Saturday, March 31, 2007

नित प्रियम भारत भारतम्






नित प्रियम भारत भारतम्

मुझे, भारत बडा ही प्रिय है इस तथ्य का कारण बडा सीधा है,

चूँकि, भारत , भारत है, और मैँ -मैँ हूँ !

भारत वह भूमि है, जहाँ पर मैँने जन्म लिया. वहीँ पर मैँ पल कर बडी हुई - मेरी आत्मा, मेरा शरीर, मेरा लहू, मेरी हड्डियोँ का ये ढाँचा और मेरा मन, भारत के आकाश तले ही पनपे - भारत, मेरे पूर्वजोँ की पुण्यभूमि रही है - भारत मेँ ही मेरे पित्री जन्मे और चल बसे !भारत ही वह भूमि है, जहाँ मेरे पिता व माता जन्मे और पल कर बडे हुए -श्री राम ने जब स्वर्णसे दमकती हुई लँकानगरी देखी थी तब उन्हेँ अपनी जन्मभूमि " अयोध्या" याद आ गई थी - तब अपने अनुज लक्ष्मण से कहाथा, " हे लक्ष्मण ! न मे रोचते स्वर्णमयी लँका ! जननी ! जन्मभूमिस्च` , स्वर्गादपि गरीयसी !"

भारत ने मुझे यादोँके भरपूर खजाने दीये हैँ ! मुझे याद आती है, उसकी शस्य श्यामला भूमि, जहाँ घने, लहलहाते वृक्ष, जैसे कि, विशाल वटवृक्ष,चमकीला कदलीवृक्ष, आमोँके मधुर भारसे दबा, आम्रवृक्ष, आकाशको प्रणाम करता देवदारु, शर्मीला नीम का पेड, अमलतास, कनेर, नारिकेल, पलाश तथा और भी न जाने कितने और जो आज भी हर भारतीय को पुकारते हैँ --

कभी याद आती है, मनोरम फूलोँकी ! वे सुँदर फूल, जैसे, कदम्ब, पारिजात, कमल, गुलाब, जूही, जाई, चमेली, चम्पा, बकुल और भीनी भीनी, रात की रानी ! और भी कितनी तरह के फूल अपने चित्ताकर्षक छटासे , अपनी भोली मुस्कान से, व मदमस्त सुगँधसे हर भारतीय की आत्मा को तृप्त कर रहे हैँ -

मुझे याद हैँ वे रसभरे, मीठे फल जो अपने स्वाद व सुगँध मेँ सर्वथा अजोड हैँ ! सीताफल, चीकू, अनार, सेब, आम, अनानास, सँतरा, अँगूर, अमरुद,पपीता, खर्बूजा,जामुन,बेल,नासपाती- और भी कई जो मुँहमेँ रखते ही, मनको तृप्ति और जठराग्नि को शाँत कर देते हैँ -

मुझे याद आती है वह भारतीय रसोईघरॉ से उठती मसालोँ की सुगँध ! कहीँ माँ, या कहीँ भाभी, तो कहीँ बहन या प्रेयसी के आटे सने हाथोँ पर खनकती वह चूडियोँ की आवाज! साथ , हवा मेँ तैरती, जीरे, कालिमीर्च, लौँग, दालचीनी, इलायची, लाल व हरी मिर्च, अदरख, हीँग, धनिये, सौँफ, जायफल, जावन्त्री वगैरह से उठती उम्दा गँध! तरकारी व दाल के साथ, फैलकर,स्वागत करती, आरोग्यप्रद, सुगँधेँ जिसे हर भारतीय बालकने जन्म के तुरँत बाद, पहचाननी शुरु कर दी थी !

भारत की याद आती है तब और क्या क्या याद आता है बतलाऊँ ?

