Saturday, December 16, 2006

पिछले पहर की रात !


पिछले पहर की रात!
हौले से,
तारोँ के जालोँ को तोड कर,
चाँद-- निकल आया !
हौले से,
हिरनी ने डोलकर,
हिरने को जगाया !
हौले से,
बैयाँ खोलकर,
साजन को दुलराया !
हौले से ,
पानी ने, फैल कर,
कँवल को थपकाया !
हौलेसे,
अँखिया खोल कर,
दीपक को सरकाया -
हौले से,
घूँघट खोलकर,
प्यारी को शरमाया !
-- लावण्या

2 Comments:

Blogger Dr.Bhawna said...

हौले से
दिल के कपाट खोलकर
अरमानों को जगाया

9:15 AM  
Blogger antarman said...

क्या बात है !
"जागे जागे अरमाँ हैँ सोये सोये हम!
ऐसे मौसम मेँ, न निकल जाये दम!"
;-))
स~ स्नेह,

लावण्या

2:10 PM  

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