Saturday, May 26, 2007

श्री अमृतलाल नागर - संस्मरण - भाग -- ५

तीनोँ पुत्रियाँ सौभाग्यवती वासवी, ( .मौलिक व शौनक) सौ. लावण्या, (सिँदुर व सोपान ) सौ.मोँघी ( बाँधवी ) (कुँजम व दीपम ) ,परितोष , अम्मा और पापा जी के साथ १९ वेँ रास्ते खार, बँबई के घर के आँगन मेँ...
गोदीवाला परिवार-
[ मेरी नानी जी कपिला गोदीवाला की गोद मेँ हूँ ]- श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा
श्री गुलाबदास गोदीवाला जी तथा उनकी माता जी "मोटा बा" [मेरी पडनानी जी ]जो १०३ वर्ष की थीँ जब भरे पूरे परिवार के सामने चल बसीं ]
गताँक से आगे : ~~ 
मैँ उस समय भारत कोकिला श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी जी की एक फिल्म 
" मीरा " हिन्दी मेँ डब कर रहा था और इस निमित्त से वह और उनके पति श्रीमान्` सदाशिवम्`जी बँबई ही रह हरे थे। बँधुवर नरेन्द्रजी ने उक्त फिल्म के कुछ तमिल गीतोँ को हिन्दी मे इस तरह रुपान्तरित कर दिया कि वे मेरी डबिँग मेँ जुड सकेँ। सदाशिवं`जी और उनकी स्वनामधन्य पत्नी तथा तथा बेटी राधा हम लोगोँ के साथ व्यावसायिक नहीँ किन्तु पारिवारिक प्रेम व्यवहार करने लगे थे. 
सदाशिवं`जी ने बँबई मेँ ही एक नयी शेवरलेट गाडी खरीदी थी. वह जोश मेँ आकर बोले, " इस गाडी मेँ पहले हमारा यह वर ही यात्रा करेगा ! "
गाडी फूलोँ से खूब सजाई गई उसमेँ वर के साथ माननीय सुब्बुलक्ष्मी जी व प्रतिभा बैठीँ । समधी का कार्य श्रधेय सुमित्रनँदन पँत ने किया। बडी शानदार बारात थी ! बँबई के सभी नामचीन्ह फिल्मस्टार और नृत्य - सम्राट उदयशँकर जी उस वर यात्रा मेँ सम्मिलित हुए थे. बडी धूमधाम से विवाह हुआ. मेरी माता बंधु से बहुत प्रसन्न् थी और पँत जी को , जो उन दिनोँ बँबई मेँ ही नरेन्द्र जी के साथ रहा करते थे, वह देवता के समान पूज्य मानती थी । मुझसे बोली, " नरेन्द्र और बहु का स्वागत हमारे घर पर होगा ! "
वह स्वागत समारोह भी अनोखा ही था. पँतजी ने अपनी एक कविता सुनायी तथा माननीया सुब्बुलक्ष्मी जी ने माँगलिक गीत गाये. वह दिन आज भी याद आ रहा है तो मेरी आँखेँ वे स्मृतियाँ लिखते हुए बरस रहीँ हैँ ! सपना हो गये वे दिन !
आज बँधु के स्वर्गवास के दसवेँ दिन यह सँस्मरण लिख रहा हूँ - इस दस दिनोँ मेँ मैँने उन्हेँ न जाने कितना याद किया है ! प्रतिभा की मृत्यु के बाद मैँ इतना कभी नहीँ रोया. बँधुवर नरेन्द्र जी अजातशत्रु थे ! अपने मीठे व्यवहार से उन्होँने सारी बँबई को एक प्रकार से बाँध लिया था. अवधी के ख्यातिनामा कवि स्व. बालभद्र दीक्षित " पढीस" की स्मृति मेँ हम दोनोँ के परम मित्र डो. रामविलास जी शर्मा के सँपादक्त्व मेँ लखनुउ से प्रकाशित मासिक पत्रीका " माधुरी" का एक विशेषांक प्रकाशित हुआ था। बँधुवरने , जो उन दिनोँ प्रगतिशील आँदोलन से जुडे हुए थे , किसी की स्मृति मेँ एक कविता लिखी थी, जिसकी एक पँक्ति अब भी मुझे याद है , " एक हमारा साथी था जो चला गया " --आज वही पँक्ति अपने परम प्रिय कवि नरेन्द्र शर्मा के लिये दोहरा कर प्रभु से यह कामना कर रहा हूँ कि अगले जन्म मेँ भी हमारा और उनका साथ हो ! नरेन्द्र जी की तीनोँ पुत्रियाँ सौभाग्यवती वासवी, सौ. लावण्या, सौ.मोँघी ( बाँधवी ) तीनोँ ही सम्पन्न और सुसँस्कृत परिवारोँ मेँ ब्याही हैँ बाल -बच्चोँवालीँ हैँ अब चि. परितोष अपनी माँ की सेवा करने के लिये अकेला है. राम करे, वह चिरँजीवी, चिरसुखी तथा चिर उन्नतिशील हो तथा अपनी माँ , मेरी प्रिय सुशीला बेन को खुब खुब सुख दे! "
-- अमृत लाल नागर

~~~~ *समाप्त *~~~~~

श्री अमृतलाल नागर - संस्मरण - भाग -- ४

कुमारी सुशीला गुलाबदास गोदीवाला

श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा
गताँक से आगे : ~~
अपने छात्र जीवन मेँ ही कुछ पैसे कमाने के लिये नरेन्द्र जी कुछ दिनोँ तक "भारत" के सँपादीय विभाग मेँ काम करते थे. शायद " अभ्युदय" के सँपादीकय विभाग मेँ भी उन्होने काम किया था. M.A पास कर चुकने के बाद वह अकेले भारतीय काँग्रेस कमिटी के दफ्तर मेँ भी हिन्दी अधिकारी के रुप मेँ काम करने लगे. उस समय जनता राज मेँ राज्यपाल रह चुकनेवाले श्री सादिक अली और भारत के दूसरे या तीसरे सूचना मँत्री के रुप मेँ काम कर चुकनेवाले स्व. बालकृष्ण केसकर भी उनके साथ काम करते थे. 