हाँ, काश्मीर की फलो और फूलोँसे लदी वादीयाँ और झेलम नदी का शाँत बहता जल जिसे शिकारे पर सवार नाविक अपने चप्पू से काटता हुआ, सपनोँ पे तैरता सा गुजर जाता है ! कभी यादोँ मेँ पीली सरसोँ से सजे पँजाब के खेत हवामेँ उछलकर मौजोँ की तरँगोँ से हिल हिल जाते हैँ - उत्तराखँड के पहाडी मँदिरोँ मेँ , कोई सुहागिन प्राचीन मँत्रोँ के उच्चार के साथ शाम का दीया जलाती दीख जाती है -- तो गँगा आरती के समय, साँध्य गगन की नीलिमा दीप्तीमान होकर, बाबा विश्वनाथ के मँदिर मेँ बजते घँटनाद के साथ होड लेने लगती है -- मानोँ कह रही है,

" हे नीलकँठ महादेव! आपकी ग्रीवा की नीलवर्णी छाया, आकाश तक व्याप्त है!"

कभी राजस्थान व कच्छ के सूनसान रेगिस्तान लू के थपेडोँ से गर्मा जाते हैँ और गुलाबी, केसरिया साफा बाँधे नरवीर, ओढणी ओढे, लाजवँती ललना के साथ,गर्म रेत पर उघाडे पग , मस्ती से चल देता है !

कभी गोदावरी, कृश्णा, कावेरी मेँ स्नान करते ब्राह्मण , सरयू, नर्मदा या गँगा- यमुना मेँ गायत्री वँदना के पाठ सुनाई दे जाते हैँ - कालिँदी तट पर कान्हा की वेणु का नाद आज भी सुनाई पडता है - लहराते जल के साथ, न जाने कितनी प्रार्थनाएँ घुलमिल जातीँ हैँ --आसाम, मेघालय, मणिपुर , अरुणाँचल की दुर्गम पहाडीयोँ से लोक -नृत्योँ की लय ताल,वन्य जँतुओँ व वनस्पतियोँ के साथ ब्रह्मपुत्र के यशस्वी घोष को गुँजायमान कर देते हैँ !

सागर सँगम पर बँगाल की खाडी का खारा पानी, गँगामेँ मिलकर, मीठा हो जाता है -- दक्षिण भारत के दोनोँ किनारोँ पर नारिकेल के पेड , लहराते, हरे भरे खेतोँ को झाँककर हँसते हुए प्रतीत होते हैँ - भारत का मध्यदेश, उसका पठार, ह्र्दय की भाँति पल पल, धडकता है -- भारत के आकाश का वह भूरा रँग, शाम को जामुनी हो उठता है गुलाबी, लाल, फिर स्वर्ण मिश्रित केसर का रँग लिये, उषाकाश सँध्या के रँगोँ मेँ फिर नीलाभ हो जाता है -- हर रात्रि, काली , मखमली चादर ओढ लेती है जिसके सीनेमेँ असँख्य चमकते सितारे मुस्कुरा उठते हैँ कौन है वह चितेरा, जो मेरे प्यारे भारत को इतने , विविध रँगोँ मेँ भीगोता रहता है ?

मुझे प्यार है, भारत के इतिहास से! भारतीय सँस्कृति, सभ्यता तथा भारत की जीवनशैली, गौरवमयी है -

२१ वीँ सदी के प्रथम चरण के द्वार पर खडा भारत, आज विश्व का सिरमौर देश बनने की राह पर अग्रसर है - उसके पैरोँ मेँ आशा की नई पदचाप सुनाई दे रही है -- भारत के उज्ज्वल भविष्य के सपने, हर भारतीय की आँखोँ मेँ कैद हैँ ! हर भारतीय बालक की मुस्कान मेँ वे छिपे हुए हैँ -- भारत की हर समस्या, हर मुश्किल मेरा दिल दहला जातीँ हैँ --

भारत से दूर रहकर भी मुझे उसकी माटी का चाव है ! मेरा मन लोहा है और भारत, लौहचुम्बक ही रहा ! भारत की रमणीयता, एक स्वछ प्रकाश है और मेरा मन , एक बैचेन पतँगा है ! भारत मेरी यात्रा का, अँतिम पडाव है -- भारत भूमि के प्रति मेरी लालसा , मेरी हर आती जाती, साँसोँ से और ज्यादा भडक उठती है -

भारतभूमि पर ही, मेरा ईश्वर से साक्षात्कार हुआ -- ईश्वरदत्त, इन्द्रीयोँ से ही मैँने, "पँचमहाभूत" का परिचय पाया और अँत मेँ यह स्थूल शरीर सूक्ष्म मेँ विलीन हो जायेगा ! लय की गति, ताल मेँ मिल जायेगी रह जायेँगेँ बस सप्त स्वर!

