर्व जीवन के सँबध मेँ बहुत कुछ जान लिया. लखनऊ का होने के कारण वे मुझे अक्सर " लखनाऊओ " शहर का निवासी कहा करते थे और खुर्जा स्थित 'जहाँगीरपुर " के निवासी होने के नाते मैँ उन्हेँ " कुरु जाँगलीय" कहा करता था. खुर्जा कुरु जाँगल का ही बिगडा हुआ नाम है. उनके पिता पँडित पूरनलाल जी गौड जहाँगीरपुर ग्राम के पटवारी थे बडे कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, सात्विक विचारोँ के ब्राह्मण ! अल्पायु मेँ ही उनका देहावसन हो गया था. उनके ताऊजी ने ही उनकी देखरेख की और पालन पोषण उनकी गँगा स्वरुपा माता स्व. गँगादेवी ने ही किया. आर्यसमाज और राष्ट्रीय आँदोलन के दिन थे, इसलिये नरेन्द्र जी पर बचपन से ही सामाजिक सुधारोँ का प्रभाव पडा, साथ ही राष्ट्रीय चेतना का भी विकास हुआ. नरेन्द्रजी अक्सर मौज मेँ आकर अपने बचपन मेँ याद किया हुआ एक आर्यसमाजी गीत भी गाया करते थे, मुझे जिसकी पँक्ति अब तक याद है -- " वादवलिया ऋषियातेरे आवन की लोड" लेकिन माताजी बडी सँस्कारवाली ब्राह्मणी थीँ उनका प्रभाव बँधु पर अधिक पडा.
जहाँ तक याद पडता है उनके ताऊजी ने उन्हेँ गाँव मेँ अँग्रेजी पढाना शुरु किया था बाद मेँ वे खुर्जा के एक स्कूल मेँ भर्ती कराये गये. उनके हेडमास्टर स्वर्गीय जगदीशचँद्र माथुर के पिता श्री लक्ष्मीनारायण जी माथुर थे. लक्ष्मीनारायण जी को तेज छात्र बहुत प्रिय थे. स्कूल मे होनेवाली डिबेटोँ मेँ वे अक्सर भाग लिया करते थे. बोलने मेँ तेज ! इन वाद विवाद प्रतियोगिताअओँ मेँ वे अक्सर फर्स्ट या सेकँड आया करते थे. जगदीशचँद्र जी माथुर नरेन्द्र जी से आयु मे चार या पाँच साल छोटे थे. बाद मेँ तत्कालीक सूचना मँत्री बालकृष्ण केसकर ने उन्हेँ आकाशवाणी के डायरेक्टर जनरल के पद पर नियुक्त किया. जगदीशचँद्र जी सुलेखक एवँ नाटककार भी थे तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे पढते समय भी उनका श्रेध्धेय सुमित्रा नँदन पँत और नरेन्द्र जी से बहुत सँपर्क रहा . वह बँधुको सदा " नरेन्द्र भाई "ही कहा करते थे -- अवकाश प्राप्त करने के बाद , एक बार मेरी उनसे दिल्ली मेँ लँबी और आत्मीय बातेँ हुईँ थी उन्होँने ही मुझे बताया था कि उनके स्वर्गीय पिताजी ने ही उन्हेँ ( बँधु को ) सदा
" नरेन्द्र भाई " कहकर ही सँबोधित करने का आदेश दिया था.
नरेन्द्र जी इलाहाबाद मेँ रहते हुए ही कविवर बच्चन, शमशेर बहादुर सिँह, केदार नाथ अग्रवाल और श्री वीरेश्वर से जो बाद मेँ "माया" के सँपादक हुए , उनका घनिष्ट मैत्री सँबध स्थापित हो गया था. ये सब लोग श्रेध्धय पँतजी के परम भक्त थे. और पँतजी का भी बँधु के प्रति एक अनोखा वात्सल्य भाव था, वह मैँने पँतजी के बम्बई आने और बँधु के साथ रहने पर अपनी आँखोँ से देखा था. नरेन्द्र जी के खिलँदडेपन और हँसी - मजाक भरे स्वभाव के कारण दोनोँ मेँ खूब छेड छाड भी होती थी.
किन्तु, यह सब होने के बावजूद दोनोँ ने एक दूसरे को अपने ढँग से खूब प्रभावित किया था. नरेन्द्र जी की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर, बँबईवालोँ ने एक स्मरणीय अभिनँदन समारोह का आयोजन किया था. तब तक सुपर स्टार चि. अमिताभ के पिता की हैसियत से आदरणीय बच्चन भाई भी बम्बई के निवासी हो चुके थे. उन्होँने एक बडा ही मार्मिक और स्नेह पूर्ण भाषण दिया था, जो नरेन्द्र के अभिनँदन ग्रँथ " ज्योति ~ कलश" मेँ छपा भी है - उक्त अभिनँदन समारोह मेँ किसी विद्वान ने नरेन्द्र जी को प्रेमानुभूतियोँ का कवि कहा था ! इस बात को स्वीकार करते हुए भी बच्चन भाई ने बडे खुले दिल से यह कहा था कि अपनी प्रेमाभिव्यक्तियोँ मेँ भी नरेन्द्र जी ने जिन गहराइयोँ को छुआ है और सहज ढँग से व्यक्त किया वैसा छायावाद का अन्य कोई कवि नहीँ कर पाया !
क्रमश: ~~~~~~




Saturday, May 12, 2007

श्री अमृतलाल नागर -सँस्मरण - भाग -- २

यह सभी चित्र , (स्व, नरेन्द्र शर्मा जी के और मेरे = लावण्या के ) भारत कोकिला श्री लता मँगेशकर जी ने खीँचे हैँ और देविका रानी जी के वेब से उपलब्ध -


नरेंद्र शर्मा का नाम तब तक प्रसिध्धि के पथ पर काफी आगे बढ चुका था. इलाहाबाद विश्वाध्यालय मेँ होनेवाले कवि सम्मेलनोँ मेँ उनकी धूम मचने लगी थी उससे भी बडी बात कि उनके प्रथम काव्य सँग्रह " शूल फूल " की भूमिका डो. अमरनाथ झा ने लिखी थी और वह महाकवि सुमित्रानँदन पँत के अनन्य भक्तोँ मेँ माने जाने लगे थे !

मुझे बहुत दु;ख हुआ कि नरेन्द्र जी के आगमन की सूचना समारोह के हो जाने के बाद मिली, वरना हम लोग भी उनके गीतोँ का कुछ आनँद लाभ कर सकते -खैर! सन चालीस मे मैँ जीविका हेतु फिल्म लेखन के काम से बँबई चला गया !एक साल बाद श्रेध्धेय भगवती बाबू भी "बोम्बे टाकीज़" के आमँत्रण पर बँबई पहुँच गयेतब हमारे दिन बहुत अच्छे कटने लगे प्राय: हर शाम दोनोँ कालिज स्ट्रीट स्थित , स्व. डो. मोतीचँद्र जी के यहाँ बैठेकेँ जमाने लगे -

तब तक भगवती बाबू का परिवार बँबई नहीँ आया था और वह,कालिज स्ट्रीट के पास ही माटुँगा के एक मकान की तीसरी मँजिल मेँ रहते थे। एक दिन डोक्टर साहब के घर से लौटते हुए उन्होँने मुझे बतलाया कि वह एक दो दिन के बाद इलाहाबाद जाने वाले हैँ

" अरे गुरु, यह इलाहाबाद का प्रोग्राम एकाएक कैसे बन गया ? "

" अरे भाई, मिसेज रोय ( देविका रानी रोय ) ने मुझसे कहा है कि मैँ किसी अच्छे गीतकार को यहाँ ले आऊँ! नरेन्द्र जेल से छूट आया है - और मैँ समझता हूँ कि वही ऐसा अकेला गीतकार है जो प्रदीप से शायद टक्कर ले सके! "

सुनकर मैँ बहुत प्रसन्न हुआ प्रदीप जी के तब तक, बोम्बे टोकीज़ से ही सम्बध्ध थे "कँगन, बँधन" और "नया सँसार" फिल्मोँ से उन्होँने बँबई की फिल्मी दुनिया मेँ चमत्कारिक ख्याति अर्जित कर ली थी, लेकिन इस बात के से कुछ पहले ही वह बोम्बे टोकीज़ मेँ काम करने वाले एक गुट के साथ अलग हो गए थे इस गुट ने "फिल्मीस्तान" नामक एक नई सँस्था स्थापित कर ली थी - कँपनी के अन्य लोगोँ के हट जाने से देविका रानी को अधिक चिँता नहीँ थी , किँतु, ख्यातनामा अशोक कुमार और प्रदीप जी के हट जानेसे वे बहुत चिँतित थीँ - कँपनी के तत्कालीन डायरेक्टर श्री धरम्सी ने अशोक कुमार की कमी युसूफ खाँ नामक एक नवयुवक को लाकर पूरी कर दी ! युसूफ का नया नाम, "दिलीप कुमार " रखा गया, किँतु प्रदीप जी की टक्कर के गीतकार के अभाव से श्रीमती राय बहुत परेशान थीँ इसलिये उन्होँने भगवती बाबू से यह आग्रह किया था --

दो तीन दिनोँ के बाद मैँ जब डोक्टर साहब के यहाँ पहुँचा तो उनके बनारसी मित्र और भगवती बाबू के पडौसी स्वर्गीय चतुर्दास गुजराती ने मुझसे कहा, " भैया तो देश गया !"

"कब" ?

"कल"

उन दिनोँ या अब भी बँबई मेँ उत्तर भारतीयोँ को "भैया" कहा जाता था - और कोई भैया जब देश जाता तो बँबई के अन्य दूध -विक्रेता भैया लोग उसे विदा करने के लिये स्टेशन अवश्य जाया करते थे - मैँने गुजराती से कहा,

" अरे मुझे पता नहीँ था वर्ना, मैँ भी भगवती बाबू को बिदाई देने स्टेशन जाता ! खैर!! लौटेँगे कब ? "
"अरे यार ! कवियोँ की ज़्बान का भला कोई ठिकाना है ? योँ कह गये हैँ कि आठ दस दिनोँ मेँ आ जायेँगे !" बीच मे और भी दो चार बार डोक्टर साहब के यहाँ गया, लेकिन "गुरु" के वापस आने के कोई समाचार न मिले -

क्रमश:



Thursday, May 10, 2007

"एक हमारा साथी था, जो चला गया" ...( श्री अमृतलाल नागर ) - भाग -- १



लेख़क : श्री अमृतलाल नागर जन्म:: १९१६
भूख
( १९४६ ) - पँचु गोपाल मुखर्जी जो एक पाठशाला के निर्माण के बाद हेड मास्टरी करते हुआ, बँगाल की भूखमरी को जीते हैँ जिसे पाठक उन्हीँ की नज़रोँ से देखता है इस उपन्यास को आजतक, हिन्दी के खास दस्तावेज की तरह आलोचक व पाठक उतनी ही श्रध्धा से पढते हैँ जितना कि जब उसे पहली बार पढा गया होगा !
सात घुँघटवाला मुखडा
खंजन नयन

अग्नि
-गर्भ
एकदानैमिषारण्यै
मानस का हँस
टुकडे टुकडे दास्तान्
साहित्य और सँस्कृति
महाभारत- कथा
बूँद और समुद्र
सुहाग के नुपूर
अमृत और विष
चक्कलस
करवत
मेरी प्रिय कहानियां
नटखट चाची - ५ हास्य कथाएं
अमृत और विष

( कन्नड "अमृत मट्टु विष" पी। अदेश्वर राव द्वारा लिखित कथा का हिन्दी अनुवाद जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ )
किस्से कहानियाँ,लघु कथाएँ,नाटक, निबँध, आलोचना लिखनेवाले हिन्दी के प्रसिध्ध साहित्यकारजिन्हेँ भारत सरकार ने "पद्म भूषण" पुरस्कार से, नवाज़ा है ...तो सोवियत लेन्ड अवार्ड १९७० मेँ जब मेरे चाचाजी को मिला तब वे बम्बई रुके थे और पापाजी से घर मिलन आये थे और रशिया से एक बहुमूल्य रत्न " ऐलेक्ज़ान्ड्राएट" भी लाये थे, चूँकि उन्हेँ पापाजी के विस्तृत रत्न व ग्रहोँ के ज्ञान के बारे मेँ पता था --आज, रत्न स्व.वासवी मोदी मेरी बडी बहन के बडे पुत्र मौलिक के पास है !
मेरे चाचाजी भी ऐसे ही बहुमूल्य "रत्न" ही तो थे ! हिन्दी साहित्य जगत के असाधारण प्रतिभाशाली साहित्यकार थे वे ! "प्रतिभा जी" के पतिदेव ! लखनऊ शहर के अपने......गौरव स्तँभ ...जो अक्सर बम्बई आया करते थे...
उनकी बडी सुपुत्री, डो. अचला नागर जी ने फिल्म "निकाह" की पटकथा लिखी है - और

रीचा नागर जी ने अपने प्रिय "दद्दु" से प्रेरणा लेकर, " आओ बच्चोँ नाटक लिखेँ.." ' ( बाल नाट्य अकादमी प्रेषित) स्थापित किया है

पूज्य पापाजी के अचानक हुए देहाँत के बाद श्री अमृत लाल चाचाजी ने ये लिख कर
" सँस्मरण पुस्तक " शेष - अशेष" के लिये स्व. वासवी को अपनी यादेँ भेजीँ ...
"एक हमारा साथी था, जो चला गया"

बँधुवर नरेन्द्र शर्मा जी के साथ मेरी घनिष्ठता योँ तो सन्` १९४३ मेँ उनके बम्बई जाने पर बढी पर अब याद आता है कि उनसे मेरा परिचय सन्` १९३६ मेँ हुआ था -- उस समय मैँने कुछ नवयुवकोँ के साथ : द कोस्मिक सोशलिस्ट " नामकी सँस्था के तत्वाधान मेँ श्रेध्धेय निरालाजी का अभिनँदन समारोह आयोजित किया था यध्यपि यह आयोजन केवल स्थानीय गणमान्य कवियोँ एवँ साहित्यकारोँ के साथ ही सम्पन्न हुआ था, किँतु, सौभाग्यवश आयोजन बहुत ही भव्य रुप से हुआ था कार्यक्रम पूरा होने के बाद एक ठिगने कद और गौरवर्ण के चश्माधारी युवक निरालाजी के सामने आकर खडे हुए॥
उन्हेँ देखते ही महाकवि खिल उठे थे !
उनसे कुशल क्षेम की कुछ बातेँ कर लेने के बाद उन्होँने मुझसे पूछा,
" इन्हेँ जानते हो ? यह नरेन्द्र शर्मा हैँ ॥"


क्रमश: ...




Saturday, May 05, 2007

ग्रेट ब्रिटन की महारानी ऐलिज़ाबेथ



ग्रेट ब्रिटन की महारानी ऐलिज़ाबेथ :

http://www.royal.gov.uk/output/Page1.asp


पूरा नाम: ऐलिज़ाबेथ ऐलेक्ज़ान्ड्रा मेरी

जन्म: २१ अप्रेल,१९२६ ( मेरी अम्मा सुशीला भी इसी साल मेँ जन्मी थीँ )
ज़नम स्थान: १७ ब्रुटोन स्ट्रीट,मे फेर लँडन यु.क़े.( युनाइटेड किँगडम)
पिता:प्रिँस आल्बर्ट जो बाद मेँ जोर्ज ४ बनकर महारज पद पर आसीन हुए.


माता:एलिजाबेथ -बोज़ लियोन ( डचेस ओफ योर्क - बाद मेँ राजामाता बनीँ )
घर मेँ प्यार का नाम: "लिलीबट "
शिक्षा : उनके महल मेँ ..ही
इतिहास के शिक्षक: सी. एह. के मार्टेन इटन के प्रवक्ता


धार्मिक शिक्षा : आर्चबीशप ओफ केन्टरबरी

बडे ताऊ : राजा ऐडवर्ड अष्टम ने जब एक अमरीकी सामान्य नागरिक ,विधवा विलिस सिम्प्सन से प्रेम विवाह कर लिया तब उन्हेँ राजपाट छोडना पडा -तब ऐलिज़ाबेथ के पिता सत्तारुढ हुए --

१३ वर्ष की उम्र मेँ द्वीतीय विश्व युध्ध मेँ बी.बी.सी. रेडियो कार्यक्रम " १ घँटा बच्चोँ का"मेँ अन्य बच्चोँ केप्रसारित कार्यक्रम से हीम्मत बँधाई -
बर्कशायर, वीँडज़र महल मेँ युध्ध के दौरान निवास किया जहाँ भावी पति राजमुमार फीलिप से मुलाकात हुई जो उसके बाद , नौसेना सेवा के लिये गए और राजकुमारी उन्हेँ पत्र लिखतीँ रहीँ क्यूँकि उन्हेँ राजकुमार से, प्रेम हो गया था --
१९४५ मेँ, No 230873 का अँक मिला जिससे सेना मेँ काम किया --
1947 मे पिता के साथ दक्षिण अफ्रीका, केप टाउन शहर की यात्रा की और देश भक्ति जताते हुए रेडियो प्रसारण किया - २० नवम्बर, १९४७ मेँ ड्यूक ओफ ऐडीनबोरो,कुँवर फीलिप डेनमार्क व ग्रीस के से भव्य विवाह समारोह सँपन्न हुआ -
१९४८ मेँ प्रथम सँतान, पुत्र चार्ल्स का जन्म-
१९५० मेँ कुमारी ऐन का जन्म -
१९६० मेँ कुमार ऐन्ड्रु जन्मे -
१९६४ मेँ कुमार ऐडवर्ड चौथी और अँतिम सँतान --


१९५१ तक "माल्टा " मेँ भी रहीँ जहाँ फीलिप सेना मेँ कार्यरत थे -
६ फरवरी,१९५२ वे आफ्रीका के केन्या शहर पहुँचे जहाँ के ट्रीटोप होटेल "ठीका" नैरोबीसे २ घंटे की दूरी पर थे - वहाँ उन्हेँ बतलाया गया कि उनके पिता, की नीँद मेँ रात्रि को मृत्यु हो गई है सो, जो राजकुमारी पेडोँ पर बसे होटल पर चढीँ थीँ वे रानी बनकर उतरीँ !!


भव्य समारोह २ जून, १९५२ को वेस्ट मीनीस्टर ऐबी मेँ सम्पन्न हुआ जब वे धार्मिक रीति रिवाज से ब्रिटन की महारानी के पद पर आसीन हुईँ !

Listen to a special piece written by the current Queen's Piper


गत २१ ऐप्रिल को वे ८० वर्ष की हुईँ हैँ और मेरे प्राँत के पास केनटकी डर्बी मेँ पधार रहीँ हैँ इसलिये, सोचा उनके जीवन को देखा जाये जो सच्मुच भव्य है !
Links:
http://www.google.com/search?q=Queen+Elizabeth+2nd&rls=com.microsoft:*:IE-SearchBox&ie=UTF-8&oe=UTF-8&sourceid=ie7&rlz=1I7DKUS

Thursday, May 03, 2007

कौन यह किशोरी?