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Thursday, May 24, 2007

श्री अमृतलाल नागर - संस्मरण - भाग -- ३

[पँडित नरेन्द्र शर्मा और प्रसिध्ध छायावादी कवि श्री सुमित्रा नँदन पँत जी -- नरेन्द्र शर्मा के शादी के सुअवसर पर ]
अब गताँक से आगे : ~~
भगवती बाबू तो " बोम्बे टाकिज" से जुडकर बम्बई आये थे लेकिन मैँ फ्रीलाँसर था. तब तक दो तीन फिल्मोँ मेँ डायरेक्टर जुन्नरकर की फिल्म " सँगम" के गीत सँवाद लिख कर जब बँबई लौटा तो अपने मित्र फिल्म स्टार और निर्देशक स्वर्गीय किशोर साहू के साथ ही उनके घर पर रहने लगा. वह भी उन दिनोँ बम्बई की फिल्मी दुनिया मेँ नये सिरे से अपने को जमाने मेँ लगे थे और
" आचार्य आर्ट प्रोडक्शन" के साथ जुडकर " कुँआरा बाप" नामक एक हास्य रस की फिल्म बनाने की योजना उन्होँने मुझे बताई . किशोर मुझसे बोले," पँडितजी अभी पैसे की तो कोई बात तुमसे नहीँ कर सकता लेकिन तुम मेरी मदद कर सको तो बहुत अच्छा है -"

मैँ उन दिनोँ श्रीमती लीला चिटनीस के लिये एक फिल्म के सँवाद लिख रहा था और वहाँ की बहसबाजी से बहुत दुखी था. इसलिये मैँने किशोर का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. " कुँआरा बाप" फिल्म ने किशोर को फिर से फिल्म लाइन मेँ जमा दीया ! वह पहले श्रीमती देविका रानी के साथ " बोम्बे टाकिज " की एक फिल्म " जीवन प्रभात" मेँ हीरो बन चुके थे और उनके साथ मुझे भी अपूर्व ख्याति मिली मेरा काम बढ गया था - किशोर और मेरा दोनोँ ही का स्थायी अड्डा दादर के "श्री साउन्ड स्टुडियोज़ " मेँ ही रहता था. एक दिन वहीँ बोम्बे टाकिज से भगवती बाबू का फोन आया , " गुरु, हम आ गये हैँ ! " सुनकर मेरा मन खिल उठा ! मैँने कहा, " क्या नरेन्द्र जी भी आये हैँ ? " " हाँ आज शाम को डाक्टर मोतीचँद्र के यहाँ आओ, खाना - पीना भी वहीँ रहेगा "शाम को कोलिज स्ट्रीट पहुँच गया - नरेन्द्र जी को देखकर चित्त प्रसन्न हो गया ! नरेन्द्र जी मोटे तो कभी नहीँ थे परन्तु उस समय जेल की कष्ट यातनाएँ सहकर वह काफी दुबले हो गये थे. सन इकतालीस के अँत तक मेरी पत्नी और मँझला भाई स्वर्गीय रतन बम्बई आ चुके थे. रोटी पानी का जुगाड घर मेँ ही जम चुका था , इसलिये बँधुवर नरेन्द्र जी को अक्सर भोजन के लिये अपने घर बुला लेता था . इस तरह प्रतिभा ( मेरी पत्नी ) से भी उनका नेह नाता अच्छा जुड गया था. नरेन्द्र जी बडे ही पुरमजाक आदमी थे. हम तीनोँ मेँ खुलाव भी काफी आ गया था. वह आयु मेँ मुझसे तीन वर्ष बडे थे इसलिये प्रतिभा उन्हेँ " जेठजी - देवरजी " कहा करती थी. " जेठजी - देवरजी ", आज आपके लिये क्या बनाऊँ ? "
कभी कभी वह अपनी पसँद की चीजेँ उनसे बनाने के लिये कह भी दिया करते थे.

इसबीच हमने घूमकर लगभग सारी बम्बई छान मारी और इस तरह उनके पूर्व जीवन के सँबध मेँ बहुत कुछ जान लिया. लखनऊ का होने के कारण वे मुझे अक्सर " लखनाऊओ " शहर का निवासी कहा करते थे और खुर्जा स्थित 'जहाँगीरपुर " के निवासी होने के नाते मैँ उन्हेँ " कुरु जाँगलीय" कहा करता था. खुर्जा कुरु जाँगल का ही बिगडा हुआ नाम है. उनके पिता पँडित पूरनलाल जी गौड जहाँगीरपुर ग्राम के पटवारी थे बडे कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, सात्विक विचारोँ के ब्राह्मण ! अल्पायु मेँ ही उनका देहावसन हो गया था. उनके ताऊजी ने ही उनकी देखरेख की और पालन पोषण उनकी गँगा स्वरुपा माता स्व. गँगादेवी ने ही किया. आर्यसमाज और राष्ट्रीय आँदोलन के दिन थे, इसलिये नरेन्द्र जी पर बचपन से ही सामाजिक सुधारोँ का प्रभाव पडा, साथ ही राष्ट्रीय चेतना का भी विकास हुआ. नरेन्द्रजी अक्सर मौज मेँ आकर अपने बचपन मेँ याद किया हुआ एक आर्यसमाजी गीत भी गाया करते थे, मुझे जिसकी पँक्ति अब तक याद है -- " वादवलिया ऋषियातेरे आवन की लोड" लेकिन माताजी बडी सँस्कारवाली ब्राह्मणी थीँ उनका प्रभाव बँधु पर अधिक पडा.
जहाँ तक याद पडता है उनके ताऊजी ने उन्हेँ गाँव मेँ अँग्रेजी पढाना शुरु किया था बाद मेँ वे खुर्जा के एक स्कूल मेँ भर्ती कराये गये. उनके हेडमास्टर स्वर्गीय जगदीशचँद्र माथुर के पिता श्री लक्ष्मीनारायण जी माथुर थे. लक्ष्मीनारायण जी को तेज छात्र बहुत प्रिय थे. स्कूल मे होनेवाली डिबेटोँ मेँ वे अक्सर भाग लिया करते थे. बोलने मेँ तेज ! इन वाद विवाद प्रतियोगिताअओँ मेँ वे अक्सर फर्स्ट या सेकँड आया करते थे. जगदीशचँद्र जी माथुर नरेन्द्र जी से आयु मे चार या पाँच साल छोटे थे. बाद मेँ तत्कालीक सूचना मँत्री बालकृष्ण केसकर ने उन्हेँ आकाशवाणी के डायरेक्टर जनरल के पद पर नियुक्त किया. जगदीशचँद्र जी सुलेखक एवँ नाटककार भी थे तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे पढते समय भी उनका श्रेध्धेय सुमित्रा नँदन पँत और नरेन्द्र जी से बहुत सँपर्क रहा . वह बँधुको सदा " नरेन्द्र भाई "ही कहा करते थे -- अवकाश प्राप्त करने के बाद , एक बार मेरी उनसे दिल्ली मेँ लँबी और आत्मीय बातेँ हुईँ थी उन्होँने ही मुझे बताया था कि उनके स्वर्गीय पिताजी ने ही उन्हेँ ( बँधु को ) सदा
" नरेन्द्र भाई " कहकर ही सँबोधित करने का आदेश दिया था.