भारतभूमि मेरी, माता है और मैँ एक बालक हूँ जो बिछूड गया है -- भारत, हरे बाँस की बाँसुरी है, और मेरे श्वास, उसमेँ समाकर, स्वर बनना चाहते हैँ ! मेरी आत्मा का निर्वाण, भारता ही तो है ! प्रेम व आदर से भरे मेरे यह शब्द, उसका बखान, उसकी प्रशस्ती,मेरे तुच्छ विचार ये सभी मिलकर भी अपने मेँ असमर्थ हैँ --

मैँ, बात सिर्फ इतनी ही कहना चाहती हूँ कि, मुझे, भारत क्योँ प्रिय है ?

कितना गर्व है, मुझे, भारत के महान व्यक्तियोँ पर !

अनँत दीपशिखा की तरह उनकी लौ, अबाध, अटूट है -- श्री राम, श्री कृष्ण, बुध्ध, महावीर, कबीर, मीराँ, नानक, तुलसीदास, चैतन्य,रामकृष्ण, विवेकानँद, और अन्य कईयोँ की ज्योति, आज भारत माता की महाज्वाला को, प्रकाशित किये हुए है --भारत के बहादुर, सूरमा , शूरवीर पुत्रोँ की यशोगाथाओँ से आज भी सीना गर्वसे तन जाता है ! चँद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, चाणक्य, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज, प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, सुभाषचँद्र बोज़, भगत सिँह की देशभक्ति आज भी गद्`गद्` किये देती है --

भविष्य के कई " महाप्राण "भारत क मँच पर, प्रकट होने के लिये तैयार खडे हैँ !

भारत, तपस्वीयोँ, शूरवीरोँ, योगियोँ की पुण्यशीला भूमि थी, है और रहेगी -- अमर आत्माएँ शृँखला मेँ बँधे हैँ और भविष्य भी बँधा है --

भारत के ऋषि मुनियोँ ने, "ॐ" शब्द की " महाध्वनि" प्रथम बार अनुभव सिध्ध की थी -- महाशिव ने, "प्रणव मँत्र " की दीक्षा दे कर, ऋक्`- साम्` - यजुर व अथर्व वेदोँ को , वसुँधरा पे अवतीर्ण किया था -- ब्रह्माँड, ईश्वर का सृजन है -- इस विशाल ब्रह्माँड मेँ, अनेकोँ नक्षत्र, सौर मँडल, आकाश गँगाएँ, निहारीकाएँ, व ग्रह मॅँडल हैँ - इन अगणित तारकोँ के मध्य मेँ पृ थ्वी पर, भारत ही तो मेरा उद्`भव स्थान है !

इस समय के पट पर " समय" आदि व अँतहीन है -- इस विशाल उथलपुथल के बीच, जो कि, एक महासागर है जिसका न ओर है न छोर, मैँ एक नन्ही बूँद हूँ !

इस बूँद को भारत के किनारे की प्यास है -- उसी की तलाश है -- मुझे, भारत हमेशा से प्रिय है और रहेगा ! समय के अँतिम छोर तक! भारत मुझे प्रिय रहेगा ! मेरी अँतिम श्वास तक, भारत मुझे प्रिय रहेगा, नित्` प्रिय रहेगा !

" नित प्रियम भारत भारतम ...