चुलबुली सी, लवँग लता सी,
कौन यह किशोरी ?
मुखड़े पे हास,रस की बरसात,
भाव भरी, माधुरी !
हास् परिहास, रँग और रास,
कचनार की कली सी,
कौन यह किशोरी?
अल्हडता,बिखराती आस पास,
कोहरे से ढँक गई रात,
सूर्य की किरण बन,
बिखराती मधुर हास!
कौन यह किशोरी?
भोली सी बाला है,
मानों उजाला है,
षोडशी है या रँभा है ?
कौन जाने ऐसी ये बात!
हो तेरा भावी उज्ज्वलतम,
न होँ कटँक कोई पग,
बाधा न रोके डग,
खुलेँ होँ अँतरिक्ष द्वार!
हे भारत की कन्या,
तुम,प्रगति के पथ बढो,
नित, उन्नति करो,
फैलाओ,अँतर की आस!
होँ स्वप्न साकार, मिलेँ,
दीव्य उपहार, बारँबार!
है, शुभकामना, अपार,
विस्तृत होँ सारे,अधिकार!
यही आशा का हो सँचार !

~~लावण्या~~

Saturday, April 28, 2007

अल्यूनाटाइम




यह
अत्याधुनिक किँतु पौराणिक चँद्रमा की घटने बढने की प्रक्रिया से जुडी हुई नई इजाद है. ३ वृत्ताकार वलयोँ से ज्वार - भाटा से पर्चालित समय को नई पध्ध्ति सेसमझने वाला यँत्र है --

--धुरी पर घुमती हमारी पृथ्वी के स्पँदनोँ से, आधुनिक सोचके साथ बिलकुल नई दिशा की ओर ले जाता अद्वितीय व वैज्ञानिक स्मारक है -इसके द्वारा हम समय को एक नये तरीके से समझ पायेँगे क्यूँकि यह चँद्रमा और समुद्र के ज्वार भाटा पर आधारित घडी है

४० मीटर का घेरा लिये ५ मँजिल ऊँचाई लिये,३ पुरानी सीमेन्ट से बनाया गया, पारदर्शक, अंडे के आकार का वृताकार स्मारक है -

इस के वलयोँ से चँद्रमा की किरणोँ के पसार होने से जो समय का ज्ञान होता है उसे अल्यूनाटाइम कहा गया है

हाल मेँ २०१२ तक इसको बनाये जाने की सँभावना है स्थान का चयन सँभवत यू.के. ग्रेट ब्रिटन, ओस्ट्रेलिया या लँदन हर मेँ मेरीडीयनपर इसके बनने की सँभावना है -- देखेँ लिन्क --

सूरज मुखिया


ओ,सूरजमुखी के फूल,
तुमने कितने देखे पतझड?
कितने सावन? कितने वसँत ?कितने चमन खिलाये तुमने?
कितने सीँचे कहो, मधुवन?
धूल उडाती राहोँ मेँ,चले क्या?
पगडँडीयोँ से गुजरे थे क्या तुम?
सुनहरी धूप, खिली है आज,
बीती बातोँ मेँ बीत गई रात,
अब और बदा क्या जीवन मेँ?
क्योँ ना कह लूँ मनकी मैँ बात!
तुम सुनते जाना साथी मेरे,
मैँ " सूरजमुखिया " ,तू दीखला बाट !
घूमते रहते सूरज के सँग सँग
मुर्झा जाते हो अँधकार आने पे,
मैँने खिलाये जो बाग बगीचे,
सौँप चला हूँ आज,तेरे हवाले !
करना रखवाली बगिया की तुम,
मैँ ना रहूँ कल,कहीँ, जो चल दूँ!
--लावण्या

Thursday, April 26, 2007

केन्द्रबिन्दु


प्रशाँत महासागर किनारे पर खडा ऐकाकी वृक्ष जो १७ मील लँबे तेज रफ्तार मार्ग पर पर्यटक आकर्षण का "केंद्रबिंदु" है जिसे देखकर मन न जाने, कई बार, कितने ही तानोँ बानोँ मेँ उलझ गया है !!
मेरी अम्मा श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा द्वारा बनाया हुआ चित्र



" पल पल छिन छिन,
कण कण बिन बिन,

सँजोये जो हर दिन

घुल मिल जाते यूँ,

बिँदु तुहीन जल से

महासागर मे मिल -
-अस्तित्व अलग है,
वारिधि का क्या ?

कण का क्या रज से ?

उस असीमता का पट,

ऊँचे अम्बर फलकसे ?

मुझमेँ निहारीकाएँ,
मैं आकाशगँगा मेँ,
एकाकार हुआ सर्व,

मौन गहन मनन मेँ !"
Ye Ek "Abstract " poem hai -- "Kendra Bindu" VYOM Mandal ka, CENTERAL Point hai .
VIRAT , ka ya BRAHM ka -- ya ATMAN ka bhee --

Every mili second, in the tinest of the atoms particles, that which is "preserved"
often merges into INFINITY ---
In Dew drops, in mighty Oceans,in all forms of WATER,
in every sand particle, stretching into beyond it all,
reflecting from the AAKASH , adorned with multitudes of Galaxies
where I am a STAR in the Milky Way ...when my SILENCE deepens
in my hour of Solitude !

-- लावण्या

लिखावट : कैसी हो ? ( Some unusual & Rare Documents )

~ वे हमेशा अपना लिखा हुआ ईश्वर के नाम के आरँभ के साथ आरँभ करतीँ हैँ
जी हाँ ,देखिये, पन्ने के ठीक बीचोँबीच लिखा है,
"श्रीकृष्ण" लिखावट : कैसी हो ?
मतलब इन्सान जबसे लिखना पढना शुरु करता है, अक्षरोँ से अपने मन की भावनाओँ को आकार देना शुरु करता है, तभी से लिखा हुआ एक एक अक्षर, 'दस्तावेज" की तरह सुरक्षित हो जाता है.
"ब्लोग - लेखन" भी हर इन्सान की सूझ बूझ, विचार शैली को लँबे अँतराल तक, समेटे, भविष्यमेँ कई सँभावनाएँ सँजोये, कुछ कहता हुआ, कुछ अपने लिये, कुछ किसी अन्य के लिये एक सत्य सा रखता हुआ, वैसा ही प्रामाणिक दस्तावेज बन पाये ये लिखनेवाले पर या तो 'सच्ची बातोँ " पर निर्भर होगा जो स्वयँ ही अपना आपा ढूँढेगा, बनायेगा या खो देगा !
यहाँ पर कई अलग तरह की लिखावट प्रस्तुत है ~
~हमारी सोच समझ जीवन के अनुभवोँ पर आधारित होती है, कई बार देख सुनकर वह ज्यादह परिपक्व होती है।
कुछ ऐसा भी लिख गए कि जिन्हेँ एक " माप - दण्ड " माना गया __ जैसे कि, कवि नाट्यकार रस शिरोमणि कालिदास या शेक्सपीयर !!
हिन्दी नाटिका " माधुरी" का प्रथम पृष्ठ देखिये __ आज "विश्वजाल" पर, "जाल घर" पर उपस्थित हो ही गया है ! ये पुस्तक मेरे पास है -- क्लीक करेँ और पढेँ --श्री भार्तेन्दु हरिस्चन्द्रजी की किताब का पहला पन्ना, हिन्दी साहित्य का प्रथम गौरवमय सोपान आज भी अपनी विजय पताका फेहराता, शान से
से खडा है !

हिन्दी नाटिका " माधुरी" का प्रथम पृष्ठ देखिये

और ये मेरे पुज्य पापाजी का देहली से लिखा हुआ पोस्ट कार्ड है -- जब वे आकाशवाणी को खडा करने मेँ सँलग्न थे -- आज भी "रानी बिटिया लावणी " का सम्बोधन पढकर, हल्की सी मुस्कान चेहरे पर छा ही जाती है ! अक्षर अवश्य धुँधले पड गये हैँ, स्याही भी सूख गई है कागज़ भी पुराना हो चला है पर उनकी भाव उमडवाने की क्षमता मेँ कोई कमी नहीँ आई !

और अँत मेँ यह चित्र मुझे भेजा गया था "ई मेल" के जरिये ~

~ कैलास पर्बत पर हिमपात का द्र्श्य कैमरे से लिया गया है !

गौर से देखिये, क्या जैसा आकार नहीँ दीखता ?? है ना विस्मय लिये बात ?

Sunday, April 22, 2007

घुंघरू क्या बोलेँ ?



घुंघरू क्या बोलेँ ?
क्या बोलेँ ? क्या बोलेँ ?
कह दो गोरिया ...
घुंघरु क्या बोले क्या बोले क्या बोले?
लाज लगे, पग रोके,
मुझे देख अकेली,पथ रोके,
पैन्जनीया, मनवा पग रोके पग रोके,
ना शोर मचा, जग जायेगा जग,
बढेगी मोरी उलझन,
ताको वे बोले, ये बोले,
घुँघरु ये बोले!
-- लावण्या

Thursday, April 19, 2007

मासूमोँ का खून बहा कर तुम्हेँ क्या मिला " चो " ?



कहाँ हमारे महान सँत महापुरुष और कहाँ ऐसे भूले भटके नवयुवक ? कितनी बडी खाई है -- सोचने मेँ , समझने मेँ -- जब ऐसे निर्मम युवा की तस्वीर यहाँ दे रही हूँ तब इस पापात्मा को मार्ग दीखलाने के लिये, इन विभूतियोँ को भी यहाँ आदरणीय स्थान देना चाहती हूँ -- शायद उनकी असीम अनुकँपासे इस जीव का उध्धार हो जाये, क्या पता ? :-(




मासूमोँ का खून बहा कर तुम्हेँ क्या मिला " चो " ?????
ये तस्वीरेँ हैँ जो न्युयोर्क के अखबार मेँ छपी हैँ --
दिवँगतोँ की आत्मा को परम कृपालु ईश्वर अपनी ज्योति मेँ समाहित करेँ और शाँति प्रदान करेँ यही नम्र प्रार्थना है मेरी !!!!
-- जीवन इसी का नाम है कहीँ पर शादी की खुशीयाँ, नाचगाना, सँगीत के स्वर गूँजते हैँ तो कहीँ मातम छाया रहता है दबी सिसकीयाँ सूनी आँखोँ स्वजन की आकृति की प्रतीक्षा करतीँ हैँ !
दुखद
समाचार है -- सोच रही हूँ कि, "चो" जैसे नवयुवक के आथ दूसरे युवा सहपाठीयोँ ने , ऐसा क्या किया होगा कि उसे इतना गुस्सा आ गया ?
बार युवा पीढी पर पढाई का बेहिसाब बोझ लाद दीया जाता है, आगामी भविष्व मेँ उन्हेँ अच्छी नौकरी की तलाश, मिलेगी या नहीँ ? पढाई कैसी रहेगी ? सफलता मिलेगी या नहीँ ? उस पर यौवनावस्था मेँ , किस तरह के मित्र मिलते हैँ, उनसे कैसे अनुभव हासिल होते हैँ , परिवार कहाँ तक सह्हयता कर पाता है, जीवन साथी की तलाश के दुर्गम पडाव, ये कई सारे मानसिक दबाव व तनाव रहते हैँ और इन सारे कोणोँ मेँ जहाँ भी रिक्त्तता रहती है, वहीँ से निराशा गहरे पानी की तरह आकँठ आ घेरती है --

Wednesday, April 18, 2007

ऐश्वर्या अगर भाभी बनने जा रहीँ हैँ तब सारे " देवरोँ " के लिये ये खास गुजरात का गीत हिन्दी शब्दोँ मेँ पेश कर रही हूँ







ऐश्वर्या अगर भाभी बनने जा रहीँ हैँ तब सारे " देवरोँ " के लिये ये खास गुजरात का गीत हिन्दी शब्दोँ मेँ पेश कर रही हूँ

" ओ भाभी मोरी महावर रचाई ल्यो"
मेहन्दी बोई थी मालव मेँ उसका रँग गया गुजरात रे,

भाभी मेरी महावर रचाई लो !
कुट पीस के भरी कटोरीयाँ,
ओ भाभी रचालो ना तुम्हारे हाथ रेभाभी, मेहँदी लगा लो !"

Sunday, April 15, 2007

नर्मदे हर ! नर्मेदे हर !--नर्मदा क्षेत्र के तीर्थ स्थान : भाग - ४


नर्मदा क्षेत्र के तीर्थ स्थान :

उत्तर दिशा मेँ स्थित यात्रा के स्थलोँ की सूची इस प्रकार है --१) परशुराम - हरी धाम २) भड भूतेश्वर, ३) भरुच,४) शुक्ल तीर्थ,५) शिमोर,६) बडा कोरल ७) नारेश्वर जो श्री रँग अवधूत जी का आश्रम स्थल है ८) माल्सार ९) झानोर १०) अनसुआ ११) बद्री नारायन १२) गँगनाथ १३ ) चानोड ,जो दक्षिण का प्रयाग कहलाता है १४ ) कर्नाली १५ ) तिलकवाडा १६) गरुडेश्वर १७) हम्फेश्वर १८) कोटेश्वर १९) माधवगढ या रेवाकुँड २०) विमलेश्वर या अर्धनारेश्वर २१) माहेश्वर २२) मँडेलश्वर २३) बडवाहा २४) ओम्कारेश्वर २५) २४ अवतार २६) श्री सीतावन २७) ध्याधि कुँड २८ ) सिध्धनाथ २९) भृगु कुत्छ ३०) सोकालीपुर ३१) ब्राह्मणघाट ३२) भेडाघाट३३) धुँधाधार ३४) तिलवाराघाट ३५) गौरीघाट ३६) जल हरी घाट ३७) मँडला घाट ३८) लिँग घाट या सूर्यमुखी नर्मदा ३९) कनैया घाट ४०) भीम कुँडी४१) कपिल धारा ४२) अमर कँटक धाम ४३) माँ की बगिया ४४) सोनधार या सुवर्ण प्रपात ४५) नर्मदा उद्`गमस्थली --
नर्मदा माई की प्रशस्ति, जगद्`गुरु श्री शँकराचार्य जी ने " नर्मदाअष्टक " की रचना करके भारतीय मानस मेँ प्रतिष्ठित कर दीया है
अक्सर कहा जाता है कि, "नदी का स्त्रोत और साधु का गोत्र कभी न पूछेँ ! "
परन्तु जब भी धीमे, शाँत जल प्रवाह को दुस्तर पहाड के बीच रास्ता निकाल कर बहते हुए जब भी हम देखते हैँ तब ये सवाल मन मेँ उठता ही है कि, इतना सारा जल कहाँ से आता होगा ?
इस
महान नदी का अस्त्तित्व कैसे सँभव हुआ होगा ?
जीवनदायी, पोषणकारी निर्मल जलधारा हमेँ मनोमन्थन करवाते हुए, परमात्मा के साक्षात्कार के लिये प्रेरित करती है जो इस शक्ति के मूल स्त्रोत की तरफ एक मौन सँकेत कर देती है --
पँचमहाभूतमेँ से जल तत्व आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से मानव शरीर सूक्ष्म रुप मेँ ग्रहण करता है उसीसे जल तत्व से हमारा कुदरती सँबध शापित हुआ है -- जल स्नान से हमेँ स्फुर्ति व आनण्द मिलता है - थकान दूर होकर मन और शरीर दोनोँ प्रफुल्लित होते हैँ और जब ऐसाअ जल हो जो प्रवाहमान हो, मर्र मर्र स्वर से कल कल स्वर से बहता हो , सँगीत लेकर चलता हो, शीतल हो तब तो प्रसन्नता द्वीगुणीत हो जाती है ! और ऐसा नदी स्नान हमारी स्मृतियोँमेँ सदा के लिये बस जाता है ! जिसकी याद आती रहती है --

लेखिका : लावण्या


(पावन नदी नर्मदा) नर्मदे हर ! नर्मदे हर! ": भाग - ३


भारत मेँ एक यह भी रीवाज है कि, पावन नदीयोँ की परिक्रमा की जाये ! मनमेँ प्रार्थना लिये, हाथ जोडे, प्रणाम करते हुए, अगर भक्ति भाव सहित, नदी की परिक्रमा की जाये तब नर्मदा माई आपकी इच्छाओँ को पूरी करेँगी ऐसी लोक मान्यता है --
" निर्धन को मिले धन,
बांझ को मिले बालक,
अँधे को मिले दर्शन,
नास्तिक को मिले भक्ति, टूटे
सारे बँधन, नर्मदे हर ! नर्मदे हर! "
जिस भूमि पर नर्मदा की पावन धारा बहती है वह तपनिष्ठ भूमि है - भक्तोँ की मान्यता है कि, यमुना नदी के जल के ७ दिन समीप रहने के बाद, उसका जल पीते रहने के बाद, पूजा करने के बाद ,सरस्वती नदी के जल का प्रभाव ३ दिन के बाद, गँगाजी के जल को स्नान कर, डूबकी लगाने के बाद मनुष्य के इकत्रित हुए पापोँ को धो देता है परँतु नर्मदा ऐसी पावन नदी है कि,जिसके बस दर्शन करते ही वो इन्सान के पाप धो देतीँ हैँ !
दोनों ही किनारे ये पावनकारी क्षमता रखते हैँ !
जिन ऋषियोँ ने नर्मदा नदी के समीप तपस्या की , जप तप व यज्न्ज कीये उनकी सूची बडी लँबी है - कुछ नाम प्रमुख हैँ - जैसे, कि, इन्द्र, वरुण, कुबेर, व्यास, सनत कुमार, अत्रि ऋअषि, नचिकेता, भृगु महाराज, च्यवन, पिप्पलाद`, वशिष्ठ, ऋअषि, भर्द्वाज ऋअषि, कश्यप, गौतम, याज्ञवल्क्य,मार्केण्देय, शुकदेव, राजा पुरुरवा, नृपति मान्धाता, हीरण्यरेति, श्रीरँग अवधूत इत्यादी
लेखिका : लावण्या