नरेन्द्र जी इलाहाबाद मेँ रहते हुए ही कविवर बच्चन, शमशेर बहादुर सिँह, केदार नाथ अग्रवाल और श्री वीरेश्वर से जो बाद मेँ "माया" के सँपादक हुए , उनका घनिष्ट मैत्री सँबध स्थापित हो गया था. ये सब लोग श्रेध्धय पँतजी के परम भक्त थे. और पँतजी का भी बँधु के प्रति एक अनोखा वात्सल्य भाव था, वह मैँने पँतजी के बम्बई आने और बँधु के साथ रहने पर अपनी आँखोँ से देखा था. नरेन्द्र जी के खिलँदडेपन और हँसी - मजाक भरे स्वभाव के कारण दोनोँ मेँ खूब छेड छाड भी होती थी.
किन्तु, यह सब होने के बावजूद दोनोँ ने एक दूसरे को अपने ढँग से खूब प्रभावित किया था. नरेन्द्र जी की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर, बँबईवालोँ ने एक स्मरणीय अभिनँदन समारोह का आयोजन किया था. तब तक सुपर स्टार चि. अमिताभ के पिता की हैसियत से आदरणीय बच्चन भाई भी बम्बई के निवासी हो चुके थे. उन्होँने एक बडा ही मार्मिक और स्नेह पूर्ण भाषण दिया था, जो नरेन्द्र के अभिनँदन ग्रँथ " ज्योति ~ कलश" मेँ छपा भी है - उक्त अभिनँदन समारोह मेँ किसी विद्वान ने नरेन्द्र जी को प्रेमानुभूतियोँ का कवि कहा था ! इस बात को स्वीकार करते हुए भी बच्चन भाई ने बडे खुले दिल से यह कहा था कि अपनी प्रेमाभिव्यक्तियोँ मेँ भी नरेन्द्र जी ने जिन गहराइयोँ को छुआ है और सहज ढँग से व्यक्त किया वैसा छायावाद का अन्य कोई कवि नहीँ कर पाया !
क्रमश: ~~~~~~




Saturday, May 12, 2007

श्री अमृतलाल नागर -सँस्मरण - भाग -- २

यह सभी चित्र , (स्व, नरेन्द्र शर्मा जी के और मेरे = लावण्या के ) भारत कोकिला श्री लता मँगेशकर जी ने खीँचे हैँ और देविका रानी जी के वेब से उपलब्ध -


नरेंद्र शर्मा का नाम तब तक प्रसिध्धि के पथ पर काफी आगे बढ चुका था. इलाहाबाद विश्वाध्यालय मेँ होनेवाले कवि सम्मेलनोँ मेँ उनकी धूम मचने लगी थी उससे भी बडी बात कि उनके प्रथम काव्य सँग्रह " शूल फूल " की भूमिका डो. अमरनाथ झा ने लिखी थी और वह महाकवि सुमित्रानँदन पँत के अनन्य भक्तोँ मेँ माने जाने लगे थे !

मुझे बहुत दु;ख हुआ कि नरेन्द्र जी के आगमन की सूचना समारोह के हो जाने के बाद मिली, वरना हम लोग भी उनके गीतोँ का कुछ आनँद लाभ कर सकते -खैर! सन चालीस मे मैँ जीविका हेतु फिल्म लेखन के काम से बँबई चला गया !एक साल बाद श्रेध्धेय भगवती बाबू भी "बोम्बे टाकीज़" के आमँत्रण पर बँबई पहुँच गयेतब हमारे दिन बहुत अच्छे कटने लगे प्राय: हर शाम दोनोँ कालिज स्ट्रीट स्थित , स्व. डो. मोतीचँद्र जी के यहाँ बैठेकेँ जमाने लगे -

तब तक भगवती बाबू का परिवार बँबई नहीँ आया था और वह,कालिज स्ट्रीट के पास ही माटुँगा के एक मकान की तीसरी मँजिल मेँ रहते थे। एक दिन डोक्टर साहब के घर से लौटते हुए उन्होँने मुझे बतलाया कि वह एक दो दिन के बाद इलाहाबाद जाने वाले हैँ

" अरे गुरु, यह इलाहाबाद का प्रोग्राम एकाएक कैसे बन गया ? "

" अरे भाई, मिसेज रोय ( देविका रानी रोय ) ने मुझसे कहा है कि मैँ किसी अच्छे गीतकार को यहाँ ले आऊँ! नरेन्द्र जेल से छूट आया है - और मैँ समझता हूँ कि वही ऐसा अकेला गीतकार है जो प्रदीप से शायद टक्कर ले सके! "

सुनकर मैँ बहुत प्रसन्न हुआ प्रदीप जी के तब तक, बोम्बे टोकीज़ से ही सम्बध्ध थे "कँगन, बँधन" और "नया सँसार" फिल्मोँ से उन्होँने बँबई की फिल्मी दुनिया मेँ चमत्कारिक ख्याति अर्जित कर ली थी, लेकिन इस बात के से कुछ पहले ही वह बोम्बे टोकीज़ मेँ काम करने वाले एक गुट के साथ अलग हो गए थे इस गुट ने "फिल्मीस्तान" नामक एक नई सँस्था स्थापित कर ली थी - कँपनी के अन्य लोगोँ के हट जाने से देविका रानी को अधिक चिँता नहीँ थी , किँतु, ख्यातनामा अशोक कुमार और प्रदीप जी के हट जानेसे वे बहुत चिँतित थीँ - कँपनी के तत्कालीन डायरेक्टर श्री धरम्सी ने अशोक कुमार की कमी युसूफ खाँ नामक एक नवयुवक को लाकर पूरी कर दी ! युसूफ का नया नाम, "दिलीप कुमार " रखा गया, किँतु प्रदीप जी की टक्कर के गीतकार के अभाव से श्रीमती राय बहुत परेशान थीँ इसलिये उन्होँने भगवती बाबू से यह आग्रह किया था --

दो तीन दिनोँ के बाद मैँ जब डोक्टर साहब के यहाँ पहुँचा तो उनके बनारसी मित्र और भगवती बाबू के पडौसी स्वर्गीय चतुर्दास गुजराती ने मुझसे कहा, " भैया तो देश गया !"

