Saturday, December 23, 2006

वाल्मिकी ऋषि : छँदोबध्ध अनुष्टुप




वाल्मिकी ऋषि : छँदोबध्ध अनुष्टुप

Aadi Kavi - Valmiki Rishi -- Anushtup chanda -

क्रौँच - वध
एक दिन, वाल्मिकी ऋषि अपने शिष्य भारद्वाज के साथ, नदी स्नान के बाद, लौट रहे थे --
-अरण्य मार्ग मेँ, .क्रौँच पक्षीके युगल मेँ से एक पक्षी पर,
शर ~सँधान करते हुए, एक निषाद =व्याघ को, वाल्मिकी ने देखा .......
उनके मुख से यह छँदोबध्ध अनुष्टुप उद्गगार निकले ...
" मा निषाद प्रतिष्ठाँ त्वमगभ:शाश्वती: समा:यत्क्रौँमिथुनादेकमवधी:काममोहितम्`"
निषाद को श्राप देकर उन्हे दुख:भी हुआ
--यही , वाल्मिकी रामायण का आरँभ बना ....
- लावण्या

3 Comments:

Blogger Dr.Bhawna said...

क्रौंच पक्षी का ये वर्णन आँखों में आँसू दिला देता है।

9:25 AM  
Blogger antarman said...

डो. भावना जी,
तभी तो कविता व छँद शास्त्र अज्णात से परोक्ष हो सकी
स -स्नेह,
लावण्या

2:01 PM  
Blogger utkarsh said...

dear lavanya ji,
if we could be able to know more about this great saint and poet on to this page.
Er. S.K.Pandey
NEW DELHI

7:40 PM  

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