Saturday, April 14, 2007

नर्मदे हर ! नर्मेदे हर! -- भाग - २


इतिहास साक्षी रहा है नदीयोँ के आसपास के इलाकोँ का कि किस तरह प्राचीन सभ्यताओँ का , ग्राम्य व नगरोँ मेँ परिवर्तन होना नदी तट पर ही , सँभव हुआ है.जल की सुविधा, भूमि का बाहुल्य, नदीओँ के समीप, आबादी के बसने मेँ सहायक सिध्ध हुए. नदी की सँपदा से ही कायमी पडाव मनुष्य की सभ्यता के सोपान बने.युप्फेटीस, टाएग्रीस, नदीने मेसोपोटेमीया की सभ्यता रखी, याँग काई शेक व सीक्याँग नदीयोँ के तटोँ पर चीन की सभ्यता पनपी और भारत की सिँधु नदी ने सिँधु घाटी की सभ्यता की नीँव रखी थी - नाइल नदी ने उसी तरह, प्राचीन इजिप्त की सँस्कृति व सभ्यता के सुमन खिलाये थे -गँगा यमुना व इन नदीयोँ की सहभागी धाराओँ ने, उत्तर भारत को सदीयोँसे सीँचा है अपने जल से जीवित रखा हुआ है -- उत्तराखँडॅ आज भी आबाद है ये सारे उदाहरण ही हमसे नदीयोँ को " सँस्कृति और सभ्यता की जननी " की उपमा दीलवाते हैँ -- उन्हीँ के प्राणदायी जल से मनुष्य प्रगति की गाथा के आध्याय लिखे गये हैँ और आगे भी, लिखे जायेँगे -- नदी सभ्यता रुपी शिशु को गोद मेँ लिये दुलार करती हुई " माँ " स्वरुप हैँ --
जो बात हम अन्य वैश्विक स्तर की नदीयोँ के बारे मेँ कह रहे हैँ वही नर्मदा नदी पर भी लागू होती है - नर्मदा नदी के किनारोँ पर बसे लोगोँ के लिये वे " लोक -माता" हैँ इतना ही नहीँ वे " परा ~ शक्ति, जगदम्बा स्वरुपिणी" हैँ जो कि " विश्वमाता स्वरुपा" भी हैँ -- इस वर्तमान समय मेँ, कच्छ, समूचा गुजरात नर्मदा की पावन जल धारा का अमृतदायी जल अपनी भूमि की प्यास बुझाने हेतु चाहता है नर्मदा के आशीर्वाद के बिना इन प्राँतोँ का उत्कर्ष और खुशहाली असँभव जान पडते हैँ --
क्र्मश: --
: लावण्या

Friday, April 13, 2007

नर्मदे हर ! नर्मेदे हर ! -- भाग - १


नर्मदा, नदी पवित्रता, उपयोगिता और भारतीय सँस्कारोँ की नदी है -
महायोगी श्री मोटाभाई जी जो बाल - ब्रह्माचारी थे, उन्होँने नर्मदा तट पर प्रखर साधना की थी --
पुराण कालसे नर्मदा का आँचल, तपस्वीयोँ की , योगियोँ की, तपोभूमि रही है -
मोटाभाई की पवित्र वाणी मेँ उनकी साधना से जुडे कुछ क्षणोँ के बारे मेँ सुनिये ~~
" नर्मदा का पवित्र जल बडा मीठा हुआ करता था उन दिनोँ ! परँतु, " मीठा" मैँ उस जल को महज भक्ति या आदर से ही नहीँ कह रहा हूँ - ऐसा था कि उस समय मेँ ,जब मैँने नर्मदा माई की गोद मेँ मेरी तपस्या शुरु की थी उस समय नदी के आसपास बडा घना जँगल हुआ करता था ! विशाल , हरेभरे घटादार वृक्ष जैसे जाम्बु और आँवला इत्यादि बडी सँख्या मेँ पाये जाते थे -
इन पर मधु मख्कीयोँ के बृहदाकार छत्त्ते टँगे रहते थे जिन से रीस रीस कर कई सारा मधु, नर्मदा के जल मेँ घुलमिल जाता था !
हम, मैँ और मुझ जैसे अन्य तपस्वी , सूर्य उपासना करने जल मेँ पैठते थे व जल को मुँह मेँ ले कर पीते थे वह जल बडा ही शीतल और मधुर हुआ करता था -- ताजे मधु के मिश्रण से मीठा जल हमेँ बडी तृप्ति देता था ! सँजीवनी की तरह जीवन दान देता हुआ, शरीर को नई उर्जा देता हुआ! "
श्री मोटाभाई ९० वर्ष तक जीवित रहे - मुझे सौभाग्यवश उनका सानिन्ध्य उनके जीवन के पिछले वर्षोँ मेँ मिला चूँकि वे बम्बई शहर के, पूर्व विले पार्ला उप नगर मेँ अपने फ्लेट मेँ रहे -
उन्हेँ नर्मदा नदी की याद, तब भी आती रही !
वह मीठा -मधुर शीतल जल उन्हेँ बारबार याद आता रहा -
बडे दु:खके साथ वे कहा करते थे कि,
" अगर पर्यावरण के दूषण स्वरुप वे पुराने पेडोँ को काट दिया गया हो तब तो वे मधु मख्कीयोँ के छत्ते भी गए तब मेरी नर्मदा माई का जल पहले जैसा मीठा कैसे रहा होगा ? "
पूज्य मोटाभाई का यह कथन, यह सत्य , जो स्वयम पर प्रमाणित हुआ था , हमेँ आस्चर्य मेँ डाल सकता है --
आधुनिक भारत मेँ कई बडे बदलाव आये हैँ हमारी मातृभूमि का स्वरुप काल के प्रवाह के साथ कई प्रकार से बदल चुका है -- उसी तरह, नदीयाँ और उनके बहाव व तटोँ मे अभूतपूर्व परिवर्तन हुए हैँ -
वर्तमान भारत मेँ, " नर्मदा बचाओ आँदोलन " ने फिर एकबार "नर्मदा" नदी पर लोगोँ का ध्यान केँद्रीत कर दिया है --
मध्य भारत की , गँगा, यमुना के बाद, नर्मदा, ही सबसे ज्यादह पूजनीय नदी है --
कहा जाता है कि, नर्मदा " कन्या - कुमारीका नदी " हैँ जबकि, गँगा मैया " सदा सुहागिन नदी " हैँ !
( लेखिका: लावण्या )

Thursday, April 12, 2007

प्रथम भारतीय मूल का चित्र


प्रथम भारतीय मूल के चित्र का विषय था एक राज पुरोहित का पुत्र!

ऐसी मान्यता है --
जिसकी अकाल मृत्यु हो गई थी.

शोक सँतप्त राज पुरोहित ने, अपने राजा से कहा कि
" कोई उपाय करेँ राजन्` कि जिससे मेरा यह मृत पुत्र फिर जीवित हो उठे !"
तब राजा ने सुझाव दीया कि, "सृष्टि के सर्जक ब्रह्माजी की पूजा करने से, उनकी तपस्या करने से शायद वे प्रसन्न होँ और मृत युवा को पुन: जीवन दान दे देँ "
तब ब्रह्माजी की तपस्या की गई - ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर आदेश किया कि, उस युवान की छवि बनाई जाये -- तब प्रथम चित्र का सृजन हुआ !

ब्रह्माजी ने अपने श्वास फूँके तो वह छवि/ चित्र , साँस लेते युवक मेँ परिवर्तित हो गया -

ये कथा, चित्रकला विषय पर , सबसे पुरानी लिखी गई पुस्तक, " चित्रलक्शणा" मेँ आती है


Saturday, April 07, 2007

महाभारत


ये मेरे पापाजी की यशस्वी " कवि यात्रा " का
अँतिम सोपान था आप सब को मेरे सादर स्नेह भेज रही हूँ
- विनीत्,

लावण्या

Now Playing in HIGH Bandwidth(for 512 kbps and above)
(for 256 kbps and above)
Title: Episode 1

Artist: Raj Babbar, Asha Lata, Ram Mohan, Kiran Juneja, Prem Sagar, Abha Mishra, Rafique Mukadam, Rishabh Shukla

Producer: B.R ChopraDirector: Ravi Chopra

Music: Raj Kamal

Lyrics: Pandit Narendra Sharma






Thursday, April 05, 2007

तसव्वुर

आपकी याद
आती है,
जैसे हल्के से ..
मध्धम सी रोशनी मेँ
मेरी ज़िँदगानी ,
मुस्काती है -
और आपके रँगीन
तसव्वुर के
दीदार से
मेरी शामेँ ,
झिलमिलातीँ हैँ !
बादेसबा इठला के,
कोई धुन,
गुनगुनाती है ~~
और न जाने कैसे,
बेइन्तहा कलियाँ,
फूल बन के,
मुस्कुराती हैँ !
-- लावण्या

Wednesday, April 04, 2007

उडान


उडान

गीत बनकर गूँजते हैँ, भावोँ के उडते पाख!

कोमल किसलय, मधुकर गुँजन,सर्जन के हैँ साख!

मोहभरी, मधुगूँज उठ रही,कोयल कूक रही होगी-

प्यासी फिरती है, गाती रहती है,कब उसकी प्यास बुझेगी?

कब मक्का सी पीली धूप,हरी अँबियोँ से खेलेगी?

कब नीले जल मेँ तैरती मछलियाँ, अपना पथ भूलेँगीँ ?

क्या पानी मेँ भी पथ बनते होँगेँ ?होते होँगे,बँदनवार ?

क्या कोयल भी उडती होगी,निश्चिन्त गगन पथ निहार ?

मानव भी छोड धरातल, उपर उठना चाहता है -

तब ना होँगे नक्शे कोई, ना होँगे कोई और नियम !

कवि की कल्पना के पाँख उडु उडु की रट करते हैँ!

दूर जाने को प्राण, अकुलाये से रहते हैँ

हैँ बटोही, व्याघ्र, राह मेँ घेरके बैठे जो पथ -

ना चाहते वो किसी का भी भला न कभी !
याद कर नीले गगन को, भर ले श्वास उठ जा,

उडता जा, "मन -पँखी" अकुलाते तेरे प्राण!

भूल जा उस पेड को, जो था बसेरा तेरा, कल को,
भूल जा , उस चमनको जहाँ बसाया था तूने डेरा -

ना डर, ना याद कर, ना, नुकीले तीर को !

जो चढाया ब्याघने,खीँचे, धनुष के बीच!

सन्न्` से उड जा !छूटेगा तीर भी नुकीला -

गीत तेरा फैल जायेगा,धरा पर गूँजता,

तेरे ही गर्म रक्त के साथ, बह जायेगा !

एक अँतिम गीत ही बस तेरी याद होगी !

याद कर उस गीत को, उठेगी टीस मेरी !

"मन -पँछी "तेरे ह्रदय के भाव कोमल,

हैँ कोमल भावनाएँ, है याद तेरी, विरह तेरा,
आज भी, नीलाकाश मेँ, फैला हुआ अक्ष्क्षुण !

-- लावण्या

Saturday, March 31, 2007

नित प्रियम भारत भारतम्






नित प्रियम भारत भारतम्

मुझे, भारत बडा ही प्रिय है इस तथ्य का कारण बडा सीधा है,

चूँकि, भारत , भारत है, और मैँ -मैँ हूँ !

भारत वह भूमि है, जहाँ पर मैँने जन्म लिया. वहीँ पर मैँ पल कर बडी हुई - मेरी आत्मा, मेरा शरीर, मेरा लहू, मेरी हड्डियोँ का ये ढाँचा और मेरा मन, भारत के आकाश तले ही पनपे - भारत, मेरे पूर्वजोँ की पुण्यभूमि रही है - भारत मेँ ही मेरे पित्री जन्मे और चल बसे !भारत ही वह भूमि है, जहाँ मेरे पिता व माता जन्मे और पल कर बडे हुए -श्री राम ने जब स्वर्णसे दमकती हुई लँकानगरी देखी थी तब उन्हेँ अपनी जन्मभूमि " अयोध्या" याद आ गई थी - तब अपने अनुज लक्ष्मण से कहाथा, " हे लक्ष्मण ! न मे रोचते स्वर्णमयी लँका ! जननी ! जन्मभूमिस्च` , स्वर्गादपि गरीयसी !"

भारत ने मुझे यादोँके भरपूर खजाने दीये हैँ ! मुझे याद आती है, उसकी शस्य श्यामला भूमि, जहाँ घने, लहलहाते वृक्ष, जैसे कि, विशाल वटवृक्ष,चमकीला कदलीवृक्ष, आमोँके मधुर भारसे दबा, आम्रवृक्ष, आकाशको प्रणाम करता देवदारु, शर्मीला नीम का पेड, अमलतास, कनेर, नारिकेल, पलाश तथा और भी न जाने कितने और जो आज भी हर भारतीय को पुकारते हैँ --

कभी याद आती है, मनोरम फूलोँकी ! वे सुँदर फूल, जैसे, कदम्ब, पारिजात, कमल, गुलाब, जूही, जाई, चमेली, चम्पा, बकुल और भीनी भीनी, रात की रानी ! और भी कितनी तरह के फूल अपने चित्ताकर्षक छटासे , अपनी भोली मुस्कान से, व मदमस्त सुगँधसे हर भारतीय की आत्मा को तृप्त कर रहे हैँ -

मुझे याद हैँ वे रसभरे, मीठे फल जो अपने स्वाद व सुगँध मेँ सर्वथा अजोड हैँ ! सीताफल, चीकू, अनार, सेब, आम, अनानास, सँतरा, अँगूर, अमरुद,पपीता, खर्बूजा,जामुन,बेल,नासपाती- और भी कई जो मुँहमेँ रखते ही, मनको तृप्ति और जठराग्नि को शाँत कर देते हैँ -

मुझे याद आती है वह भारतीय रसोईघरॉ से उठती मसालोँ की सुगँध ! कहीँ माँ, या कहीँ भाभी, तो कहीँ बहन या प्रेयसी के आटे सने हाथोँ पर खनकती वह चूडियोँ की आवाज! साथ , हवा मेँ तैरती, जीरे, कालिमीर्च, लौँग, दालचीनी, इलायची, लाल व हरी मिर्च, अदरख, हीँग, धनिये, सौँफ, जायफल, जावन्त्री वगैरह से उठती उम्दा गँध! तरकारी व दाल के साथ, फैलकर,स्वागत करती, आरोग्यप्रद, सुगँधेँ जिसे हर भारतीय बालकने जन्म के तुरँत बाद, पहचाननी शुरु कर दी थी !

भारत की याद आती है तब और क्या क्या याद आता है बतलाऊँ ?

हाँ, काश्मीर की फलो और फूलोँसे लदी वादीयाँ और झेलम नदी का शाँत बहता जल जिसे शिकारे पर सवार नाविक अपने चप्पू से काटता हुआ, सपनोँ पे तैरता सा गुजर जाता है ! कभी यादोँ मेँ पीली सरसोँ से सजे पँजाब के खेत हवामेँ उछलकर मौजोँ की तरँगोँ से हिल हिल जाते हैँ - उत्तराखँड के पहाडी मँदिरोँ मेँ , कोई सुहागिन प्राचीन मँत्रोँ के उच्चार के साथ शाम का दीया जलाती दीख जाती है -- तो गँगा आरती के समय, साँध्य गगन की नीलिमा दीप्तीमान होकर, बाबा विश्वनाथ के मँदिर मेँ बजते घँटनाद के साथ होड लेने लगती है -- मानोँ कह रही है,

" हे नीलकँठ महादेव! आपकी ग्रीवा की नीलवर्णी छाया, आकाश तक व्याप्त है!"

कभी राजस्थान व कच्छ के सूनसान रेगिस्तान लू के थपेडोँ से गर्मा जाते हैँ और गुलाबी, केसरिया साफा बाँधे नरवीर, ओढणी ओढे, लाजवँती ललना के साथ,गर्म रेत पर उघाडे पग , मस्ती से चल देता है !

कभी गोदावरी, कृश्णा, कावेरी मेँ स्नान करते ब्राह्मण , सरयू, नर्मदा या गँगा- यमुना मेँ गायत्री वँदना के पाठ सुनाई दे जाते हैँ - कालिँदी तट पर कान्हा की वेणु का नाद आज भी सुनाई पडता है - लहराते जल के साथ, न जाने कितनी प्रार्थनाएँ घुलमिल जातीँ हैँ --आसाम, मेघालय, मणिपुर , अरुणाँचल की दुर्गम पहाडीयोँ से लोक -नृत्योँ की लय ताल,वन्य जँतुओँ व वनस्पतियोँ के साथ ब्रह्मपुत्र के यशस्वी घोष को गुँजायमान कर देते हैँ !

सागर सँगम पर बँगाल की खाडी का खारा पानी, गँगामेँ मिलकर, मीठा हो जाता है -- दक्षिण भारत के दोनोँ किनारोँ पर नारिकेल के पेड , लहराते, हरे भरे खेतोँ को झाँककर हँसते हुए प्रतीत होते हैँ - भारत का मध्यदेश, उसका पठार, ह्र्दय की भाँति पल पल, धडकता है -- भारत के आकाश का वह भूरा रँग, शाम को जामुनी हो उठता है गुलाबी, लाल, फिर स्वर्ण मिश्रित केसर का रँग लिये, उषाकाश सँध्या के रँगोँ मेँ फिर नीलाभ हो जाता है -- हर रात्रि, काली , मखमली चादर ओढ लेती है जिसके सीनेमेँ असँख्य चमकते सितारे मुस्कुरा उठते हैँ कौन है वह चितेरा, जो मेरे प्यारे भारत को इतने , विविध रँगोँ मेँ भीगोता रहता है ?

मुझे प्यार है, भारत के इतिहास से! भारतीय सँस्कृति, सभ्यता तथा भारत की जीवनशैली, गौरवमयी है -

२१ वीँ सदी के प्रथम चरण के द्वार पर खडा भारत, आज विश्व का सिरमौर देश बनने की राह पर अग्रसर है - उसके पैरोँ मेँ आशा की नई पदचाप सुनाई दे रही है -- भारत के उज्ज्वल भविष्य के सपने, हर भारतीय की आँखोँ मेँ कैद हैँ ! हर भारतीय बालक की मुस्कान मेँ वे छिपे हुए हैँ -- भारत की हर समस्या, हर मुश्किल मेरा दिल दहला जातीँ हैँ --

भारत से दूर रहकर भी मुझे उसकी माटी का चाव है ! मेरा मन लोहा है और भारत, लौहचुम्बक ही रहा ! भारत की रमणीयता, एक स्वछ प्रकाश है और मेरा मन , एक बैचेन पतँगा है ! भारत मेरी यात्रा का, अँतिम पडाव है -- भारत भूमि के प्रति मेरी लालसा , मेरी हर आती जाती, साँसोँ से और ज्यादा भडक उठती है -

भारतभूमि पर ही, मेरा ईश्वर से साक्षात्कार हुआ -- ईश्वरदत्त, इन्द्रीयोँ से ही मैँने, "पँचमहाभूत" का परिचय पाया और अँत मेँ यह स्थूल शरीर सूक्ष्म मेँ विलीन हो जायेगा ! लय की गति, ताल मेँ मिल जायेगी रह जायेँगेँ बस सप्त स्वर!

भारतभूमि मेरी, माता है और मैँ एक बालक हूँ जो बिछूड गया है -- भारत, हरे बाँस की बाँसुरी है, और मेरे श्वास, उसमेँ समाकर, स्वर बनना चाहते हैँ ! मेरी आत्मा का निर्वाण, भारता ही तो है ! प्रेम व आदर से भरे मेरे यह शब्द, उसका बखान, उसकी प्रशस्ती,मेरे तुच्छ विचार ये सभी मिलकर भी अपने मेँ असमर्थ हैँ --

मैँ, बात सिर्फ इतनी ही कहना चाहती हूँ कि, मुझे, भारत क्योँ प्रिय है ?

कितना गर्व है, मुझे, भारत के महान व्यक्तियोँ पर !