"कब" ?

"कल"

उन दिनोँ या अब भी बँबई मेँ उत्तर भारतीयोँ को "भैया" कहा जाता था - और कोई भैया जब देश जाता तो बँबई के अन्य दूध -विक्रेता भैया लोग उसे विदा करने के लिये स्टेशन अवश्य जाया करते थे - मैँने गुजराती से कहा,

" अरे मुझे पता नहीँ था वर्ना, मैँ भी भगवती बाबू को बिदाई देने स्टेशन जाता ! खैर!! लौटेँगे कब ? "
"अरे यार ! कवियोँ की ज़्बान का भला कोई ठिकाना है ? योँ कह गये हैँ कि आठ दस दिनोँ मेँ आ जायेँगे !" बीच मे और भी दो चार बार डोक्टर साहब के यहाँ गया, लेकिन "गुरु" के वापस आने के कोई समाचार न मिले -

क्रमश:



Thursday, May 10, 2007

"एक हमारा साथी था, जो चला गया" ...( श्री अमृतलाल नागर ) - भाग -- १



लेख़क : श्री अमृतलाल नागर जन्म:: १९१६
भूख
( १९४६ ) - पँचु गोपाल मुखर्जी जो एक पाठशाला के निर्माण के बाद हेड मास्टरी करते हुआ, बँगाल की भूखमरी को जीते हैँ जिसे पाठक उन्हीँ की नज़रोँ से देखता है इस उपन्यास को आजतक, हिन्दी के खास दस्तावेज की तरह आलोचक व पाठक उतनी ही श्रध्धा से पढते हैँ जितना कि जब उसे पहली बार पढा गया होगा !
सात घुँघटवाला मुखडा
खंजन नयन

अग्नि
-गर्भ
एकदानैमिषारण्यै
मानस का हँस
टुकडे टुकडे दास्तान्
साहित्य और सँस्कृति
महाभारत- कथा
बूँद और समुद्र
सुहाग के नुपूर
अमृत और विष
चक्कलस
करवत
मेरी प्रिय कहानियां
नटखट चाची - ५ हास्य कथाएं
अमृत और विष

( कन्नड "अमृत मट्टु विष" पी। अदेश्वर राव द्वारा लिखित कथा का हिन्दी अनुवाद जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ )
किस्से कहानियाँ,लघु कथाएँ,नाटक, निबँध, आलोचना लिखनेवाले हिन्दी के प्रसिध्ध साहित्यकारजिन्हेँ भारत सरकार ने "पद्म भूषण" पुरस्कार से, नवाज़ा है ...तो सोवियत लेन्ड अवार्ड १९७० मेँ जब मेरे चाचाजी को मिला तब वे बम्बई रुके थे और पापाजी से घर मिलन आये थे और रशिया से एक बहुमूल्य रत्न " ऐलेक्ज़ान्ड्राएट" भी लाये थे, चूँकि उन्हेँ पापाजी के विस्तृत रत्न व ग्रहोँ के ज्ञान के बारे मेँ पता था --आज, रत्न स्व.वासवी मोदी मेरी बडी बहन के बडे पुत्र मौलिक के पास है !
मेरे चाचाजी भी ऐसे ही बहुमूल्य "रत्न" ही तो थे ! हिन्दी साहित्य जगत के असाधारण प्रतिभाशाली साहित्यकार थे वे ! "प्रतिभा जी" के पतिदेव ! लखनऊ शहर के अपने......गौरव स्तँभ ...जो अक्सर बम्बई आया करते थे...
उनकी बडी सुपुत्री, डो. अचला नागर जी ने फिल्म "निकाह" की पटकथा लिखी है - और

रीचा नागर जी ने अपने प्रिय "दद्दु" से प्रेरणा लेकर, " आओ बच्चोँ नाटक लिखेँ.." ' ( बाल नाट्य अकादमी प्रेषित) स्थापित किया है

पूज्य पापाजी के अचानक हुए देहाँत के बाद श्री अमृत लाल चाचाजी ने ये लिख कर
" सँस्मरण पुस्तक " शेष - अशेष" के लिये स्व. वासवी को अपनी यादेँ भेजीँ ...
"एक हमारा साथी था, जो चला गया"

बँधुवर नरेन्द्र शर्मा जी के साथ मेरी घनिष्ठता योँ तो सन्` १९४३ मेँ उनके बम्बई जाने पर बढी पर अब याद आता है कि उनसे मेरा परिचय सन्` १९३६ मेँ हुआ था -- उस समय मैँने कुछ नवयुवकोँ के साथ : द कोस्मिक सोशलिस्ट " नामकी सँस्था के तत्वाधान मेँ श्रेध्धेय निरालाजी का अभिनँदन समारोह आयोजित किया था यध्यपि यह आयोजन केवल स्थानीय गणमान्य कवियोँ एवँ साहित्यकारोँ के साथ ही सम्पन्न हुआ था, किँतु, सौभाग्यवश आयोजन बहुत ही भव्य रुप से हुआ था कार्यक्रम पूरा होने के बाद एक ठिगने कद और गौरवर्ण के चश्माधारी युवक निरालाजी के सामने आकर खडे हुए॥
उन्हेँ देखते ही महाकवि खिल उठे थे !
उनसे कुशल क्षेम की कुछ बातेँ कर लेने के बाद उन्होँने मुझसे पूछा,
" इन्हेँ जानते हो ? यह नरेन्द्र शर्मा हैँ ॥"


क्रमश: ...