स्वागतम्, शुभ स्वागतम्, आनँद मँगल मँगलम्`,

नित प्रियम भारत भारतम , नित प्रियम्, भारत्, भारतम "

( ये गीत एशियाड खेल के समय, भारत गणराज्य की राजधानी दिल्ली मेँ बजाया गया था -- जिसे शब्द दीये-- मेरे स्वर्गीय पिता पँडित नरेन्द्र शर्माजी ने और स्वर बध्ध किया था पँडित रविशँकर जी ने - इसी गीत के अँग्रेजी अनुवाद को पढा था श्री अमिताभ बच्चन जी ने )


11 Comments:

Blogger aditi said...

A sensation of sort!
Immaculate explaination..of our gr8-2 motherland!!!wat left is not an issue here wat expressed is an experience...of lifetime.
yesterday i read somwhere that"money speaks but wealth wishpers" n today itself it found true place to b quoted!!!
Words r meaningless ,worthless...it's THE FEEL that give this expression a divinity...making me speechless!
i must say that this IS a kind of work which is to b seen n read by all...
aah!
sadar pranam!

1:19 AM  
Blogger Shrish said...

भारत के विषय में आपकी भावनाएं जानकर बहुत अच्छा लगा। कहा भी गया है कि जन्मभूमि स्वर्ग से बढ़कर होती है। यह लेख संग्रहणीय है, साधुवाद!

आप अनुस्वार (ं) के स्थान पर चंद्रबिंदु (ँ) का प्रयोग करती हैं उदाहरण के लिए मैँ की जगह मैं तथा यादोँ की जगह यादों होना चाहिए था।

इसका कारण इनके प्रयोग में भ्रम है या टाइपिंग टूल में अनुस्वार की कुँजी नहीं पता लग रही?

2:44 AM  
Blogger manya said...

क्या कहूं मैं मैडम.. पूरा गीत एक ही श्वास में पढ गयी और यही लग रहा था पढती रहूं खत्म ना हो.. यूं तो हमारी मातृभूमी का रूप इतना विशाल है की उसे शायद ही शब्दों में बांधा जा सके.. पर फ़िर भी कहूंगी की.. गीत के हर शब्द ने मेरे मानस -पटल पर मेरे भारत के सभी रूपों को सजीव कर दिया... जननी जन्म्भूमि के प्रति बहती वो स्नेह की अविरल धारा.. मैं क्या कहूं मेरे पास शब्द नहीं हैं .. अपनी भावनायें व्यक्त करने को... सच्मुच अद्भूत रचना..

सादर प्रणाम
मान्या

3:24 AM  
Blogger Harshad Jangla said...

Just wonderful!
No words to express!
Mera Bharat Mahan.
Thanks Lavanyaji.
Rgds.

7:27 AM  
Blogger Udan Tashtari said...

वाह वाह...बहुत खूब. तारीफ के शब्द नहीं..बस इतना ही कि जबरदस्त और अद्भूत!!

5:48 PM  
Blogger antarman said...

Aditi,
Thank you very much --
as you correctly observed, How can any one collect all thoughts or Ideas about all the salient features of our beloved India ?
I'm glad you found a spark of DIVINITY in the expressed words.
Jeete Raho, Khush raho !
Sa sneh,
L

1:34 PM  
Blogger antarman said...

Shirsh ji,
Dhanyawaad !

Re: my typos --
मुझे " हिन्दिनी " ही रास आ गया है --जिसमेँ अगर आप मेरी भूलोँ को सुध्हरने का उपाय बतला देँ तो आभारी रहूँगी ~~
-- लावण्या

1:38 PM  
Blogger antarman said...

प्रिय मन्या,
ये तुम्हारा स्नेह ही तो है जो मेरा लिखा इतना पसँद करती हो !
बहोत बहोत शुक्रिया -
स - स्नेह
-- लावण्या

1:40 PM  
Blogger antarman said...

Harshad bhai,
How true it is that in every Bhartiya, lives a BHARAT - forever !! Isn't it ?
Rgds,
L

1:41 PM  
Blogger antarman said...

बहोत बहोत आभार आपका समीर भाई -
स - स्नेह
-- लावण्या

1:41 PM  
Blogger Dr.Bhawna said...

This comment has been removed by the author.

1:30 AM  

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