अनँत दीपशिखा की तरह उनकी लौ, अबाध, अटूट है -- श्री राम, श्री कृष्ण, बुध्ध, महावीर, कबीर, मीराँ, नानक, तुलसीदास, चैतन्य,रामकृष्ण, विवेकानँद, और अन्य कईयोँ की ज्योति, आज भारत माता की महाज्वाला को, प्रकाशित किये हुए है --भारत के बहादुर, सूरमा , शूरवीर पुत्रोँ की यशोगाथाओँ से आज भी सीना गर्वसे तन जाता है ! चँद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, चाणक्य, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज, प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, सुभाषचँद्र बोज़, भगत सिँह की देशभक्ति आज भी गद्`गद्` किये देती है --

भविष्य के कई " महाप्राण "भारत क मँच पर, प्रकट होने के लिये तैयार खडे हैँ !

भारत, तपस्वीयोँ, शूरवीरोँ, योगियोँ की पुण्यशीला भूमि थी, है और रहेगी -- अमर आत्माएँ शृँखला मेँ बँधे हैँ और भविष्य भी बँधा है --

भारत के ऋषि मुनियोँ ने, "ॐ" शब्द की " महाध्वनि" प्रथम बार अनुभव सिध्ध की थी -- महाशिव ने, "प्रणव मँत्र " की दीक्षा दे कर, ऋक्`- साम्` - यजुर व अथर्व वेदोँ को , वसुँधरा पे अवतीर्ण किया था -- ब्रह्माँड, ईश्वर का सृजन है -- इस विशाल ब्रह्माँड मेँ, अनेकोँ नक्षत्र, सौर मँडल, आकाश गँगाएँ, निहारीकाएँ, व ग्रह मॅँडल हैँ - इन अगणित तारकोँ के मध्य मेँ पृ थ्वी पर, भारत ही तो मेरा उद्`भव स्थान है !

इस समय के पट पर " समय" आदि व अँतहीन है -- इस विशाल उथलपुथल के बीच, जो कि, एक महासागर है जिसका न ओर है न छोर, मैँ एक नन्ही बूँद हूँ !

इस बूँद को भारत के किनारे की प्यास है -- उसी की तलाश है -- मुझे, भारत हमेशा से प्रिय है और रहेगा ! समय के अँतिम छोर तक! भारत मुझे प्रिय रहेगा ! मेरी अँतिम श्वास तक, भारत मुझे प्रिय रहेगा, नित्` प्रिय रहेगा !

" नित प्रियम भारत भारतम ...

स्वागतम्, शुभ स्वागतम्, आनँद मँगल मँगलम्`,

नित प्रियम भारत भारतम , नित प्रियम्, भारत्, भारतम "

( ये गीत एशियाड खेल के समय, भारत गणराज्य की राजधानी दिल्ली मेँ बजाया गया था -- जिसे शब्द दीये-- मेरे स्वर्गीय पिता पँडित नरेन्द्र शर्माजी ने और स्वर बध्ध किया था पँडित रविशँकर जी ने - इसी गीत के अँग्रेजी अनुवाद को पढा था श्री अमिताभ बच्चन जी ने )


Thursday, March 29, 2007

मेरे हस्ताक्षर



सूरज दादा

सूरज दादा हँसकर उग आये पूर्व दिशा मेँ
काली रात के पर्दे को चीरकर, उगा प्रकाश,
सारे जानवर, खुश हैँ, जाग कर,अब,
फिर नये दिन का उगा है ये प्रात
आज,उमँगोँ की पतँग डोर के सहारे उड चली,
नीले आसमान के पार, हिलती डुलती,
थामे हैँ हाथोँ मेँ "जिम्मी जी", पीली डोर !
"टाइगर" छतरी ताने सुस्ताये,
ऊँघेँजागेँ,"टोमसन" घूरे नीली गेँद को बारबार,
और मछलियाँ जल से झाँक मुस्कायेँ!
छिप गई "मिन्नी" ऊँचे पेड जा दुबकी,
पहरे पे " टोमी जी" बैठकर, गुर्रायेँ !
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ये कविता चित्र को देखकर लिखी गई है
आशा है, पसँद आयेगी
~~~ लावण्या

चाँद उग आया पूनम का + " क्षितिज पत्रिका"

सौ. हर्षा व अम्ररेन्द्रजी - ग्रेन्ड केनीयन के आगे खडे हुए हैँ


चाँद उग आया पूनम का ...

------------------------------

चाँद उग आया पूनम का ...

नीले स्याह आकाश मेँ,

क्षितिज रेखा से उतर,

उज्ज्वलतम, चँद्र शरद का,

ठिठुरती, काली रात मेँ,

चाँद उग आया पूनम का ...
सूखी टहनियोँ ने भी

अपनी बाँहेँ उचकाकर,

सहलाया, दुलराया, पास बुलाया,

जाडे की सिहरन मेँ, हिल हिलकर,

जर्जर आँचल मेँ, उसे छिपाया !

चाँद उग आया पूनम का ...



" क्षितिज पत्रिका" , वेब पर भी उपलब्ध है जिसे बडे जतन से

मेरे युवा मित्र , भाई श्री अमरेन्द्र जी कडी कठिनायोँ के बावजूद,

नियमित रुपसे प्रकाशित करते हैँ -

हिन्दी सेवा का ये सफल प्रयास उत्तर अमरीका मेँ ,

कार्यरत रहते हुए,

बिना किसीके सहयोग के भी

अमरेन्द्र जी ने कर दीखलाया है.

उनकी पत्नी सौ . हर्षा ने भी ये जिम्मेवारी को सुँदर चित्रोँ से सजाकर

एक आदर्श दम्पत्ति का उदाहरण पेश किया है.

मेरी यह कृति "मैँ ," क्षितिज " पत्रिका व उसीके वेब सँस्करण के लिय्रे,

शुभेच्छाओँ के साथ, समर्पित करती हूँ -

- साथ ही,

"नव - दम्पत्ति जहाँ भी रहेँ, सुख से रहेँ "

ये भी कामना करती हूँ -

- अस्तु,

प्रस्तुत है क्षितिज के लिये लिखी मेरी निम्न कविता : ~~

Wednesday, March 28, 2007

दिवा -स्वप्न


दिवा -स्वप्न

~~~~~~~~~~~~

बचपन कोमल फूलोँ जैसा,

परीयोँ के सँग जैसे हो सैर,

नर्म धूप से बाग बगीचे खिलेँ

क्यारीयोँ मेँ लता पुष्पोँ की बेल

मधुमय हो सपनोँ से जगना,

नीड भरे पँछीयोँ के कलरव से

जल क्रीडा करते खगवृँद उडेँ

कँवल पुष्पोँ,पे मकरँद के ढेर!

जीवन हो मधुबन, कुँजन हो,

गुल्म लता, फल से बोझल होँ

आम्रमँजरी पे शुक पीक उडे,

घर बाहर सब, आनँद कानन हो!

कितना सुखमय लगता जीवन,

अगर स्वप्न सत्य मेँ परिणत हो!

--- लावण्या

Monday, March 26, 2007

मानवता

" मानवता " किन,किन रुपोँ मेँ दीख जाती है ?
सोचो सोचो, अरे साथीयोँ गौर करो इन बातोँ पे
कहीँ मुखर हँसी मेँ खिलती वो, खिली धूप सी,
और कहीँ आशा- विश्वास की परँपरा है दर्शाती,
कहीँ प्राणी पे घने प्रेम को भी बतलाती
-वात्सल्य, करुणा,खुशी,हँसी,मस्ती के तराने,
आँसू,या विषाद की छाया बन कर भी दीख जाती
यही मानव मन से उपजे भाव अनेक अनमोल,
मानवता के पाठ पढाते युगोँ से, अमृत घोल !
-- लावण्या -

Friday, March 23, 2007

आमँत्रण



समय की धारा मेँ बहते बहते,
हम आज यहाँ तक आये हैँ
-बीती सदीयोँ के आँचल से,
कुछ आशा के, फूल चुरा कर लाये हैँ !
हो मँगलमय प्रभात, पृथ्वी पर,
मिटे कलह का कटु उन्माद !
वसुँधरा हो हरी -भरी फिर,
चमके खुशहाली का प्रात: !!
-- लावण्या

उर्जा



उर्जा :
उर्जा का दुरउपयोग अणु विस्फोट मेँ देखा गया.
जब प्रकाश नियँत्रित साधनोँ मेँ दीखलाई पडे जैसे कि दीये मेँ
तब यही उर्जा व प्रकाश सुख समृध्धि और खुशहाली के सँदेश लाता है.
अर्जुन ने ईश्वर का विश्वरुप दर्शन, कुरुक्षेत्र के युध्ध मैदान मेँ किया -
जो ऐसे असम्ख्य अणु विस्फोटोँ से भी ज्यादा कई गुणा प्रखर था ऐसी मान्यता है.

एक धमाका ! भूकम्पोँ से भी ज्यादा

-आकाश पर उठता जहरीला गुबार-

मौत से साक्षात्कार, मशरुम आकार !

हिरोशीमा शहर की हस्ती नहीँ रही!

-मौत की भेँट, हरेक रुह हो गई

-हील गई नीँव, मानव सभ्यता की -

और फिर,

देर तक छाई रही...खामोशी !!



Wednesday, March 21, 2007

..७० फीट समुद्र के गर्भ मेँ..: Oceans






धरर्ती का अधिकाँश हिस्सा समुद्र, सागर, सँमँदर से पटा हुआ है. असँख्य जीव जँतु विशालकाय मत्स्य,जीँघे, शँख, सीपीयाँ और भी न जाने क्या क्या समुद्र के पानी की तहोँ मेँ छिपे रहते हैँ !
कितनी खुशी की बात है जब, आज के युग मेँ, पानी मेँ गहरे तक उतर कर, प्रवाल के फूलोँ के बाग दीख जाते हैँ और तेज यँत्र चालित नौका मेँ बैठ कर, खारे पानी की तेज बौछार से भीगते हुए,
हवा और पानी पर साथ साथ, उडने का एहसास भी होता है तब बिलकुल नया रोमाँच महसूस किया जा सकता है .
मुझे खुशी है कि, बिटिया सिँदुर ने 'डीप डाइवीँग" = मतलब " समुद्र की गोताखोरी " का बाकायदा प्रशिक्षण लिया अपने पति ब्रायन के साथ और कैरेबीयन समुद्र मेँ ७० फीट तक की गहराई तक सफलता से उतर कर, प्रवाल के, जल मेँ लहराते पौधे देखे !!.
.सेँट लुसीया के टापू पर अपने प्रशिक्षक के साथ
..व ब्रायन व सिँदूर, ७० फीट गहराई मेँ, तैरते हुए...

चाँद मेरा साथी है.............


चाँद मेरा साथी है.............और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके, मेरी सारी बात!
चाँद मेरा साथी है.............

चाँद चमकता क्यूँ रहता है ?
क्यूँ घटता बढता रहता है ?
क्योँ उफान आता सागर मेँ ?
क्यूँ जल पीछे हटता है ?
चाँद मेरा साथी है.............
और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके, मेरी सारी बात!

क्योँ गोरी को दिया मान?

क्यूँ सुँदरता हरती प्राण?

क्योँ मन डरता है, अनजान?

क्योँ परवशता या अभिमान?

चाँद मेरा साथी है.............
और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके, मेरी सारी बात!

क्यूँ मन मेरा है नादान ?

क्यूँ झूठोँ का बढता मान?

क्योँ फिरते जगमेँ बन ठन?

क्योँ हाथ पसारे देते प्राण?

चाँद मेरा साथी है.............
और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके, मेरी सारी बात!





कल

कल कल कल...करता,
बीत गया कल !
अब कल है, आनेवाला !
जीवन के निर्झर से झर, झर
झरना, रीत गया !
झर, झरना, रीत गया !
कल सा ही बीत गया !
सागर के स्वर से मर्र मर्र कर,
जब सपना टूट गया
-कोई अपना छूट गया !
कल सा ही बीत गया !
रवि के कण से,
निसृत, छन कर,
जब अँबर टूट गया !
घन अँबर रुठ गया !
री, कल सा टूट गया!
सरिता के जल से विकल , निकल,
कल कल स्वर रीस गया !
स्वर आगे निकल गया
-कल सा ही बिखर गया !
-- लावण्या

Monday, March 19, 2007

हुस्न पहाडोँ का : ~~


" पर्बत के पीछे चँबे दा गाँव मेँ , गाँव मेँ २ प्रेमी रहते हैँ "

लता जी का गाया हुआ ये गीत ...अकसर पहाडोँ की याद दीला जाता है!
किसी पहाडी युवती के सीने से उठती आग से वादीयाँ धूँआ धूँआ हो जातीँ हैँ कोहरे से लिपटी सर्द हवाओँ को चीरती हुई आवाज, बरबस, परदेश से पधारे, सैलानीयोँ के पैर रोक लेती है ...मानोँ कह रही होँ कि,
" कुछ पल को रुक जाओ !हमारे ख्वाबगाह मेँ तशरीफ ले आये हो
तब कुछ पल इस सुकून को महसूस करो "


Kanchanjangha : कँचनजँघा हिमालय पर्बत की एक विस्तृत शृँखला

माँ धरती प्यारी

A Bird named TOUCAN
Gulabee Champe ke phool
कितनी सुँदर अहा, कितनी प्यारी,
ओ सुकुमारी, मैँ जाऊँ बलिहारी
नभचर, थलचर,जलचर सारे,
जीव अनेक से शोभित है सारी,
करेँ क्रीडा कल्लोल, नित आँगन मेँ,
माँ धरती तू हरएक से न्यारी !
अगर सुनूँ मैँ ध्यान लगाकर,
भूल ही जाऊँ विपदा,हर भारी,
तू ही मात, पिता भी तू हे,
भ्राता बँधु, परम सखा हमारी !
-- लावण्या


Friday, March 16, 2007

सृजनगाथा´´ --


आदरणीय लावण्या दीदी,
चरण स्पर्श
हम " सृजनगाथा´´ में एक नये स्तंभ – 'प्रवासी कलम ' की शुभ शुरूआत आपसे करना चाहते हैं । आपसे इसीलिए कि विदेश में बसे प्रवासियों में आप सबसे वरिष्ठ हैं । साथ ही भारत के प्रतीक पुरुष पं. नरेन्द्र शर्मा की पुत्री भी । भारतीयता का तकाजा है कि श्रीगणेश सदैव बुजुर्गों से ही हो । यह प्रवासी भारतीय साहित्यकारों से एक तरह की बातचीत के बहाने भारतीय समाज, साहित्य, संस्कृति का सम्यक मूल्यांकन भी होगा जो http://www.srijangatha.com/ के 1 जुलाई 2006 के अंक में प्रकाशित होगा । साथ ही हिन्दी के कुछ महत्वपूर्ण लघुपत्रिकाओं में ।
हम जानते हैं कि उम्र के इस मुकाम में आपको लिखने-पढ़ने में कठिनाई होती होगी । पर यथासमय हमें किसी तरह आपके ई-मेल से उत्तर प्राप्त हो जाये तो यह एक ऐतिहासिक कदम होगा ।
दीदी जी, इसके साथ यदि आपकी कोई तस्वीर अपने पिताजी के साथ वाला मिल जाये तो उसे भी स्केन कर अवश्य ई-मेल से भेज दें । आशा है आप हमारा हौसला बढा़येगीं । हम आपका सदैव आभारी रहेंगे ।
(नीचे प्रश्न वर्णित हैं ।)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- लावण्या जी, आप उम्र के इस मुकाम में वह भी विदेशी भूमि में रहते हुए भी रचना-कर्म से संबंद्ध हैं । यह हम भारतीयों के लिए गौरव की बात है । लेखन की शुरूआत कैसे हुई ? अपनी रचना यात्रा के बारे में हमारे पाठकों को बताना चाहेंगी । अपनी कृतियों के बारे में विस्तार से बतायें ना !
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
( उत्तर 1 ) -- जयप्रकाशजी व अन्य लेखक व कवि मित्रोँसे , और समस्त पाठकोँ से, मेरे सादर नमस्कार !
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
रचना यात्रा :
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ " भारतसे मेरी भौगोलिक दूरी अवश्य हई है किँतु, आज भी हर प्राँतके प्रति मेरा आकर्षण उतनाही प्रबल है -यूँ लगता है मानो, विश्वव्यापी, विश्वजाल का सँयोजन और आविष्कार शायद बृहत भू- मँडल के बुध्धिजीवी वर्गको एक समतल ,पृष्ठभूमि प्रदान करना और अन्यन्योआश्रित , विचार व सँप्रेरणा प्रदान करना ही इसका आशय हो और उद्भव का हेतु ! "
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
( आप उम्र के इस मुकाम में वह भी विदेशी भूमि में रहते हुए भी रचना-कर्म से संबंद्ध हैं । )
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
" और अगर आप मेरे निजी जीवन के बारे मेँ पूछ रहेँ हैँ तो, यह कहना चाहती हूँ कि,
" उम्र का बढना न कह कर, उम्र का घटना कहो ! सफर मेँ हर एक डग को, सफर का कटना कहो ! "
( उनके ( भारत के प्रतीक पुरुष पं. नरेन्द्र शर्मा ) -- अप्रकाशित काव्य सँग्रह " बूँदसे साभार " )

और एसी अनेक काव्य पँक्तियाँ मेरे दिवँगत पिताजी , स्व. पॅँ नरेन्द्र शर्माजी की लिखी हुई हैँ और वे दीप ~ शिखा की तरह, मेरा मार्ग प्रशस्त करतीँ रहतीँ हैँ !
कविता देवी के प्रति रुझान और समर्पण शायद पितासे पाई हुई , नैसर्गिक देन ही है --
मेरी अम्मा , स्व. श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्माजी ने, एक खास " बेबी - रेकोर्ड - बुक " मेँ लिखा था कि,

" 'लावण्या , आज, ३ वर्षकी हो गई और कहती है कि, उसने कविता रची है- " मैँ तो माँ को मेरा मन कहती हूँ रे ! "
और उसके बाद, मेरी बडी मौसीजी, स्व. विध्यावतीजी जिन्हे हम " मासीबा " पुकारते थे, उन्होँने एक बडी सुँदर हल्के पीले रँगकी, डायरी मुझे उपहार स्वरुप दी थी और आशिष के साथ कहा था कि, " इसमेँ अपनी कथा - कहानी और गीत लिखती रहना " --

बाल - कथा, ३ सहेलियोँ की साहस गाथा, इत्यादि उसीसे शुरु किया था मैँने ,लिखना --और आज मुडकर देखती हूँ तब भी वही शैशव के वे मीठे दिवस और उत्साह, को अब भी अक्षुण्ण पाती हूँ --

मैने लिखकर बहुत सारा रखा हुआ है -- अब उसे छपवाना जरुरी, लग रहा है -- प्रथम कविता ~ सँग्रह, " फिर गा उठा प्रवासी " बडे ताऊजीकी बेटी श्रीमती गायत्री, शिवशँकर शर्मा " राकेश" जी के सौजन्यसे, तैयार है --
--" प्रवासी के गीत " पापाजी की सुप्रसिध्ध पुस्तक और खास उनके गीत " आज के बिछुडे न जाने कब मिलेँगे ? " जैसी अमर कृति से हिँदी साहित्य जगत से सँबँध रखनेवाले हर मनीषी को यह बत्ताते अपार हर्ष है कि, ' यह मेरा विनम्र प्रयास, मेरे सुप्रतिष्ठित कविर्मनीष पिताके प्रति मेरी निष्ठा के श्रध्धा सुमन स्वर स्वरुप हैँ --
शायद मेरे लहू मेँ दौडते उन्ही के आशिष , फिर हिलोर लेकर, माँ सरस्वती की पावन गँगाको, पुन:प्लावित कर रहे होँ क्या पता ?
जो स्वाभाविक व सहज है, उस प्रक्रिया को शब्द बँधन से समझाना निताँत कठिन हो जाता है --