Saturday, May 05, 2007

ग्रेट ब्रिटन की महारानी ऐलिज़ाबेथ



ग्रेट ब्रिटन की महारानी ऐलिज़ाबेथ :

http://www.royal.gov.uk/output/Page1.asp


पूरा नाम: ऐलिज़ाबेथ ऐलेक्ज़ान्ड्रा मेरी

जन्म: २१ अप्रेल,१९२६ ( मेरी अम्मा सुशीला भी इसी साल मेँ जन्मी थीँ )
ज़नम स्थान: १७ ब्रुटोन स्ट्रीट,मे फेर लँडन यु.क़े.( युनाइटेड किँगडम)
पिता:प्रिँस आल्बर्ट जो बाद मेँ जोर्ज ४ बनकर महारज पद पर आसीन हुए.


माता:एलिजाबेथ -बोज़ लियोन ( डचेस ओफ योर्क - बाद मेँ राजामाता बनीँ )
घर मेँ प्यार का नाम: "लिलीबट "
शिक्षा : उनके महल मेँ ..ही
इतिहास के शिक्षक: सी. एह. के मार्टेन इटन के प्रवक्ता


धार्मिक शिक्षा : आर्चबीशप ओफ केन्टरबरी

बडे ताऊ : राजा ऐडवर्ड अष्टम ने जब एक अमरीकी सामान्य नागरिक ,विधवा विलिस सिम्प्सन से प्रेम विवाह कर लिया तब उन्हेँ राजपाट छोडना पडा -तब ऐलिज़ाबेथ के पिता सत्तारुढ हुए --

१३ वर्ष की उम्र मेँ द्वीतीय विश्व युध्ध मेँ बी.बी.सी. रेडियो कार्यक्रम " १ घँटा बच्चोँ का"मेँ अन्य बच्चोँ केप्रसारित कार्यक्रम से हीम्मत बँधाई -
बर्कशायर, वीँडज़र महल मेँ युध्ध के दौरान निवास किया जहाँ भावी पति राजमुमार फीलिप से मुलाकात हुई जो उसके बाद , नौसेना सेवा के लिये गए और राजकुमारी उन्हेँ पत्र लिखतीँ रहीँ क्यूँकि उन्हेँ राजकुमार से, प्रेम हो गया था --
१९४५ मेँ, No 230873 का अँक मिला जिससे सेना मेँ काम किया --
1947 मे पिता के साथ दक्षिण अफ्रीका, केप टाउन शहर की यात्रा की और देश भक्ति जताते हुए रेडियो प्रसारण किया - २० नवम्बर, १९४७ मेँ ड्यूक ओफ ऐडीनबोरो,कुँवर फीलिप डेनमार्क व ग्रीस के से भव्य विवाह समारोह सँपन्न हुआ -
१९४८ मेँ प्रथम सँतान, पुत्र चार्ल्स का जन्म-
१९५० मेँ कुमारी ऐन का जन्म -
१९६० मेँ कुमार ऐन्ड्रु जन्मे -
१९६४ मेँ कुमार ऐडवर्ड चौथी और अँतिम सँतान --


१९५१ तक "माल्टा " मेँ भी रहीँ जहाँ फीलिप सेना मेँ कार्यरत थे -
६ फरवरी,१९५२ वे आफ्रीका के केन्या शहर पहुँचे जहाँ के ट्रीटोप होटेल "ठीका" नैरोबीसे २ घंटे की दूरी पर थे - वहाँ उन्हेँ बतलाया गया कि उनके पिता, की नीँद मेँ रात्रि को मृत्यु हो गई है सो, जो राजकुमारी पेडोँ पर बसे होटल पर चढीँ थीँ वे रानी बनकर उतरीँ !!


भव्य समारोह २ जून, १९५२ को वेस्ट मीनीस्टर ऐबी मेँ सम्पन्न हुआ जब वे धार्मिक रीति रिवाज से ब्रिटन की महारानी के पद पर आसीन हुईँ !

Listen to a special piece written by the current Queen's Piper


गत २१ ऐप्रिल को वे ८० वर्ष की हुईँ हैँ और मेरे प्राँत के पास केनटकी डर्बी मेँ पधार रहीँ हैँ इसलिये, सोचा उनके जीवन को देखा जाये जो सच्मुच भव्य है !
Links:
http://www.google.com/search?q=Queen+Elizabeth+2nd&rls=com.microsoft:*:IE-SearchBox&ie=UTF-8&oe=UTF-8&sourceid=ie7&rlz=1I7DKUS

Thursday, May 03, 2007

कौन यह किशोरी?



चुलबुली सी, लवँग लता सी,
कौन यह किशोरी ?
मुखड़े पे हास,रस की बरसात,
भाव भरी, माधुरी !
हास् परिहास, रँग और रास,
कचनार की कली सी,
कौन यह किशोरी?
अल्हडता,बिखराती आस पास,
कोहरे से ढँक गई रात,
सूर्य की किरण बन,
बिखराती मधुर हास!
कौन यह किशोरी?
भोली सी बाला है,
मानों उजाला है,
षोडशी है या रँभा है ?
कौन जाने ऐसी ये बात!
हो तेरा भावी उज्ज्वलतम,
न होँ कटँक कोई पग,
बाधा न रोके डग,
खुलेँ होँ अँतरिक्ष द्वार!
हे भारत की कन्या,
तुम,प्रगति के पथ बढो,
नित, उन्नति करो,
फैलाओ,अँतर की आस!
होँ स्वप्न साकार, मिलेँ,
दीव्य उपहार, बारँबार!
है, शुभकामना, अपार,
विस्तृत होँ सारे,अधिकार!
यही आशा का हो सँचार !

~~लावण्या~~

Saturday, April 28, 2007

अल्यूनाटाइम




यह
अत्याधुनिक किँतु पौराणिक चँद्रमा की घटने बढने की प्रक्रिया से जुडी हुई नई इजाद है. ३ वृत्ताकार वलयोँ से ज्वार - भाटा से पर्चालित समय को नई पध्ध्ति सेसमझने वाला यँत्र है --

--धुरी पर घुमती हमारी पृथ्वी के स्पँदनोँ से, आधुनिक सोचके साथ बिलकुल नई दिशा की ओर ले जाता अद्वितीय व वैज्ञानिक स्मारक है -इसके द्वारा हम समय को एक नये तरीके से समझ पायेँगे क्यूँकि यह चँद्रमा और समुद्र के ज्वार भाटा पर आधारित घडी है

४० मीटर का घेरा लिये ५ मँजिल ऊँचाई लिये,३ पुरानी सीमेन्ट से बनाया गया, पारदर्शक, अंडे के आकार का वृताकार स्मारक है -

इस के वलयोँ से चँद्रमा की किरणोँ के पसार होने से जो समय का ज्ञान होता है उसे अल्यूनाटाइम कहा गया है

हाल मेँ २०१२ तक इसको बनाये जाने की सँभावना है स्थान का चयन सँभवत यू.के. ग्रेट ब्रिटन, ओस्ट्रेलिया या लँदन हर मेँ मेरीडीयनपर इसके बनने की सँभावना है -- देखेँ लिन्क --

सूरज मुखिया


ओ,सूरजमुखी के फूल,
तुमने कितने देखे पतझड?
