Monday, January 08, 2007

बीती रात का सपना,--










बीती रात का सपना, छिपा ही रह जाये,
तो, वो, सपना, सपना नहीँ रहता !
पायलिया के घूँघरू, ना बाजेँ तो,
फिर,पायल पायल कहाँ रहती है?
बिन पँखोँ की उडान आखिरी हद तक,
साँस रोक कर देखे वो दिवा -स्वप्न भी,
पल भर मेँ लगाये पाँख पँखेरु से उड,
ना जाने कब, ओझल हो जाते हैँ !
मन का क्या है ? सारा आकाश कम है--
भावोँ का उठना, हर लहर लहर पर,
शशि की तम पर पडती, आभा है !
रुपहली रातोँ मेँ खिलतीँ कलियाँ जो,
भाव विभोर, स्निग्धता लिये उर मेँ,
कोमल किसलय के आलिँगन को,
रोक सहज निज प्रणयन उन्मन से
वीत राग उषा का लिये सजातीँ ,
पल पल मेँ, खिलतीँ उपवन मेँ !
मैँ, मन के नयनोँ से उन्हेँ देखती,
राग अहीरोँ के सुनती, मधुवन मेँ,
वन ज्योत्सना, मनोकामिनी बनी,
गहराते सँवेदन, उर, प्रतिक्षण मेँ !
सुर राग ताल लय के बँधन जो,
फैल रहे हैँ, चार याम,ज्योति कण से,
फिर उठा सुराही पात्र पिलाये हाला,
कोई आकर, सूने जीवन पथ मेँ !
यह अमृत धारा बहे, रसधार,यूँ ही,
कहती मैँ, यह जग जादू घर है !!
रात दिवा के द्युति मण्डल की,
यह अक्षुण्ण अमित सीमा रेखा है,
शुभम
लावण्या

4 Comments:

Blogger महावीर said...

बहुत सुन्दर रचना है - भावनाओं से ओत-प्रोत! इस स्तर की कविताएं बहुत कम
दिखाई देती हैं।

2:24 PM  
Blogger antarman said...

महावीरजी,
आपका स्नेहाशिष मिलता रहे इसी आशा सहित,
धन्यवाद
स - स्नेह, सादर,
लावण्या

8:51 AM  
Blogger Dr.Bhawna said...

बहुत सुन्दर रचना है।

9:32 AM  
Blogger antarman said...

डो. भावना जी,
आपकी प्रतिक्रियाओँ के लिये, धन्यवाद !
सादर, स~ स्नेह,

लावण्या

1:57 PM  

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