" सृजन " --- स्वाभाविक व सहज है, उस प्रक्रिया को शब्द बँधन से समझाना उतना ही कठिन होजाता है --

"" सृजन " भी कुछ कुछ एसी ही दूरुह सी क्रिया है -- हो सकता है कि, आप जैसे उत्साही बुध्धीजीवीयँ के इस प्रयास से " सृजन - गाथा " - " यशो- गाथा " मेँ परिणत हो जाये !
आप भारत के छत्तीस गढ प्राँतसे आज हिँदी साहित्य के सवाँगीण विकासके प्रति सजग हैँ, क्रियाशील हैँ, कटिबध्ध हैँ - और आपका यह यज्ञ सफल हो, ये मेरी भी इच्छा है --

अस्तु: सस्नेहाषिश व बधाई !
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

प्रश्न- आपकी रचना प्रक्रिया के बारे में बतायें । आप भारत के अलावा इन दिनों विदेश में बस गयी हैं । क्या प्रवासी संसार में आपकी रचनाधर्मिता प्रभावित नहीं होती ? यदि हाँ, तो कैसे ? जहाँ आप निवसती हैं, वहाँ का सृजनात्मक माहौल क्या है । खास कर हिन्दी, साहित्य लेखन के कोण में ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ( उत्तर --2 ) : प्रवासी भारतीय अलग अलग परिस्थितीयोँ मेँ रहते हैँ -- सबका अपना अपना कार्य -क्षेत्र होता है - पारीवारिक जिम्मेदारीयाँ और अन्य सँगठन होते हैँजिनमे उनकी सक्रियता समय ले लेती है --
मेरी रचना प्रक्रिया, स्वाँत: सुखाय तो है ही, साथ साथ, विश्व - जाल के जरिये, असँख्य हिँदी भाषी वेब - पत्रिकाओँ व जाल घरोँ से मेरा लगातार सँबँध बना रहता है -- जैसे --

http://www.aparnaonline.com/lavanyashah.html


http://www.nrifm.com/

Remembering Pt Narendra Sharma: Bollywood's greatest Hindi poet
Hindi poet Pt Narendra Sharma fought for India's independence and then went to Mumbai to write some memorable songs like 'Jyoti Kalash Chalke' and 'Satyam Shivam Sundaram'. Lata Mangeshkar revered him like her father. In this interview, first broadcast on Cincinnati local radio, his daughter Lavanya Shah remembers her legendary father. The All India Radio's entertainment channel was named by him as 'Vividh Bharati'. To listen click here (Hindi)
A rare Photograph of Hindi's three great poets A rare photograph of 1940sSumitra Nandan Pant (seated), Harivansh Rai Bachchan (left) and Pt Narendra Sharma (right)

http://www.manaskriti.com/kaavyaalaya/smritidp1.stm

http://www.hindinest.com/lekhak/lavanya.htm

http://www.hindinest.com/bachpan/bodh.htm

http://www.abhivyakti-hindi.org/phulwari/natak/ekpal01.htm

http://www.boloji.com/women/wd5.htm

http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/bachchan/patra_mool.htm

http://www.abhivyakti-hindi.org/visheshank/navvarsh/vinoba.htm

आजके युग का " गूगल " चमत्कारिक आविष्कार, आपको , अँतर्जाल पर, ' मेरा नाम, " लावण्या शाह " टाइप करेँगेँ तो तुरँत कई सारी मेरी लिखी सामग्री , आपके सामने, अल्लादीन के चिराग की तरह, सिर्फ चँद क्षणोँमेँ , आपके सामने, प्रस्तुत कर देँगीँ --

आज २१ वीँ सदी के आरँभ मे, लेप टोप के जरिये, समस्त जगत की गतिविधियोँसे जुडना आसान सा तरीका हो गया है

मेरे पति श्री. दीपकजी के साथ अक्सर कामके सिलसिले मेँ , यात्रा पर , लिखने पढने की सामग्री , मेरे साथ रहती है -- और विशुध्ध शाकाहारी, खानपान की सुविधा भी !! :-))
आजकल मैँ पापाजीकी कविताओँको गुजराती अनुवाद करती रहती हँ -- गुजराती अम्मासे विरासत मेँ मिली मेरी मातृभाषा रही है, और पापाजीने हम ३ बहनोँको गुजराती माध्यमकी पाठशाला मेँ ही रखा था -
उनका कहना था कि, " पहले, अपनी भाषा सीखलो, फिर विश्वकी कोई भी भाषा को सीखना आसान होगा " ---

मेरे इस उत्तर मेँ यह भी साफ है कि, पाश्चात्य जगत मेँ, अँग्रेजी का वर्चस्व है - भारत और चीनकी उन्नति ने इस समाजकी आँखेँ खोल दीँ हँ -
अगर भारत विश्व का तेजीसे सम्पन्न होता हुआ, विकासशील देश है तब, उसके वैभव व सम्पन्नता मेँ शामिल होना समझदारी का पहला कदम होगा----
परँतु, स्वयम भारत मेँ बदलाव जरुरी है -- भारत के महानगरोँसे पढ लिख लर शिक्षित वर्ग, जीवन यापन की दौड मेँ अक्सर विदेश ही पहुँचा है ---
एँजीनीयर, डोक्टर और तकनीकि विशेषज्ञ बहुधा ब्रिटन या अमरिका आकर तगडा वेतन पाना चाहते हैँ - भले ही, मनसे वे भारतेय सँस्कृतिसे विलग नही हो पाते -- फिर भी परिवार की सम्रुध्धि व खुशहाली के लिये, परदेस आकर बस जाते हैँ ..

.यह स्थिती आज बदलने लगी है और ये खुशी की बात है की आनेवाले कल को , प्रबुध्ध विश्व नागरिक जैसी अपनी सँतानोँ के पुनरागमन से और ज्यादा सम्पन्नता मिले !
मेरी यही प्रार्थना है कि, आनेवाला कल, ये शताब्दि, भारतीय सँस्क्रुति की गौरव - गाथा बने जिसका वर्णन हम और आप साथ साथ पढेँ --
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
हिँदी लेखन जब तक हिँदी लिखनेवाले और बोलनेवाले, जहूँ कहीँ भी रहेँगेँ, अबाध गति से , आगे बढता रहेगा -- हाँ , आगामी पीढी हिँदी से जुडी रहती है या नहीँ -- इस बात से ही भविष्य के हिँदी लेखन का स्वरुप स्पष्ट होगा --~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- अपने वर्तमान निवास राज्य में आप हिन्दी और हिन्दी साहित्य, संस्कृति और सभ्यता की स्थिति कैसे मापना चाहेंगी ? 21 वीं सदी में वहाँ हिन्दी का भविष्य कैसा होगा ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ( उत्तर - ३ ) जैसा कि मैँने आगे कहा है, हिँदी भाषा का विकास पहले तो हम भारतीय, भारत मेँ प्रशस्त करेँ -- राजधानी नई देहली मेँ ही, कितने वरिष्ठ नेता हिँदी को अपनाये हुए हैँ ? बडे शहेरोँ के अँग्रेजी माध्यम से पढे लिखे, लोग क्या हिँदी को फिल्मोँके या टी.वी. कार्यक्रमोँ से परे, की भाषा मानते हैँ ?

सोचिये, अगर आप खुद उसी वर्गके होते तब आपका झुकाव हिँदी साहित्य के प्रति इतना ही समर्पित रहता ? उत्तर भारत हिँदी भाषा का गढ रहा है ---
और हपारी साँस्कृतिक घरोहर को हमेँ, एक सशक्त्त और सम्पन्न भारत मेँ, एस २१ वीँ सदी मेँ, आगे बढाना है --
अमरिका और ब्रिटनकी अपनी अलग सभ्यता और सम्रुढ्ध भाषा है -- अमरीका के विषय मेँ इतना अवश्य कहूँगी कि, आज, एडी चोटीकी मेहनत से, विश्व का सर्विपरि देश बना हुआ है -- येहाँ, सँगीत की कई भिन्न शाखाएँ हैँ और हर सप्ताह, हर विधामेँ हजारोँ नए गीत रचे जाते हैँ -- लोक प्रसारण के माध्यमोँ का अपने हितमेँ, अपने प्रचारमेँ उपयोग करना इन सभी क्रियाओँ मेँ वे सिध्धहस्त हैँ --अफसोस की बात यह है कि एम्. टी. वी. MTV / CNN --
जैसे कार्यक्रमोँकी देखादेखी भारत के मीडीया भी अँधा अनुकरण कर रहे हैँ --

सर्वथा भारतीय विषय वस्तु और ढोस तत्वोँसे सँबँधित , सर्वथा भारतीय प्रकारके कार्यक्रम ही कालजयी बन पायेँगेँ --

जिसमेँ सार नहीँ वह, काल की लपटोँमेँ जलकर भस्मीभूत हो जायेगा - एसा मेरा मानना है --
हिँदी के भविष्य के प्रति मैँ आशावान हूँ परँतु, अटकलेँ नहीँ लगाऊँगी -- आखिरकार, आजके हिँगी भाषी क्या योगदान कर रहे हैँ और किश्व की परिस्थीती पर भी बहुत कुछ निर्भर रहेगा -- हमेँ तो यही याद रख कर कार्य कर्ते रहना होगा कि,
" कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन" ...

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- आप मूलतः गीतकार हैं । आपका प्रिय गीतकार (या रचनाकार) कौन ? क्यों ? वह दूसरे से भिन्न क्यों है ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
( उत्तर - ४ )
अगर मैँ कहूँ की, मेरे प्रिय गीतकार मेरे अपने पापा - , स्व. पॅँ नरेन्द्र शर्माजी के गीत मुझे सबसे ज्यादा प्रिय हैँ --
तो अतिशयोक्ति ना होगी --

हाँ, स्व. श्रेध्धेय पँतजी दादाजी, स्व. क्राँतिकारी कवि ऋषि तुल्य निरालाजी , रसपूर्ण कवि श्री बच्चनजी, अपरामेय श्री प्रसादजी , महान कवियत्री श्री. महादेवी वर्माजी, श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी विभूतियाँ हिँदी साहित्य गगनके जगमगाते नक्षत्र हैँ जिनकी काँति अजर अमर रहेगी --
( क्यों ?? )
इन सभी के गीतोँ मेँ सरस्वती की वैखरी वाणी उदभासित है -- और सिर्फ मेरे लिये ही नहीँ, सभी के लियेउनकी कृतियाँ प्रणम्य हैँ ----
( वह दूसरे से भिन्न क्यों है ? ) -- भिन्न तो नही कहूँगी -- अभिव्यक्त्ति की गुणवत्ता , ह्रदयग्राही उद्वेलन, ह्रदयगँम भीँज देनेवाली , आडँबरहीन कल्याणकारी वाणी --- सजीव भाव निरुपण, नयनाभिराम द्र्श्य दीख्लानेकी क्षमता, भावोत्तेजना, अहम्` को परम्` से मिलवानेकी वायवी शक्त्ति ,शस्यानुभूति, रसानुभूति की चरम सीमा तक प्राणोँको , सुकुमार पँछीके , कोमल डैनोँ के सहारे ले जानेकी ललक....और भी कुछ जो वाणी विलास के परे है --

वो सभी इन कृतियोँ मेँ विध्यमान है --
जैसा काव्य सँग्रह " प्यासा ~ निर्झर " की शीर्ष कविता मेँ कवि नरेँद्र कहते हैँ,
: मेरे सिवा और भी कुछ है , जिस पर मैँ निर्भुर हूँ ~~ मेरी प्यास हो ना हो जग को, मैँ, प्यासा निर्झर हूँ " ~~
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ प्रश्न- लंबे समय तक हिन्दी-गीतों को नई कविता वालों के कारण काफी संघर्ष करना पड़ा था । आप इसे कैसे देखती हैं । गीत के भविष्य के बारे में क्या कहना चाहेंगी ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ( उत्तर - ५ )
नई कविता भी तो हिँदी की सँतान है -- और हिँदी के आँचल मेँ उसके हर बालक के लिये स्थान है -- क्योँकि, मानव मात्र को, अपनी अपनी अनुभूति को पहले अनुभव मेँ रच बसकर, रमने का जन्मसिध्ध अधिकार है - उतना ही कि जितना खुली हवा मेँ साँस लेनेका --

ये कैसा प्रश्न है की किसी की भावानुभूति अन्य के सृजन मे आडे आये ?

नई कविता लिखनेवालोँ से ना ही चुनौती मिली गीत लिखनेवालोँको नाही कोई सँघर्ष रहा ---

" किसी की बीन, किसी की ढफली, किसी के छँद कीसी के फँद ! "

~~ ये तो गतिशील जीवन प्रवाह है , हमेँ उसमेँ सभी के लिये, एकसा ढाँचा नहीँ खोजना चाहीये --

हर प्राणीको स्वतँत्रता है कि, वह, अपने जीवन और मनन को अपनाये -- यही सच्चा " व्यक्ति स्वातँत्रय " है -
बँधन तो निषक्रीयताका ध्योतक है --

और जब तक खानाबदोश व बँजारे गीत गाते हुए, वादीयोँमेँ घूमते रहेँगेँ,

प्रेमी और प्रेमिका मिलते या बिछुडते रहेँगेँ,

माँ बच्चोँ को लोरीयाँ गा कर सुलाया करेँगीँ

और बहने, सावन के झूलोँ पर अपने वीराँ के लिये सावनकी कजली गाती रहेँगीँ ...

या, पूजारी मँदिरमेँ साँध्य आरती की थाल धरे स्तुति भजन गायेँगेँ,

या गाँव मुहल्लेह भर की स्त्रीयाँ .....बेटीयोँ की बिदाई पर " हीर " गायेँगीँ, "......

गीत " ....गूँजते रहेँगेँ ....
ग़ीत प्रकृति से जुडी और मानस के मोती की तरह पवित्र भेँट हैँ -- उनसे कौन विलग हो पायेगा ?

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- हिन्दी के जानेमाने गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की बेटी होने का सौभाग्य आपके साथ है । आप स्वयं को एक गीतकार या पं.नरेन्द्र शर्मा जी की पुत्री किस रूप में देखती हैं ? और क्यों ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
( उत्तर - - ६ )
आपने यह छोटा - सा प्रश्न पूछ कर मेरे मर्म को छू लिया है -- सौभाग्य तो है ही कि मैँ पुण्यशाली , सँत प्रकृति कवि ह्रदय के लहू से सिँचित, उनके जीवन उपवन का एक फूल हूँ --

उन्हीँके आचरणसे मिली शिक्षा व सौरभ सँस्कार, मनोबलको हर अनुकूल या विपरित जीवन पडाव परमजबूत किये हुए है --

उनसे ही ईश्वर तत्व क्या है उसकी झाँकी हुई है -- और, मेरी कविता ने प्रणाम किया है --
" जिस क्षणसे देखा उजियारा,
टूट गे रे तिमिर जाल !
तार तार अभिलाषा तूटी,
विस्मृत घन तिमिर अँधकार !
निर्गुण बने सगुण वे उस क्षण ,
शब्दोँ के बने सुगँधित हार !
सुमन ~ हार, अर्पित चरणोँ पर,
समर्पित, जीवन का तार ~ तार !!
( गीत रचना ~ लावण्या )

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- अपने पिता जी के साथ गुजारा वह कौन-सा क्षण है जिसे आप सबसे ज्यादा याद करती हैं । आपके पिता जी के समय घर में साहित्यिक माहौल कैसा था ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

( उत्तर - - - ७ )
मेरे पापा उत्तर भारत, खुर्जा , जिल्ला बुलँद शहर के जहाँगीरपुर गाँवके पटवारी घराने मेँ जन्मे थे.
प्राँरभिक शिक्षा खुर्जा मेँ हुई - अल्हाबाद विश्वविध्यालयसे अँग्रेजी साहित्य मेँ M/A करनेके बाद,
कुछ वर्ष आनँद भवन मेँ अखिल भारतीय कोँग्रेस कमिटि के हिँदी विभाग से जुडे और नजरबँगद किये गए -
देवली जेल मेँ भूख हडताल से .. ( १४ दिनो तक ) ....
जब बीमार हाल मेँ रिहा किए गए तब गाँव , मेरी दादीजी गँगादेवी से मिलने गये - ---
वहीँ से भगवती बाबू (" चित्रलेखा " के प्रेसिध्ध लेखक ) के आग्रह से बम्बई आ बसे -
वहीँ गुजराती कन्या सुशीला से वरिषठ पँतजी के आग्रह से व आशीर्वाद से पाणि ग्रहण सँस्कार रम्पन्न हुए --

बारात मेँ हिँदी साहित्य जगत और फिल्म जगत की महत्त्व पूर्ण हस्तीयाँ हाजिर थीँ --

दक्षिण भारत कोकिला : सुब्बुलक्षमीजी, सुरैयाजी, दीलिप कुमार, अशोक कुमार, अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, भगवती बाब्य्, सपत्नीक, अनिल बिश्वासजी, गुरु दत्तजी, चेतनानँदजी, देवानँदजी इत्यादी ..
..और जैसी बारात थी उसी प्रकार १९ वे रास्ते पर स्थित उनका आवास

डो. जयरामनजी के शब्दोँ मेँ कहूँ तो , " हिँदी साहित्य का तीर्थ - स्थान " बम्बई जेसे महानगर मेँ एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया --

उस साहित्य मनीषीकी अनोखी सृजन यात्रा निर्बाध गति से ६ दशकोँ को पार करती हुई,

महाभारत प्रसारण १९८९ , ११ फरवरी की काल रात्रि के ९ बजे तक चलती रही ---
आज याद करूँ तब ये क्षण स्मृति मेँ कौँध - कौँध जाते हैँ ........................................................................................................................................................................................................................
( अ ) हम बच्चे दोपहरी मेँ जब सारे बडे सो रहे थे, पडोस के माणिक दादा के घर से कच्चे पक्के आम तोड कर किलकारीयाँ भर रहे थे कि, अचानक पापाजी वहाँ आ पहुँचे ----
गरज कर कहा, " अरे ! यह आम पूछे बिना क्योँ तोडे ? जाओ, जाकर माफी माँगो और फल लौटा दो "
एक तो चोरी करते पकडे गए और उपर से माफी माँगनी पडी !!!