कितने सावन? कितने वसँत ?कितने चमन खिलाये तुमने?
कितने सीँचे कहो, मधुवन?
धूल उडाती राहोँ मेँ,चले क्या?
पगडँडीयोँ से गुजरे थे क्या तुम?
सुनहरी धूप, खिली है आज,
बीती बातोँ मेँ बीत गई रात,
अब और बदा क्या जीवन मेँ?
क्योँ ना कह लूँ मनकी मैँ बात!
तुम सुनते जाना साथी मेरे,
मैँ " सूरजमुखिया " ,तू दीखला बाट !
घूमते रहते सूरज के सँग सँग
मुर्झा जाते हो अँधकार आने पे,
मैँने खिलाये जो बाग बगीचे,
सौँप चला हूँ आज,तेरे हवाले !
करना रखवाली बगिया की तुम,
मैँ ना रहूँ कल,कहीँ, जो चल दूँ!
--लावण्या

Thursday, April 26, 2007

केन्द्रबिन्दु


प्रशाँत महासागर किनारे पर खडा ऐकाकी वृक्ष जो १७ मील लँबे तेज रफ्तार मार्ग पर पर्यटक आकर्षण का "केंद्रबिंदु" है जिसे देखकर मन न जाने, कई बार, कितने ही तानोँ बानोँ मेँ उलझ गया है !!
मेरी अम्मा श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा द्वारा बनाया हुआ चित्र



" पल पल छिन छिन,
कण कण बिन बिन,

सँजोये जो हर दिन

घुल मिल जाते यूँ,

बिँदु तुहीन जल से

महासागर मे मिल -
-अस्तित्व अलग है,
वारिधि का क्या ?

कण का क्या रज से ?

उस असीमता का पट,

ऊँचे अम्बर फलकसे ?

मुझमेँ निहारीकाएँ,
मैं आकाशगँगा मेँ,
एकाकार हुआ सर्व,

मौन गहन मनन मेँ !"
Ye Ek "Abstract " poem hai -- "Kendra Bindu" VYOM Mandal ka, CENTERAL Point hai .
VIRAT , ka ya BRAHM ka -- ya ATMAN ka bhee --

Every mili second, in the tinest of the atoms particles, that which is "preserved"
often merges into INFINITY ---
In Dew drops, in mighty Oceans,in all forms of WATER,
in every sand particle, stretching into beyond it all,
reflecting from the AAKASH , adorned with multitudes of Galaxies
where I am a STAR in the Milky Way ...when my SILENCE deepens
in my hour of Solitude !

-- लावण्या

लिखावट : कैसी हो ? ( Some unusual & Rare Documents )

~ वे हमेशा अपना लिखा हुआ ईश्वर के नाम के आरँभ के साथ आरँभ करतीँ हैँ
जी हाँ ,देखिये, पन्ने के ठीक बीचोँबीच लिखा है,
"श्रीकृष्ण" लिखावट : कैसी हो ?
मतलब इन्सान जबसे लिखना पढना शुरु करता है, अक्षरोँ से अपने मन की भावनाओँ को आकार देना शुरु करता है, तभी से लिखा हुआ एक एक अक्षर, 'दस्तावेज" की तरह सुरक्षित हो जाता है.
"ब्लोग - लेखन" भी हर इन्सान की सूझ बूझ, विचार शैली को लँबे अँतराल तक, समेटे, भविष्यमेँ कई सँभावनाएँ सँजोये, कुछ कहता हुआ, कुछ अपने लिये, कुछ किसी अन्य के लिये एक सत्य सा रखता हुआ, वैसा ही प्रामाणिक दस्तावेज बन पाये ये लिखनेवाले पर या तो 'सच्ची बातोँ " पर निर्भर होगा जो स्वयँ ही अपना आपा ढूँढेगा, बनायेगा या खो देगा !
यहाँ पर कई अलग तरह की लिखावट प्रस्तुत है ~
~हमारी सोच समझ जीवन के अनुभवोँ पर आधारित होती है, कई बार देख सुनकर वह ज्यादह परिपक्व होती है।
कुछ ऐसा भी लिख गए कि जिन्हेँ एक " माप - दण्ड " माना गया __ जैसे कि, कवि नाट्यकार रस शिरोमणि कालिदास या शेक्सपीयर !!
हिन्दी नाटिका " माधुरी" का प्रथम पृष्ठ देखिये __ आज "विश्वजाल" पर, "जाल घर" पर उपस्थित हो ही गया है ! ये पुस्तक मेरे पास है -- क्लीक करेँ और पढेँ --श्री भार्तेन्दु हरिस्चन्द्रजी की किताब का पहला पन्ना, हिन्दी साहित्य का प्रथम गौरवमय सोपान आज भी अपनी विजय पताका फेहराता, शान से
से खडा है !

हिन्दी नाटिका " माधुरी" का प्रथम पृष्ठ देखिये

और ये मेरे पुज्य पापाजी का देहली से लिखा हुआ पोस्ट कार्ड है -- जब वे आकाशवाणी को खडा करने मेँ सँलग्न थे -- आज भी "रानी बिटिया लावणी " का सम्बोधन पढकर, हल्की सी मुस्कान चेहरे पर छा ही जाती है ! अक्षर अवश्य धुँधले पड गये हैँ, स्याही भी सूख गई है कागज़ भी पुराना हो चला है पर उनकी भाव उमडवाने की क्षमता मेँ कोई कमी नहीँ आई !

और अँत मेँ यह चित्र मुझे भेजा गया था "ई मेल" के जरिये ~

~ कैलास पर्बत पर हिमपात का द्र्श्य कैमरे से लिया गया है !