-- पर अपने और पराये का भेद आज तक भूल नही पाए -- यही उनकी शिक्षा थी --
( ब ) मेरी उम्र होगी कोई ८ या ९ साल की - पापाजी ने, कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति " मेघदूत " से पढनेको कहा -- सँस्कृत कठिन थी परँतु, जहीँ कहीँ , मैँ लडखडाती, वे मेरा उच्चारण शुध्ध कर देते -- आज, पूजा करते समय , हर श्लोक के साथ ये पल याद आते हैँ --
( क ) मेरी पुत्रा सिँदूर के जन्म के बाद जब भी रात को उठती, पापा , मेरे पास सहारा देते , मिल जाते -- मुझसे कहते, " बेटा, मैँ हूँ , यहाँ " ,..................
आज मेरी बिटिया की प्रसूती के बाद, यही वात्सल्य उँडेलते समय, पापाजी की निस्छल, प्रेम मय वाणी और स्पर्श का अनुभव हो जाता है ..

.जीवन अत्तेत के गर्भ से उदित होकर, भविष्य को सँजोता आगे बढ रहा है --

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- अपने पिताश्री के साहित्य-वैभव को किस तरह संरक्षण दिया जा रहा है ? आप या आपका परिवार निजी तौर पर इसमें किस हद तक समर्पित है ?

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

( उत्तर - ८ )
मेरे छोटे भाई कु. परितोष नरेन्द्र शर्मा ने अथक परिश्रम के बाद, पूज्य पापाजी की , सभी साहित्यिक कृतियाँ एकत्र कर एक भागीरथ यज्ञ को सँपन्न करने का आरँभ किया है --- मैँ पुत्री होनेके नाते, अपना सहयोग दे रही हूँ --

--भारत सरकार से हमेँ सुझाव मिला था कि, राजकीय सँग्रह कोष के लिये वे इस साहित्य वैभव को ले जाना चाहते हैँ

परँतु, मेरे भाई ने अब तक उसे अपन पास सहेज कर रखा है और वह शीघ्र ही, वेब - पोर्टल का निर्माण करेगा --
साथ साथ,........................ " "ज्योति ~ कलश ~ स्व. पँ. नरेन्द्र शर्मा सम्पूर्ण ग्रँथावली " का विधिवत लोकार्पण समारोह / उत्सव भी सम्पन्न होगा --
जिसकी अध्यक्षता स्वर साम्राज्ञी कु. लता मँगेशकरजी जो मेरी बडी दीदी हैँ उन्होने हामी भरी है आनेकी -- वे करेँगीँ -- '
और अमिताभजी भी कविता पाठ करेँगे -- हमारा उनसे ये विनम्र अनुरोध रहेगा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
- प्रश्न- भारत में रचे जा रहे हिन्दी गीतों को तो आप पढ़ती ही होंगी । आप तब और अब हिन्दी गीतों में क्या अंतर देखती हैं ? एक श्रेष्ठ गीत की विशेषता क्या होनी चाहिए ?

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
( उत्तर - ९ )
भारत के ज्यादातर गीत , या तो अन्तर्जाल के विभिन्न जाल घरोँ के माध्यम से, या फिल्मी गीतोँ के जरिये ही विदेश मेँ पहुँच रहे हैँ - दुसरा साहित्य प्राप्त करने के कडे प्रयास करने पडते हैँ --
एक श्रेष्ठ गीत की विशेषता या की महत्ता यही है कि, जो दिलोदीमाग मेँ बस जाये -- देर तक हम जिसे गुनगुनायेँ, कालजयी साहित्य हो या एक श्रेष्ठ गीत --- विशेषता दोनोँ की .....

खास बात यही होती है जो गीत की रचना, उसकी गेयता और माधुर्य ही हमेँ बाँधे रखते हैँ --

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- समकालीन अँगरेज़ी साहित्य से तो आप अवगत होती होंगी ही । शायद पढ़ती लिखती भी होंगी । इस प्रसंग में आपकी टिप्पणी क्या है ? अंगरेज़ी साहित्य और हिन्दी साहित्य की विभाजन रेखा कहाँ है ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

( उत्तर १० )
-- हर प्राँतके अपने अनुभवोँका साहित्य , " दर्पण " होता है --
अँग्रेजी साहित्य लेँ तब मध्य युगीन व नए पुन: स्थापित युरोपीय प्रजा से बसे अमरीका के साहित्य मेँ भी काफी अँतर है --
वीक्टोरीयन साहित्य मेँ गृहस्थ जीवन के प्रति आदर, आदर्शवाद के गुलाबी चश्मे से दुनिया के नजारे देखना , मासूम लगता है --
अमरीका , गणराज्य की सार्वभोमकता , स्वाधीनता , अबाध गति से २०० वर्षोँ से चली आरही है --
२ विश्व - युध्ध, आँतरिक युध्ध के बाद , अश्वेतोँ की आजादी के बाद
तकनीकी विकास, व्योम व अवकाश पर पहुँच , चँद्रमा पर विजय पताका लहराती हुई, तकनीकीअगवानी के साथ समाज की बदलती हुई छवि उभरना अनिवार्य सा था --
भारत को आजाद हुए अभी कुछ दशक ही हुए हैँ -- प्रगति हो रही है --
उन्नति अवश्य होगी -- साहित्य सृजन भी अनुरुप होगा --
इन दोनो के बीच की विभाजन रेखा साँस्कृतिक है,
जिसे आजका आधुनिक रचनाकार , लाँघनेको उध्ध्यत है --
सफलता कितनी मिलेगी यह मैँ नहीँ कह सकूँगी -- क्योँकि, अमरीका मेँ रहती जरुर हूँ परँतु, आज भी, नारी मनके , गुप्त भावोँको प्रकट करता हुआ साहित्य मैँ नहीँ लिखना चाहती -- यह मेरा अपना रवैया है ---
शायद आप मुझे " पुतरातनपँथी " ही कहेँ -- तो वही सही --
ज़ो एसा साहित्य लिख्नना चाहते हैँ उनसे मेरा विरोध भी नहीँ -- " तुँडे तुँडे मतिर्भिन्ना " ..........

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- कहते हैं अब पठनीयता खासकर साहित्यिक बिरादरी में कम हुई है । इसे आप किस तरह लेती हैं ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
( उत्तर - ११ )
साहित्योक बिरादरी के लोग अब शायद अन्य कार्य - क्षेत्रोँ से जुडकर , आजके महत्त्वपूर्ण विधाओँ से कुछ
नया सीख रहे होँ - -- क्या पता ?
आज का युग, मशीन युग से भी आगे, सँचार व सम्प्रेषणाओँ का युग है --

मनुष्य भौतिक सुख भोग, स्व केन्द्रीत आत्मानुभूतियोँ से समाज से जुडे रहकर भी स्वेच्छाचारी और स्वतँत्र निर्णय लेने का हिमायती होता जा रहा है ----

युग बदला है, और जोर जबर्दस्ती से नहीँ मगर जब साहित्य आकर्षण का केन्द्र बिँदू बनेगा तब शायद झुकाव भी ज्यादा होगा ---

जिस किसी को भी साहित्य के प्रति भक्ति भाव य समर्पण भाव हो उसे बाहरी गतिविधियोँकी चिँता किये बिना ,
एक लक्ष्य को साम्ने रख कर अपना काम इमानदारी से करते रहना चाहिये -- ये मेरा मत है --

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- कहते हैं आजादी के बाद भारत अन्दरुनी तौर पर कमजोर हुआ है पर सारे जहान में इसका कद बढ़ा है ? यह कैसा अंतर्विरोध है ? वह कौन –सी अच्छाई है जो पश्चिम में है किन्तु यहाँ भारत में नहीं ? और वह कौन-सी बुराई है जो पश्चिम में किन्तु भारत में नहीं ।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
( उत्तर १२ )
जयप्रकाशजी , नाही तो मैँ कोई विशेषज्ञ हूँ ना ही प्रकाँड विद्वान !!

फिर भी आपने जो मुझे आज इतना बडा सन्मान दिया है, इतने कठिन सवाल पूछ कर जिसे मैँ एक साधारण स्त्री, अप्ने अनुभवोँ से तौलकर आपके सामने रख रही हूँ तो आशा करती हूँ कि, पाठक गण मेरी इस परीक्षा मेँ मुझे अपने समकक्ष खडा रहने देँगेँ --

और, अपनी टिप्पणीयोँसे हमारा ज्ञान- वर्धन करेँगेँ --

हर पाठक के अभिप्राय से कुछ सीखने की आशा है --
तो हाँ, आपके प्रश्न के उत्तर मेँ यही कहना चाहूँगी कि, बदलाव के पहले, घर्षण होता ही है --
सँघर्ष के बिना क्राँति और अँतर्द्वँदोँ के बाद ही निषष्कर्षनिकलता है --

आशा वान हूँ तो यही कामना है कि, भारत भूमि फिर " शस्य श्यामला स्वरुप " मेँ परिमार्जित हो --
सम्पन्न हो --
किसी भी एक देश मेँ , या व्यक्ति मेँ -- सभी अच्छाईयाँ होँ ये असँभव सी बात है -- -
भारत के पास प्राचीन सँस्कृति के विभिन्न वरदान हैँ --

पाश्चात्त्य देशोँ ने कटु अनुभवोँ की दुर्गम लडाईयाँ लडी हैँ ---
विश्व - युध्धोँ के दर्म्यान, हर पुरुष ने पराई धरती पर मर खप कर, स्वाधीनता की ध्वजा को, उठाये रखा था
-जब कि, स्त्रीयोँ ने फेक्टरी, कारखानोँ और खेत खलिहानोँ मेँ काम करते हुए, बालकोँ को पाला पोसा, बडा किया --

ये आसान तो नहीँ था - समाज व्यवस्था मेँ इस के कारण परिवर्तन हुए --
भारत मेँ कर्मठता का बोध, जागा है -- स्त्री शक्ति को लाँछित य अपमानित ना करके, उन्हे सक्षम बनाते हुए, पश्चिम के स्वयम् पर प्रमाणित अनुशासन से सीखकर , २१ वीँ सदी के नजरिये से देखना जरुरी है --

हाँ पश्चिम की, समाज के कुछ वर्ग और तबकोँ मेँ आध्यात्मिक अनुशासनहीन अराजकता को नकारना भी अनिवार्य है -- सँम्`-लैँगिक विवाह, विवाह - विच्छेद, १ ही वरिष्ठ / मुखियावाला परिवार, कामसाधनोँका असीमित -- अविवेकी उपयोग, सँवेदनहीन मानस से उपजी भाव शून्यता, उदासीनता , सिमटते पारिवारिक दायरोँ मेँ पनपती घुटन इत्यादि भी इसी पश्चिम की विशिष्ट्ताएँ हैँ --
और उनसे बच कर, उनको लाँघकर , आगे निकलते हुए, भारतीय या पूर्व के सुविचार / सँस्कारओँ को सहेजे हम अबश्य, सुखद मनोनभूमि पर आ पायेँगे एसा मेरा विश्वास है ---

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
--- प्रश्न- इन दिनों वैश्वीकरण, विश्व बाजार, उदारीकरण और कंप्युटर प्रौद्योगिकी का नारा सकल जहान में तैर रहा है, एक दीर्घ अनुभवी, बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी होने के कारण इसे आप किस नज़रिए से देखती हैं ? खास कर भारत जैसे नवविकासशील देश के परिप्रेक्ष्य में --
( उत्तर: १३ ) :
आपने जो इतने सारे अलँकरण मुझे पहना दीए !!!
" एक दीर्घ अनुभवी, बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी "
कह कर :-))
उनके लिये आपकी आभारी हूँ --

भारत को आज विश्व के सामने अपनी प्रतिभा दीखलाने का अवसर इन्हीँ " कंप्युटर प्रौद्योगिकी" --- " उदारीकरण " etc . से मिला है --- परँतु याद रहे, यह विश्व के बाजार मेँ हर विक्रेता अपनी मँडी सजाये, अपना सामान बेचनेकी पहल मेँ पैँतेरे आजमा रहा है --

अगर अमरीका का हथियारोँ के उपत्पादन मेँ अग्रणी स्थान है तो युध्ध कहीँ भी हो, अपने आयुध बेचकर फायदा तो लेगा ही ?
चीन भले ही छोटे मोटे लघु उध्योग कर , निकास बढाले, पर २० जम्बो जेट खरीद कर वही धन फिर BOEING CO. ( बोइँग क्पनी ) को मिल जायेगा --

हाँ इतना जरुर हुआ है कि, आज जो भी घटना घटती है, वह दुनिया के हर अखबार मेँ सुर्खीयोँके साथ छप जाती है -- इस लिहाजसे, " वैश्वीकरण, विश्व बाजार," -- शब्द अवश्य चरितार्थ हुए हैँ --

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- अन्य वह बातें जो आप हम सबके बीच बाँटना चाहेंगी ।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
( उत्तर- १५ ) --
जयप्रकाशजी, " सृजन ~ गाथा परिवार " के सभी को धन्यवाद कहना चाहूँगी -- आपने इतनी धैर्यसे मेरे उत्तरोँको सुना / पढा --
आज यहीँ बातोँ का सिलसिला समाप्त करते हैँ क्युँकि, यूँभी स्त्रीयाँ बदनाम हैँ -- बहुत ज्यादा बोलने के लिये -- :-))

अब ज्यादा कह कर लोगोँको उबाना नहीँ चाहती --

आपने बडे गँभीर मुद्दे उठाये हैँ -- और लोग भी अपने विचार रखेँ जिनके उत्तर मैँ भी पढना चाहूँगी ताकि कुछ नया सीख पाऊँ -
अब आज्ञा ...

और , आपके साथ सदैव मेरी सद्` भावना , शुभ कामना रहेगी ..." शुभम्` -अस्तु : इति "
लावण्या
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

आपका भाई ही,
-- Jayprakash Manas

Friday, March 02, 2007

घुघूती बासूती जी के प्रश्न : .....मेरे उत्तर...

(मेरी अम्मा सुशीला नरेन्द्र शर्मा मेरे छोटे भाई परितोष के साथ )
\
अरे ये क्या हुआ ? ........
कैसे हुआ ...
घुघूती बासूती जी ने फिर मुझे प्रश्नोँ के घेरे मेँ ला खडा किया !! ;-)
(जिनसे पूछे जा रहे हैं वे हैं.
.१ महेन्द्र जी
२ लावण्या जी )
घुघूती जी, ये कविता आपको सादर सप्रेम अर्पित करती हूँ ~~

" मस्त गगन पर उडती एक चिडिया,
पूछ रही है पहाडोँ से,
"क्यूँ ना जगाया ?
भैया था आया, मिलने मुझसे,
लेकर के मोती का हार ! "
छलक रही आँखेँ ,
पनिहारीन की,
पनघट पे,
रीति गगरी सा मन रीता
मैँ, बाट जोहती लिये,
मैके की प्यास !
घुघूती बासूती, हूँ,
मैँ, उडती फिरती,
जँगल, झरने,
बनफूल लजाती,
फिर फिर करती
मिलने की आस ! "
अब मेरे प्रश्न ....
देखती हूँ ....
+
मेरे उत्तर...
और उनके उत्तर,

यथासँभव :
सही सही लिखने की कोशिश...
पेश है !
१ आपको गीत, कविता, कहानी, लेख इनमें से क्या अधिक पसन्द है ?

मुझे , सबसे प्रिय गीत ही हैँ
-- जिसे गुनगुनाया जाये, अगर गानेवाले कलाकार की आवाज़ नफीस और दिल को छूनेवाली हो तब तो सोने पे सुहागा ही लगता है ~
` जैसे कि, लता दीदी के हज़ारोँ गीत मेरे प्रिय हैँ !
जिनके लिखनेवाले भी हमेशा उन गीतोँ से जुडे हुए याद आते हैँ.

२ क्या आपको सपने याद रहते हैं ? कोई दिलचस्प सपना सुनाइये ।
यदि याद नहीं तो कैसा देखना पसन्द करेंगे ?
जी हाँ, सपनो का मनोविज्ञान बडा अजीबोगरीब है
- कुछ यादगार सपने मैँने भी देखे हैँ !
-- एक बार सुबह का स्वप्न देखकर हडबडा कर नीँद तूटी थी !
कारण था, हमारे एक मित्र को उनके पूरे परिवार के साथ किसी नाव मेँ बैठे देखा था
-- उनकी कोलेज मेँ जाती बेटी, सामने आयी, आँखोँमेँ आँसू थे और,
बडे कातर स्वर मेँ कहे जा रही थी,
" आण्टी, देखिये, डेड ( पापा) को क्या हुआ है!"
उनके डेड
( उनके अपने पिताजी याने कि दादाजी )
=( जिनकी मृत्य़ु कई बरसोँ पहले हो गई थी )
व माँ के साथ, एक बेँच पर बैठे थे!

उनकी पत्नी भी माँ के बगल मेँ दिखीँ
और हमारे मित्र की कमीज मेँ एक लँबा छूरा गडा दीखा !!
जिससे खून बहे जा रहा था और वे बोले कि,
" देखो, मैँ मरा जा रहा हूँ !"
-- मैँने आगे बढकर उनकी बेटी के माथे को सहलाते हुए कहा,
" ना ना..कुछ नहीँ होगा ..सब ठीक हो जायेगा"
और आँख खुल गई !
सपना टूट गया !!
पर मेरा मन अशाँत और उदास हो गया :-((
-- मैँ मेरे भाई ( मौसी का बेटा ) के घर
( उत्तर केरोलाएना) से ओहायो ,
घर लौटी और इन्हेँ ( मेरे पति दीपक को ) सारा सपना सुनाया
और कहा कि, "फलाँ मित्र के लिये ये कैसा अशुभ स्वप्न देखा !!
अब क्या हो? "
इन्होँने साँत्वना देते हुए कहा,
" आज तुम ज्यादा प्रार्थना कर लेना .."
और हम इसे भूल ही जाते .....
किँतु,
२ दिन बाद ....
सवेरे, हमारे मित्र की धर्मपत्नी का टेलिफोन आया,कहा,
" जल्दी मेँ हूँ, इनको ( हमारे वही मित्र - जिनका नाम नहीँ लिख रही हूँ ) ओपरशेन के लिये ले जा रहे हैँ, " ट्रीपल बाय -पास" है,
(ह्र्दय की ३ धमनीयोँ को खोलने की शल्य -चिकित्सा )
~~ आप आज इनकी सलामती के लिये दुआ भेजिये !! "
हम सन्न रह गए !!
-- खैर, बात को लँबाना नहीँ चाहती पर ये सपना ज़िँदगी भर याद रहेगा !
और खुशखबरी ये है कि, हमारे मित्र भी अब स्वस्थ हैँ :)
जब हम उनसे मिलने गये,
तब उनके दीवँगत पिताजी की तस्वीर देख कर और एक अचँभा हुआ !
क्योँकि उनकी शक्ल मैँने, पहले मेरे इस चेतावनी भरे सपने मेँ देखी थी हूबहू वही चेहरा देखकर ,
मेरी मनोदशा कैसी हुई इसका बयान नहीँ कर सकती --
-- इसे क्या कहेँगे ? इन्ट्यूशन? अँदेशा ? या दैवी सँकेत?
३ क्या कभी कोई चिट्ठा आपको ऐसा लगा कि यह तो मेरे मन के भाव कह रहा है ? कौनसा?
एक कविता मेँ मैँने लिखा है -- " मन का क्या है ! सारा आकाश कम है ! "
तो सच कहूँ तो, एक का नाम न लेते हुए, सभी ब्लोग जगत के साथीयोँ को मेरे स्नेहसिक्त अभिवादन भेजते ~~
यही कहूँगी कि, जहाँ कहीँ कोई बात सीधे दीलसे निकली है, या कि दार्शनिकता लिये हुए हो
या प्रवास वर्णन, प्राकृतिक छवि समेटे बयानी हो, भाषा की रवानी हो, अपनी माटी की खुशबु लिये कोई मीठी दर्दभरी कहानी हो,
वे सारे " चिठ्ठे "= या " जालघर"
-- मेरे, "अन्तर्मन" ब्लोग के दूर के साथी से ही लगे हैँ और इस यात्रा के सहयात्री भी जिन्हेँ मैँ चाव से पढती हूँ और कुछ नया सीखने पर उन्हेँ मन ही मन शाबाशी भी देती हूँ --
४ जीवन का कोई मर्म स्पर्शी पल जो भूले नहीं भूलता ?
सबसे मर्मस्पर्शी पल आज याद करते ही अपने को एक नन्ही बच्ची सा पाती हूँ..
जब अलसाई दोपहरी मेँ, मेरी थकी हुई अम्मा की बगल मेँ, अम्मा पर पाँव फैलाकर सोने से जो सुख मिलता था और जो बेफीक्री महसूस की वो फिर कभी नहीँ ~
~ आज भी आँखेँ बँद कर लूँ तब,
एक लँबी साँस ले कर वही भाव के कुछ अँश जी पाती हूँ ~
~~ जो मेरे लिये, तनाव दूर करने की शक्ति देते हैँ..
नई उर्जा देते हैँ ~~~
"माँ तुम चली गईँ ..,
देह के बँधन सब तोड,
सारे रिश्ते नाते छोड,
सीमित सीमाओँ के पार,
जीर्ण शीर्ण देह के द्वार!
ममता का उजियाला बाल,
थके कदमसे, मूँदे नयन से,
हमेँ छोड कर गईँ!
माँ तुम चली गईँ !"

५ आपके जीवन का दर्शन (philosophy) क्या है ?

मेरा जीवन दर्शन बडा सँक्षिप्त व सरल है ~
" जीयो और जीने दो! खुश रहो और खुशी फैलाओ !"

आशा करती हूँ कि, आपके सवालोँ के सही जवाब दे पाई हूँ __

स -स्नेह,

लावण्या




अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड


अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड

--------------------------------------------------------------------------

हमारे असफल रहने की वजह क्या है ??

इस उत्तर को आप सुधिजनोँ के सामने लाते , सबसे पहले, ये स्पष्ट कर दूँ कि, मैँ--" उत्तर अमरीका" मेँ रहती अवश्य हूँ परँतु, फिर भी मेरा अवलोकन व मत सर्वथा, "निष्पक्ष " है -

-चूँकि, "ओस्कर" अमरीकन चयन प्रणाली है , हम ये भी समझ लेँ कि,
अमरीका की सोच , उसकी पृष्ठभूमि है.

अमरीका हमेशा "लोक -तँत्र " को फैलाने के प्रचार, प्रसार से अपने आप को जुडा दीखाता हो पर वास्तव मेँ, जो एक राष्ट्र प्रमुख ने कहा वही मूलभूत विचार धारा, कई सारे मुद्दोँ पर भी लागु होती है
-याद है क्या आपको, जो " गौ-बालक " [ COW -BOY ] टेक्सास के निवासी, राष्ट्रपति ने कहा था ?
" अगर आप हमारे साथ नहीँ हैँ, तब आप,हमारे, विपक्ष मेँ हैँ"
यही बात " ओस्कर" के साथ भी है
- हमारे अभिनेता / निर्माता निर्देशकोँ/ सँगीतज्ञ / इत्यादी का कुसूर
कम मात्रा मेँ है
-कई अभिनेता हिन्दी के बजाय, अँग्रेजी मेँ बोलते नजर आते हैँ
-सार्वजनिक माध्यमोँ के उपकरणोँ से प्रसारित होनेवाले ,
उनके साक्षात्कारोँ मेँ !!

हाँ, हिन्दी का आग्रह, उचित है ---
( & Now -- Regarding this observation ) :

" भाषा की इज्जत नही करना है जिस भाषा में वो फिल्म बनी है। अगर हिन्दी फिल्मों के कलाकार ही फिल्म के डायलॉग भर बोल के इति समझ लेंगे तो हम कैसे दूसरे विदेशियों से ये आशा करें की वो इन फिल्मो को देखेंगे ही। "(तरुण) -पर ये ना भूलेँ हम की, भारत की राष्ट्र भाषा अवशय हिन्दी हो,
दूसरे प्राँतोँ की भाषाएँ भी अपना उतना ही महत्त्व रखतीँ हैँ
- जैसे, बाँग्ला, तमिल, कन्नड, या फिर मराठी या गुजराती --
-" ऑस्कर" व उसके " तमगे " या "तोहफे" = "Awarda" --अमरीकन वर्चस्व को कायम रखने मेँ कोई कसर बाकी नहीँ रखता --
--अगर भारतीय फिल्म ऐसी हो, जो भारत को दकियानूसी, रुढीवादी , पुरातनपँथी बता रही हो, जैसे दीपा मेहता जी की,"वोटर" या (सत्यजीत रे की पुरानी फील्म, " पाथेर पँचाली" तो,
उसे अवश्य "तेज केँद्र मेँ चुँधियाती रोशनी " = मतलब " लाइम लाईट" मेँ खडा कर के ऐवोर्ड से नवाजा जाता रहा है

--" देवदास" = नई , उसके गीत सँगीत, आम अमरीकी " मस्तिक्ष प्रवाह" = " वेव लेन्थ" से अलग है -
- भारतीय सँस्कृति, हमारी जड से फूली, कोँपलोँ से सिँचित वृक्ष है -
जिसकी छाया भारतीय, मानस के अनुरुप है
-उसी तरह, अमरीका का अपना अलग रोजमर्रा का जीवन है जिस के आयाम, उसके सँगीत, रहन सहन, प्रथाएँ , त्योहार, जीवन शैली सभी मेँ प्रत्यक्ष होते हैँ
-- ये कहना, शायद उन सभी को बुरा भी लग सकता है कि, जब तक आप अमरीका आकर, एक लँबी अवधि तक ना रहेँ, आप इस देश को अच्छी तरह पहचान नहीँ पाते !
- पर मैँ जो कह रही हूँ वो है बिलकुल सच!
अमरीकन " छाया चित्रोँ " = ( फिल्मोँ ) पर यहूदी कौम की गहरी पकड है -- दूसरी यूरोप की कई नस्लेँ, जातियाँ भी प्रतिनिधित्व रखतीँ हैँ
-ज्यादातर, वे जुडाओ, क्रिस्चीयन, ऐँग्लो ~ सेक्सकन, प्रोटेस्टेँट प्रणाली से सँबँधित होते हैँ
-और उन्हीँ का वर्चस्व रहे, उनके विचारोँ का बाहुल्य, व बहुमत रहे उस बारे मेँ वे सजग व, प्रयत्नशील रहते हैँ
-इस दशा मेँ " भारत को बहोत ज्यादा ऊँचाई मिले " = ग्लैमरस " वैसी छवि दीखलाने मेँ उन्हेँ क्यूँ रस रहेगा?

भारत के साथ १ अबज भारतीय हैँ - विदेश मेँ बसे भी असँख्य भारतीय मूल के दर्शक हैँ जो बडे ही चाव से, आजकल बन रही नई , आधुनिक फिल्मेँ देखते हैँ --कम मात्रा मेँ विदेशी भी, कौतुहल या जिज्ञासा वस, कभी कभार , भारतीय फिल्मेँ देख लेते हैँ
- अच्छी फिल्मेँ जैसे किसी भारतीय को पसँद आतीँ हैँ उसी तरह, विदेशी शख्स को भी पसँद आतीँ हैँ - परँतु, आज भी उतनी लोक प्रियता विशुध्ध हिन्दी फिल्मोँ को नहीँ मिलती जितना कि, होलीवुड प्रेषित फिल्मोँ को !

--- ये होलीवुड का व्यावसायिक सफल तँत्र , प्रचार -प्रसार की सशक्त विधा, किसी भी आयु के दर्शक को जिसे दर्शक पसँद करे उसी को परोस कर, मँत्र मुग्ध करने की परम चेष्टा, प्रबल आकर्षण पैदा करने के सारे हथकँडे अपनाने का रवैया ये कई बातेँ "खाद= फर्टीलाइजर" सा काम करतीँ हैँ

-- इन सरी बातॉम मेँ " होलीवुड" सिध्ध हस्त" है -- बिलकुल उसी तरह जैसे - भारत , सदीयोँ से, कई सारे शुध्ध इत्तर का निकास करता आया है परँतु, जो वित्तीय व व्यापारीक सफलता फ्रान्स ने हासिल की है, पर्फुम बन्नने व उन्हेँ बेचकर अबजोँ की तादाद मेँ नफा कमाने की, वो भारत क्यूँ हासिल नहीँ कर पाया आज तक? पेरिस मेँ बनी इत्र की शीशीयोँ मेँ नकली इत्र भरकर बेचने से मुनाफा कमाने की नकलची बँदर वाली हमारी सोच हम क्यूँ नहीँ बदल सके ??

शायद, आज भारत जाग गया है --

कई सफल व्यापार आज आगे आ रहे हैँ तो भविष्य मेँ हम सभी इस तरह की चुनौतीयोँ को स्वीकार के, अपने को सफल सिध्ध कर पायेँगे --
दूसरा मुद्दा है कि,


" फैशन की गुडियों की दौड में बहुत कुछ हासिल कर लिया। " "(तरुण) ~~~

उसके बारे मेँ यूँ सोचिये कि, सबसे ज्यादा सिगरेट का उत्पादन करने वाला अमरीका " देश खुद अपने शहेरोँ मेँ + जीवन मेँ " धूम्रपान" के विरुध्ध प्रचार करता है -

- अपने मकानोँ से "धूम्रपान" हटाकर , कानूनन अवैध घोषित कर, अपने मकानोँ, रेस्तराँ, दफ्तरोँ को धूम्रपान से मुक्त कर उन्हेँ " ग्रीन ज़ोन" कहलाने मेँ फख्र महसूस करता है -- तो दूसरी तरफ, इँडोनेशिया, भारत या चीन इत्यादी मेँ जोश खरोश के साथ, इसी दूषण को फैलाने मेँ बिलकुल सँकोच नहीँ इनके व्यापारीयोँ को ..... जिसे सरकार भी अनदेखा कर देती है !!

-- खैर! समूचे विश्व को सुधारने की जिम्मेवारी भला अमरीका क्यूँ अपने माथे ले ??
क्या इतना कम नहीँ कि सारी दुनिया की "पुलिस" बन कर वह "सुरक्षा " के सामान मुहैया करवाती है ?? ;-)

इसी भाँति, "रेवेलोन" "ऐवोन" -- "ऐस्टी लोडर" जैसी सौँदर्य उत्पादन सँस्थाएँ करोडोँ डोलर का मुनाफा करतीँ हैँ बल्के, उसे द्वीगुणीत करतीँ हैँ -- चारगुना बढातीँ हैँ --- जब भारत्त्य सुँदरी, " विश्व सुँदरी" घोषित होती हैँ !!
भारत के बडे शहरोँ से विस्तरीत होकर सौँदर्य प्रसाधनोँ की लालसा और माँग छोटे शहरोँ की बस्तीयोँ पार कर, कस्बोँ या गाँवोँ तक फैल जाती है और तब भी कहा जाता है कि, "भारत का मध्यम वर्ग" जाग गया है

और आय बढने से खर्च की क्षमता बढी है !!

-- तो अमरीकी सौँदर्य प्रसाधन बनानेवाली कँपनी भी क्यूँ ना हिस्सा लेँ ??

और सौँदर्य प्रतियोगिता आयोजनोँ से क्यूँ ना मुनाफा व सेँध लगाकर प्रवेश किया जाये उन बाजारोँ मेँ व प्रदेशोँ मेँ, जहाँ आज तक प्रवेश नहीँ मिला ??

मुझे अचरज इसी बात का है कि, भारत का हर क्षेत्र क्यूँ "अमरीकन समाज प्रणाली " का अँधा अनुकरण कर, अपने को " आधुनिक" कहलवाने की कोशिश मेँ लगा, ये भूल रहा है कि, भारत दुनिया के पूर्वी गोलार्ध मेँ है जहाँ से सूर्य पस्चिम गोलार्ध को प्रकाशित करता है

-- एक काल , एक फूल, एक समय नहीँ खिलता !!
-- हर देश की सँस्क़ृति उसे अपनी जड से जोडे रखे तभी वह मजबूत होकर पनपती है
-- ना कि दूसरे से उधार ली गई सोच या समझ !!

इसलिये, भारत की समझदार , शिक्षित प्रजा से मैँ विनम्र प्रार्थना करुँगी कि,

वे अपना योगदान देते रहेँ -- अपनी जडोँ के प्रति निष्ठा से अपना "जल रुपी " " अर्घ्य " चढाते रहेँ !
जिससे एक शक्तिशाली भारत, विश्व के सामने, अपनी प्राचीन सँस्कृति के साथ साथ, आधुनिक कार्य क्षमता के बूते पर, एक सशक्त व सफल राष्ट्र का उज्ज्वल दृष्टाँत बन कर दीखला सके !!

यही मेरे सपनोँ का भावी भारत होगा !!

जिसे मेरे कोटी कोटी प्रणाम !!


--लावण्या





झूलणी : ~


राधे सँग सखी लालाजी, झूला झूलेँ हो!
तेरो कौन बने बनमाली, मुरलिया सोहत हो!
मुरली माँगन आयी राधे,तू ने ना कह दी !
स्याम बजाये बाँसुरिया, सुध बुध राधे,बिसराये हो!
राधे चलीँ सँग लेकर नारी, झूला झूलन हो!
झूले पर झाँझरिया बाजे, राधे झूलन लागी हो!
स्याम बजाये बाँसुरिया, सुध बुध राधे बिसराये हो!
राधे झूलत, कान्हा झूलत, दोनोँ झूलन लागैँ हो!

--लावण्या

Thursday, February 22, 2007

५ सवालोँ के जवाब


१.आपकी सबसे प्रिय पिक्चर कौन सी है? क्यों?

वीडीयो जब निकलीँ तब शिकागो से पहली फिल्म खरीद कर देखी - मुगले -आज़म -
तो शायद वही रही होगी मेरी प्रिय फिल्म :
उम्दा सँगीत, खूबसुरत छायाँकन, मधुबाला जी का हुस्न, श्री दीलिप कुमारजी की अदाकारी , पृथ्वीराज कपूर के प्रभावशाली अकबर, पुत्र वियोग मेँ, व्याकुल महारानी जोधा के रुप मे - दुर्गाबाई खोटे की छवि,सँगतराश का विद्रोह गान, " जिँदाबाद, जिँदाबाद ऐ मुहब्बत, जिँदाबाद" .. के.आसिफ साहब का नगीना आज भी बेसाख्ता चमक रहा है ..

२.आपके जीवन की सबसे उल्लेखनीय खुशनुमा घटना कौन सी है ?

जितने बरस बीते हैँ, उनमेँ हमेशा, "कभी खुशी कभी गम / या / यूँ कहूँ कि, "थोडी खुशी, थोडा गम" ही हासिल हुआ है -
"जिस हाल राखे, राम गुँसाई, उस बिध ही रहिये रे मनवा, राम भजन सुख लयै"

--ये मैँने मेरे एक भजन मेँ लिखा है -जिसे, अपने जीवन मेँ निभाया भी है --

पर, २० अप्रल,२००६ के रोशन दिवस पर, बिटिया की सफल प्रसूति के बाद, मेरे नाती को हाथोँ मेँ उठाया तब, सोचा,
"ईश्वर! आपकी कृपा से , मैँने अपनी इतनी जीवन यात्रा, पूरी की है ..आज इस प्रसाद को पाकर धन्य हो गई !

यूँही, मेरी नैया को पार करो.." ..यह एक अनोखी अनुभूति रही ..

३.आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते/करती हैं?

सभी प्रकार के चिठ्ठे पढकर बहुत कुछ नया जानने को मिलता है -- हरेक की अपनी अलग विधा है - शैली है -- भद्दे मजाक, कटुता, छीछोरापन, दँभी वाक -बाण ना मुझे, न ही किसी और को पसँद आयेँगे -

फिर भी, व्यक्ति -स्वातँत्र्य की हिमायती हूँ --


४.क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?


"निखार ?? अब ये तो अपनी अपनी नजर का फेर है ;-)
हाँ, आँखेँ दुख जातीँ हैँ पर, हिन्दी मेँ लिखने का परिश्रम, सँतोष देता है --


५.यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी?

" भारत -भाग्य विधाता ...जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे "
...मुझे ऐसी सत्ता मिले तो क्या बदलूँ ?

अराजकता, स्वछता के लिये आग्रह व श्रम और उनसे भी उपर, स्त्री की गरिमा को बढावा मिले उसके लिये,
सार्थक प्रयास अवश्य करना चाहूँगी ---

अब मैँ इन ५ हिन्दी ब्लोगरोँ से यही ५ सवालोँ के जवाब सुनना चहूँगी ---------

अविनाश भाई : मोहल्ला : http://mohalla.blogspot.com/2007/02/blog-post_2364.html

मृणाल कान्त :http://thoughtsinhindi.blogspot.com/

मनोशी की मानसी : http://www.manoshichatterjee.blogspot.com/

श्रीश शर्मा : http://epandit.blogspot.

प्रमोद सिंह : http://cilema.blogspot.com/

" न हम होँगेँ न तुम होगे "





" न हम होँगेँ न तुम होगे "

ROME (AFP) - A pair of 6,000-year-old skeletons found by Italian archaeologists in a dying embrace will not be separated, team leader Elena Menotti has told AFP.
"We will do everything possible to preserve the bodies in the exact position of their grave,"
"There's no question of breaking their embrace."
The skeletons were found last week during digging in an industrial zone near the northern city of Mantua and the find will be displayed at the city's archaeological museum.
While scientists are still puzzling over how the pair died and why they were buried in this way, Menotti said their embrace was "testimony to a great feeling of love that has transcended time.
"For regardless of why they were buried in each other's arms, there had to have been feelings between them."

यह एक समाचार ने 'मुहब्बत " लफ्ज़ पर फिर एक बार सारा ध्यान केँद्रीत कर दीया !--

क्या कुछ नहीँ लिखा या कहा गया है इस एक शब्द पर !
अरे ..ढाई आखर है ना "प्रेम " का !
"प्यार" का भी एक से ज्यादा ही पडता है गिनती मेँ हिसाब
-पर " इश्क " किसी हिसाब से बँधा है कहीँ ?
..ये सुना होगा , कि,
" हीज़ाबे मुहोब्बत, हम उसको थे कहते, ना वो बोलते थे , न हम बोलते थे "
या फिर ये कि,
" मोहोब्बत की किस्मत बनाने से पहले, ज़माने के मालिक, तू रोया तो होगा "

उफ्फ
~

क्या और कहेँ ????