गौर से देखिये, क्या जैसा आकार नहीँ दीखता ?? है ना विस्मय लिये बात ?

Sunday, April 22, 2007

घुंघरू क्या बोलेँ ?



घुंघरू क्या बोलेँ ?
क्या बोलेँ ? क्या बोलेँ ?
कह दो गोरिया ...
घुंघरु क्या बोले क्या बोले क्या बोले?
लाज लगे, पग रोके,
मुझे देख अकेली,पथ रोके,
पैन्जनीया, मनवा पग रोके पग रोके,
ना शोर मचा, जग जायेगा जग,
बढेगी मोरी उलझन,
ताको वे बोले, ये बोले,
घुँघरु ये बोले!
-- लावण्या

Thursday, April 19, 2007

मासूमोँ का खून बहा कर तुम्हेँ क्या मिला " चो " ?



कहाँ हमारे महान सँत महापुरुष और कहाँ ऐसे भूले भटके नवयुवक ? कितनी बडी खाई है -- सोचने मेँ , समझने मेँ -- जब ऐसे निर्मम युवा की तस्वीर यहाँ दे रही हूँ तब इस पापात्मा को मार्ग दीखलाने के लिये, इन विभूतियोँ को भी यहाँ आदरणीय स्थान देना चाहती हूँ -- शायद उनकी असीम अनुकँपासे इस जीव का उध्धार हो जाये, क्या पता ? :-(




मासूमोँ का खून बहा कर तुम्हेँ क्या मिला " चो " ?????
ये तस्वीरेँ हैँ जो न्युयोर्क के अखबार मेँ छपी हैँ --
दिवँगतोँ की आत्मा को परम कृपालु ईश्वर अपनी ज्योति मेँ समाहित करेँ और शाँति प्रदान करेँ यही नम्र प्रार्थना है मेरी !!!!
-- जीवन इसी का नाम है कहीँ पर शादी की खुशीयाँ, नाचगाना, सँगीत के स्वर गूँजते हैँ तो कहीँ मातम छाया रहता है दबी सिसकीयाँ सूनी आँखोँ स्वजन की आकृति की प्रतीक्षा करतीँ हैँ !
दुखद
समाचार है -- सोच रही हूँ कि, "चो" जैसे नवयुवक के आथ दूसरे युवा सहपाठीयोँ ने , ऐसा क्या किया होगा कि उसे इतना गुस्सा आ गया ?
बार युवा पीढी पर पढाई का बेहिसाब बोझ लाद दीया जाता है, आगामी भविष्व मेँ उन्हेँ अच्छी नौकरी की तलाश, मिलेगी या नहीँ ? पढाई कैसी रहेगी ? सफलता मिलेगी या नहीँ ? उस पर यौवनावस्था मेँ , किस तरह के मित्र मिलते हैँ, उनसे कैसे अनुभव हासिल होते हैँ , परिवार कहाँ तक सह्हयता कर पाता है, जीवन साथी की तलाश के दुर्गम पडाव, ये कई सारे मानसिक दबाव व तनाव रहते हैँ और इन सारे कोणोँ मेँ जहाँ भी रिक्त्तता रहती है, वहीँ से निराशा गहरे पानी की तरह आकँठ आ घेरती है --

Wednesday, April 18, 2007

ऐश्वर्या अगर भाभी बनने जा रहीँ हैँ तब सारे " देवरोँ " के लिये ये खास गुजरात का गीत हिन्दी शब्दोँ मेँ पेश कर रही हूँ







ऐश्वर्या अगर भाभी बनने जा रहीँ हैँ तब सारे " देवरोँ " के लिये ये खास गुजरात का गीत हिन्दी शब्दोँ मेँ पेश कर रही हूँ

" ओ भाभी मोरी महावर रचाई ल्यो"
मेहन्दी बोई थी मालव मेँ उसका रँग गया गुजरात रे,

भाभी मेरी महावर रचाई लो !
कुट पीस के भरी कटोरीयाँ,
ओ भाभी रचालो ना तुम्हारे हाथ रेभाभी, मेहँदी लगा लो !"

Sunday, April 15, 2007

नर्मदे हर ! नर्मेदे हर !--नर्मदा क्षेत्र के तीर्थ स्थान : भाग - ४


नर्मदा क्षेत्र के तीर्थ स्थान :

उत्तर दिशा मेँ स्थित यात्रा के स्थलोँ की सूची इस प्रकार है --१) परशुराम - हरी धाम २) भड भूतेश्वर, ३) भरुच,४) शुक्ल तीर्थ,५) शिमोर,६) बडा कोरल ७) नारेश्वर जो श्री रँग अवधूत जी का आश्रम स्थल है ८) माल्सार ९) झानोर १०) अनसुआ ११) बद्री नारायन १२) गँगनाथ १३ ) चानोड ,जो दक्षिण का प्रयाग कहलाता है १४ ) कर्नाली १५ ) तिलकवाडा १६) गरुडेश्वर १७) हम्फेश्वर १८) कोटेश्वर १९) माधवगढ या रेवाकुँड २०) विमलेश्वर या अर्धनारेश्वर २१) माहेश्वर २२) मँडेलश्वर २३) बडवाहा २४) ओम्कारेश्वर २५) २४ अवतार २६) श्री सीतावन २७) ध्याधि कुँड २८ ) सिध्धनाथ २९) भृगु कुत्छ ३०) सोकालीपुर ३१) ब्राह्मणघाट ३२) भेडाघाट३३) धुँधाधार ३४) तिलवाराघाट ३५) गौरीघाट ३६) जल हरी घाट ३७) मँडला घाट ३८) लिँग घाट या सूर्यमुखी नर्मदा ३९) कनैया घाट ४०) भीम कुँडी४१) कपिल धारा ४२) अमर कँटक धाम ४३) माँ की बगिया ४४) सोनधार या सुवर्ण प्रपात ४५) नर्मदा उद्`गमस्थली --
नर्मदा माई की प्रशस्ति, जगद्`गुरु श्री शँकराचार्य जी ने " नर्मदाअष्टक " की रचना करके भारतीय मानस मेँ प्रतिष्ठित कर दीया है
अक्सर कहा जाता है कि, "नदी का स्त्रोत और साधु का गोत्र कभी न पूछेँ ! "
परन्तु जब भी धीमे, शाँत जल प्रवाह को दुस्तर पहाड के बीच रास्ता निकाल कर बहते हुए जब भी हम देखते हैँ तब ये सवाल मन मेँ उठता ही है कि, इतना सारा जल कहाँ से आता होगा ?
इस
महान नदी का अस्त्तित्व कैसे सँभव हुआ होगा ?
जीवनदायी, पोषणकारी निर्मल जलधारा हमेँ मनोमन्थन करवाते हुए, परमात्मा के साक्षात्कार के लिये प्रेरित करती है जो इस शक्ति के मूल स्त्रोत की तरफ एक मौन सँकेत कर देती है --
पँचमहाभूतमेँ से जल तत्व आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से मानव शरीर सूक्ष्म रुप मेँ ग्रहण करता है उसीसे जल तत्व से हमारा कुदरती सँबध शापित हुआ है -- जल स्नान से हमेँ स्फुर्ति व आनण्द मिलता है - थकान दूर होकर मन और शरीर दोनोँ प्रफुल्लित होते हैँ और जब ऐसाअ जल हो जो प्रवाहमान हो, मर्र मर्र स्वर से कल कल स्वर से बहता हो , सँगीत लेकर चलता हो, शीतल हो तब तो प्रसन्नता द्वीगुणीत हो जाती है ! और ऐसा नदी स्नान हमारी स्मृतियोँमेँ सदा के लिये बस जाता है ! जिसकी याद आती रहती है --

लेखिका : लावण्या


(पावन नदी नर्मदा) नर्मदे हर ! नर्मदे हर! ": भाग - ३


भारत मेँ एक यह भी रीवाज है कि, पावन नदीयोँ की परिक्रमा की जाये ! मनमेँ प्रार्थना लिये, हाथ जोडे, प्रणाम करते हुए, अगर भक्ति भाव सहित, नदी की परिक्रमा की जाये तब नर्मदा माई आपकी इच्छाओँ को पूरी करेँगी ऐसी लोक मान्यता है --
" निर्धन को मिले धन,
बांझ को मिले बालक,
अँधे को मिले दर्शन,
नास्तिक को मिले भक्ति, टूटे
सारे बँधन, नर्मदे हर ! नर्मदे हर! "
जिस भूमि पर नर्मदा की पावन धारा बहती है वह तपनिष्ठ भूमि है - भक्तोँ की मान्यता है कि, यमुना नदी के जल के ७ दिन समीप रहने के बाद, उसका जल पीते रहने के बाद, पूजा करने के बाद ,सरस्वती नदी के जल का प्रभाव ३ दिन के बाद, गँगाजी के जल को स्नान कर, डूबकी लगाने के बाद मनुष्य के इकत्रित हुए पापोँ को धो देता है परँतु नर्मदा ऐसी पावन नदी है कि,जिसके बस दर्शन करते ही वो इन्सान के पाप धो देतीँ हैँ !
दोनों ही किनारे ये पावनकारी क्षमता रखते हैँ !
जिन ऋषियोँ ने नर्मदा नदी के समीप तपस्या की , जप तप व यज्न्ज कीये उनकी सूची बडी लँबी है - कुछ नाम प्रमुख हैँ - जैसे, कि, इन्द्र, वरुण, कुबेर, व्यास, सनत कुमार, अत्रि ऋअषि, नचिकेता, भृगु महाराज, च्यवन, पिप्पलाद`, वशिष्ठ, ऋअषि, भर्द्वाज ऋअषि, कश्यप, गौतम, याज्ञवल्क्य,मार्केण्देय, शुकदेव, राजा पुरुरवा, नृपति मान्धाता, हीरण्यरेति, श्रीरँग अवधूत इत्यादी
लेखिका : लावण्या

Saturday, April 14, 2007

नर्मदे हर ! नर्मेदे हर! -- भाग - २


इतिहास साक्षी रहा है नदीयोँ के आसपास के इलाकोँ का कि किस तरह प्राचीन सभ्यताओँ का , ग्राम्य व नगरोँ मेँ परिवर्तन होना नदी तट पर ही , सँभव हुआ है.जल की सुविधा, भूमि का बाहुल्य, नदीओँ के समीप, आबादी के बसने मेँ सहायक सिध्ध हुए. नदी की सँपदा से ही कायमी पडाव मनुष्य की सभ्यता के सोपान बने.युप्फेटीस, टाएग्रीस, नदीने मेसोपोटेमीया की सभ्यता रखी, याँग काई शेक व सीक्याँग नदीयोँ के तटोँ पर चीन की सभ्यता पनपी और भारत की सिँधु नदी ने सिँधु घाटी की सभ्यता की नीँव रखी थी - नाइल नदी ने उसी तरह, प्राचीन इजिप्त की सँस्कृति व सभ्यता के सुमन खिलाये थे -गँगा यमुना व इन नदीयोँ की सहभागी धाराओँ ने, उत्तर भारत को सदीयोँसे सीँचा है अपने जल से जीवित रखा हुआ है -- उत्तराखँडॅ आज भी आबाद है ये सारे उदाहरण ही हमसे नदीयोँ को " सँस्कृति और सभ्यता की जननी " की उपमा दीलवाते हैँ -- उन्हीँ के प्राणदायी जल से मनुष्य प्रगति की गाथा के आध्याय लिखे गये हैँ और आगे भी, लिखे जायेँगे -- नदी सभ्यता रुपी शिशु को गोद मेँ लिये दुलार करती हुई " माँ " स्वरुप हैँ --
जो बात हम अन्य वैश्विक स्तर की नदीयोँ के बारे मेँ कह रहे हैँ वही नर्मदा नदी पर भी लागू होती है - नर्मदा नदी के किनारोँ पर बसे लोगोँ के लिये वे " लोक -माता" हैँ इतना ही नहीँ वे " परा ~ शक्ति, जगदम्बा स्वरुपिणी" हैँ जो कि " विश्वमाता स्वरुपा" भी हैँ -- इस वर्तमान समय मेँ, कच्छ, समूचा गुजरात नर्मदा की पावन जल धारा का अमृतदायी जल अपनी भूमि की प्यास बुझाने हेतु चाहता है नर्मदा के आशीर्वाद के बिना इन प्राँतोँ का उत्कर्ष और खुशहाली असँभव जान पडते हैँ --
क्र्मश: --
: लावण्या