कल एक बेशकिमती तोहफा डाक से आया !

श्रीमान राधेक़ाँत दवे जी ने व श्रीमती कुसुम दवे जी ने एक सँगीत ओडीयो टेप भेजी -

नाम था " हुस्न -ए - जाँ : ~~सँगीत निर्देशक हैँ मुज़फ्फर अली -
गीतोँ को गा रहीँ थीँ छाया गाँगुली -
१) " यारो मुझे मुआफ रखो" ( मीर )
२) खूनेज करिश्मा नाज़ सितम ( नज़ीर अकबराबादी )
३) जब फागुन रँग ( नज़ीर)
४) पिया ब्याज प्याला ( कुतुब शाह) *( छाया व इकबाल सिद्दीकी )
५) निठुरे निठुरे..अँगना बुहारुँ पहन के कँगना * (ज़रीना बेगम )और अँत का गीत था ~
६) न तुम होँगेँ न हम होँगेँ .." ( नज़ीर) * ( रोली सरन और नवेद सिद्दीकी )


अँतिम गीत, बडी, सहजता से आरँभ हुआ ~
~शब्द / अलफाज़् यूँ घुल रहे थे मानोँ, ज़िन्दगी की हुबहु तस्वीर उभर रही हो !
~माशूका कह रही थी कि, ' आज हँस कर बोसा ले लो, प्यार से गले मिलो, चुहल करने के लिये, लतीफे सुनने सुनाने के लिये, आज का वक्त है, तो,
...मुहब्बत से पेश आओ हम से आकर मिलो, फिर न जाने, क्या हो ?

- न तुम होँगे न हम होँगेँ . ---

गीत कुछ इस तरह से दीलोदीमाग मेँ बसने लगा कि पता भी न चला कब आँखेँ नम हुईँ , न जाने कब दबी सिसकीयाँ रह रह कर, मन मसोस कर, गहरे, कहीँ धधकते ज्वालामुखी की तरह, रुह को झकझोर कर सँगीत के साथ साथ, एकाकार हो गईँ !

ये नज़ीर का कलाम था कि, सब कुछ ले डूबा !

मेरे जीवन के दाम्पत्य के क्षण, ३३ सालोँ का लँबा सफर, उससे पहले, १६ /१७ साल की आयु मेँ , अपने जीवन साथी से , पहली बार मिलना, उससे पहले, एक ही गुजराती स्कूल मेँ कक्षा १ से , उन्हेँ देखना, साथ साथ, बडे होना, बचपन की देहलीज को पार कर, वयस्क होना, फिर, परिवार के सभी से जान पहचान , एक दूसरे के घर पर , भोजन करना, गप्पे लडाना, शादी ब्याह, २ सँतानोँ के अभिभावक बनना ~

पुत्री सौ. सिँदुर का ब्याह, फिर कु. सोपान की मँगेतर कु. मोनिका से मिलना और अगले माह उनकी शादी है ~
~ ज़िँदगी, पलक झपकाती, किसी, तिलस्मी दुनिया से उतरी 'नाज़्नीन परी सी , मुस्कुराती, शरारत से, आँखेँ मुँद कर, हल्के से,माथा चूमकर, कह रही है,

" बता मैँ कौन हूँ ?" --

इतना ही दील से निकला,


" तू मेरी सहेली है....रुह की परछाईँ है " ---

--- लावण्या

Tuesday, February 20, 2007

मौन गगन दीप
------------------
विक्षुब्ध्ध तरँग दीप,
मँद ~ मँद सा प्रदीप्त,
मौन गगन दीप !
मौन गगन, मौन घटा,
नव चेतन, अल्हडता
सुख सुरभि, लवलीन!
झाँझर झँकार ध्वनि,
मुख पे मल्हार
कामना असीम,
रे,कामना असीम, !
मौन गगन दीप!
चारु चरण, चपल वरण,
घायल मन बीन!
रे, कामना असीम !
मौन गगन दीप!
वेणु ले, वाणी ले,
सुरभि ले, कँकण ले,
नाच रही मीन!
जल न मिला, मन न मिला,
स्वर सारे लीन!
नाच रही मीन
!मौन गगन दीप!
सँध्या के तारक से,
मावस के पावस से,
कौन कहे रीत ?
प्रीत करे , जीत,
ओ मेरे, सँध्या के मीत!
मेरे गीत हैँ अतीत.
बीत गई प्रीत !
मेरे सँध्या के मीत
-कामना अतीत
रे, कामना अतीत !
मौन रुदन बीन,
रे,कामना असीम, !
मौन गगन दीप!
~~ लावण्या

प्रलय
देख रही मैँ, उमड रहा है, झँझावात प्रलय का !

निज सीमित व्यक्तित्त्व के पार,उमड घुमड, गर्जन तर्जन!

हैँ वलयोँ के द्वार खुले,लहराते नीले जल पर !

सागर के वक्षसे उठता, महाकाल का घर्घर स्वर,

सृष्टि के प्रथम सृजन सा, तिमिराच्छादीत महालोक

बूँद बनी है लहर यहाँ, लहरोँ से उठता पारावार,

ज्योति पूँज सूर्य उद्`भासित, बादलके पट से झुककर

चेतना बनी है नैया, हो लहरोँके वश, बहती जाती ~

क्षितिज सीमा जो उजागर, काली एक लकीर महीन!

वही बनेगी धरा, हरी, वहीँ रहेगी
, वसुधा, अपरिमित!

गा रही हूँ गीत आज मैँ, प्रलय ~ प्रवाह निनादित~

बजते पल्लव से महाघोष, स्वर, प्रकृति, फिर फिर दुहराती!

~~ लावण्या

Saturday, February 17, 2007

B/W & Sepia photography






Color pictures seem more alive but Black & White seem to hold on to the TIME with each moment frozen in expressions of the subject --

My " Amma" & her ART






These are the 2 Oil color paintings done by my Amma Late Sreemati Susheela Narendra Sharma .........& 2 of her pictures that I cherish !

I miss Amma so much .......I'm all that she made me !

& I'm so proud to be her child.

પરમ પિતા / Param Pita ( a Gujrati poem of mone )


પરમ પિતા ( Param Pita was published in Varshank Magazine )

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

હિમાલય ની ટોચ પર બેઠો તપસ્વી,
હિમખઁડોને,દૂર દૂર સુધી,
ફેલાયેલાઁ શ્વેત હિમને સાચવી રહ્યો છે!
ભારત તરફ વહેતી, નદોનાઁ નીરને,
યુગયુગોથી, એમજ, અટૂટ, વહાવી રહ્યો છે !
હે શિવ! હે પરમ પિતા, તુ જ,
નીલકઁઠ, શિવમ` સત્ય ને,
પુરક પરમાત્મા પણ તુ જ છે!

કાળનાઁ વહેણ વહી ગયાઁ વર્ષોઁ થી
ભૂખઁડો, જળાશયો, નદીઓ, રહ્યુઁ,
તમામ એમજ, ફક્ત, માનવી!
ક્યાઁ જવા મથી રહ્યો છે તુ ?
તારાઁ અણુશસ્ત્રો, તેથી ય વધુ,
ઘાતકી ભાવો, હ્ર્દયના છે!
હિમાલયની હિમાચ્છાદીતને,
પવિત્ર શીતળ તળેટીમાઁ,
પઁજાબને ગુજરાત, આસામ,
ભારત, ભડકે બળી રહ્યુઁ છે!


ઐક માનવી, પલટાવે છે,
ભાગ્ય-લાખો મેદનીનાઁ અચાનક !
પાપ શુઁ કહેવુઁ, નરક ખડુ થયુઁ છે!
સ્વાર્થનો દાવાનળ, મનુષ્યનાઁ
આટલા નાના હ્રદયમાઁ, કેવો, વિશાળ!
ક્યાઁથી ક્યાઁ લઈ ગયાઁ, મુજને ને તમને,
ને ક્યાઁ આપણે, જઈ રહ્યાઁ છે!
રઁગો હતાઁ બધા ગુલાબી, ઝીણાઁ,
વાદળોનાઁ ને કુસુમનાઁ, સાવ કોમળ
લાલને કાળો બધાને પી રહ્યો છે!
શિવ! પ્રભુ, ફરી પીવો પડશે,
હળાહળ -જે ઉત્પન્ન થયો છે!


તમારે,હિમાલયની ટોચેથી,
ભારતનુ, કલ્યાણ કરવાનુ છે!

--લાવણ્યા

Friday, February 16, 2007

पौराणिक वँशावलीयाँ

ॐ गायत्री देवी
OM GAYATRI DEVI

पौराणिक वँशावलीयाँ :
भारतीय वाङमय से जो मैँ सृष्टि की उत्पति के बारे मेँ समझ पाई हूँ वह प्रस्तुत है :~~
स्वम्भू भगवान ने सर्व प्रथम जल की सृष्टि की - जल ही नीर है और उसमेँ शयन करनेवाले , वे, नारायण कहलाये - उसी जलमेँ एक स्वर्ण मय अण्ड उत्पन्न हुआ .दीर्घकाल के पश्चात उसी मेँ स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए. उस अण्ड के दो टुकडोँ से ध्यूलोक और भूलोक बने. उनके बीच, अवकाश की सृष्टि , ब्रह्माजी ने की. फिर जल के उपर तैरती पृथ्वी को स्थापित किया , दसोँ दिशाएँ बनाईँ फिर सात भावोँ से प्रेरित , सात प्रजापतियोँ को उत्पन्न किया. वे हैँ - " मरीचि, अत्रि, अँगिरा, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु व वसिष्ठ - ये सात भी ब्रह्मा हैँ और ब्राह्मण तद्पश्चात, रोष से रुद्र प्रकट हुए !और पूर्वजोँ के पूर्वज, "सनत कुमार " उत्पन्न हुए - स्कन्द व सनत कुमार , दोनोँ अपने तेज का सँवरण करते रहते हैँ - फिर, विध्युत, मेघ, इन्द्रधनुष,पक्षी तथा पर्जन्य रचे - तद्पश्चात " रोहित "यज्ञ सिध्धि के लिये ऋक्`, यजु, साम बनाये --फिर मुख से देवता और वक्ष स्थल से पितृ गण बनाये --फिर उपसेन्द्रिय से मनुष्य व जँघा से असुर बनाये आगे, "साध्य" नामक प्राचीन देवोँ को बनाया तद्पश्चात अपने ही शरीर के दो भागोँ मेँ से एक से पुरुष व दूजे से नारी होकर मैथुनी प्रजा की सृष्टि की -भगवान विष्णु ने विराट पुरुष ब्रह्मा को रचा और ब्रह्माने पुरुष रचा -- उसी प्रथम "वैराज" पुरुष को हम, "मनु" कहते हैँ --उनकी पत्नी थीँ " शतरुपा" --

आपव प्रजापति को "प्रथम-सर्ग" कहते हैँ - और मनु की योनिजा प्रजा को द्वीतीय सर्ग कहते हैँ स्वायम्भुव मनु के चतुर्युगोँ को "मन्वन्तर" कहते हैँ - जिनके नाम हैँ " सत युग, त्रेता, द्वापर व कलि -- मनु व शतरुपा ने "वीर" को जन्म दीया - वीर ने काम्या से "प्रियव्रत और उत्तनपाद को जन्म दीया -- कर्दम प्रजापति की भी काम्या नामक पुत्री ने "प्रियव्रत" से विवाह कर, सम्राट, कुक्षि, विराट, व प्रभु, ये चार पुत्र उत्पन्न किये -प्रजापति अत्रि ने उत्तानपाद को पुत्र रुप मेँ ग्रहण कीया - उनके चार पुत्र पत्नी सुनृता, जो धर्म की पुत्री थीँ - उन से हुए -जिनमेँ बालक ध्रुव थे ूसरे पुत्र थे - कीर्तिमान्` , शिव व अयस्पति - ध्रुव की भक्ति से प्रसन्न होकर, नारायण ने उसे " सप्तृषियोँ से उत्तर दिशा मेँ एक स्थिर व अचल स्थान दीया ध्रुव ने शम्भु नामक पत्नी से विवाहोपराँत "श्लिष्टि " व "भव्य" नामक दो पुत्र पाये --श्लिष्टि और सुच्छायासे "रिप्य्" रिपुज़्न्जय, पुण्य, वृकल, वृकतेजा, जन्मे - आगे , रिपु के पत्नी बृहती से, "चाक्षुस " पुत्र हुए -- चाक्षुस व पत्नी पुष्करिणी से "मनु" नामक पुत्र हुए - मनु ने अरण्य की पुत्री नडवाला से ब्याह कीया व उनके १० पुत्र हुए -जिनके नाम हँ -- १) उरु, २) पुरु ३)शतध्युम्नु ४) तपस्वी ५) सत्ववान्`६) कवि ७) अग्निष्टुत ८)अतिरात्र ९)सुधम्न्यु १०) अभिमन्यु -- -
उरु व अग्निकन्या से अँग, सुमना, क्रतु, अँगिरा गय, उत्पन्न हुए - अँग ने मृत्यु की पुत्री सुनीथा से ब्याह कर "वेन" को जन्म दीया जो बडा अत्याचारी था पर मुनियोँ ने उसके दाहिने हाथ से पृथु को पैदा कीया जिसे क्षत्रिय कहा गया और वह पृथ्वी की रक्षा करने लगा -पृथु प्रथम भूपति कहलाते हैँ वे राजसूय यज्ञ मेँ अभिषिक्त हुए उन्हीँ के यज्ञ से सूत व मागध प्रकट हुए - पृथु के "पालित " व "अन्तर्धान" २ पुत्र हुए - अन्तर्धान ने शिखण्डिनी से "हविर्धान" पुत्र प्राप्त कीया हविर्धान ने अग्नि पुत्री "घिषणा" से प्राचीन, बर्हि, शुक्ल, कृष्ण, व्रज,और अजिन सँतानो को पाया --महीपति कहलाये "प्रभु प्राचीन बर्हि ने समुद्र की पुत्री सवर्णा से विवाह कीया जिनके दसोँ पुत्रोँ का नाम " प्रचेता" था -- वे सारे धनुर्वेद के पारगामी थे -वृक्षोँ के जलने पर वृक्ष अँशवाली कन्या "मारिषा" को सोम ने छिपा लिया था - उसी से ब्याह कर प्रेचेता ने दक्ष को जन्म दीया ० दक्षने १० कन्याएँ धर्म को, १३ कश्यप को, और नक्षत्र नामवाली २७ कन्याएँ चँद्रमा को दे दीँ --


--लावण्या

Thursday, February 15, 2007

बर्फ़


बर्फ़ ही बर्फ बिछी हो जमीँ पर,तब,
इन हौसलोँ का क्या होगा ऐ, मेरे दील !
हमने भी सुना था, कि,खुद को इतना तू कर बुलँद,
कि खुदा पूछे कि,' ऐ बँदे,बता, तेरी रजा क्या है?'
वीराँ लग रही जमीँ है तो क्या है ?
सब कुछ बदल जायेगा,जो उसकी रजा है !
जो हरी घास बिछी थी,कालीन -सी,
जमीँ पे मखमली,आज ढँकी है ,
सुफेदी ओढ,फिर फूल उठेँगेँ,
उन सूखे दरख्तोँ पे,मुस्कुराते,
हजार रँगोँ मेँ !
है करिश्मा ये तेरा कुदरत,
खुदा का रहमो करम है ये,
हैँ जब तक ऊसूल तेरे कायम,
ना हौसलोँ को टूटने का डर है !
बहारेँ फिर लौट आयेँगी -
चमन गुलजार बाग -बाग होगा
इसकी खुशी है मुझको एय खुदा
आबाद यूँ ही, तेरा रहमो करम होगा ! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

-- लावण्या

"Pity the Nation", by Khalil Gibran


Pity the nation that is full of beliefs and empty of religion.
Pity the nationt hat wears a cloth it does not weave,
eats a bread it does not harvest,
and drinks a wine that flows not from its own wine-press.
Pity the nation that acclaims the bully as hero,
and that deems the glittering conqueror bountiful.
Pity a nation that despises a passion in its dream,
yet submits in its awakening.
Pity the nation that raises not its voice
save when it walks in a funeral,
boasts not except among its ruins,
and will rebel not save when its neck is laid
between the sword and the block.
Pity the nation whose statesman is a fox,
whose philosopher is a juggler,
and whose art is the art of patching and mimicking.
Pity the nation that welcomes its new ruler with trumpeting,
and farewells him with hooting,
only to welcome another with trumpeting again.
Pity the nation whose sages are dumb with years
and whose strong men are yet in the cradle.
Pity the nation divided into into fragments,
each fragment deeming itself a nation.

Fall turns into Winter & spring awaits ...in the wings !

Yesterday was Valentine's Day ....as it is "celebrated " by so many, the world over as a special, symbolic day to honor "LOVE" with Flowers !!
Who can dislike Flowers ? Who does not love to be "in- Love" ?
It is such a Universal theme ....so in this day of mass communication & media over drive, it was bound to spread across the Globe !
Folks have found out the Origin of Saint Valentine who was a priest in 1700 & used to secretly , unite couples into matrimony even though the King was against the soldiers marrying instead of marching off into battlefields !

Aah ! The sheer agony & ecstasy ....of romantic interludes & escapades
the stuff of Mills & Boon romanctic novels ...of my youth !

How clandestinely , romantic it sounds , even @ the turn of 21st century
So the mass merchandising by the Sale & distribution of Cards, flower bouquets, gifts of perfume & expnsive colognes & jewelery & pleasure toys herald the " first Peep" of the " Spring " as it is awaiting
....as Fall turns into a " Yesterday " & Winter into a grim " Today "...!!

FALL

Leaves are falling all around,
Make a "crunch" upon the ground;
Orange and yellow, green and red,
Change their colors when you're in bed.
Many people, so they say,
Like their colors in disarray;
Red and yellow, orange and green,
Make a lovely color scheme.
On the tree are many colors,
But on the ground
Are their brown brothers;
Green and red, orange and yellow,
Really do amaze a fellow.
WINTER

it looks like a winter post card here where i live in the staid , serene mid American city by the Ohio River which has been established in 1787 & is considered the " Gateway to Freedom " -- the Black Slave as he escaped the Rigid South found the first air of Freedom upon entering this city !

Here as i peer from my window, i see that all the bare branches of trees are covered inch by inch with pure & soft ICE !

It was the fluffy , soft kind of Snow but then Sun arose & the snow which had clung all its delicate tennacles on the bare brown branches has turned into sparkling Crystals ;-)

No one but NATURE at its best can creat such scenes !!
-- it is soooo cold outside
-- but with a masala chai in hand, it looks surreal & lovely -- Sigh !!
Like a perfect scene from an album of Winter's best :
" A lovely Picture Post Card " ..........

I await the arrival of SPRING & multitude hues of FLOWRS to Bloom forth with all its pristine Glory !!
" Life is a Merry ~ go ~ round" ........what goes up, must come down !