Saturday, December 16, 2006

समय ! धीरे धीरे चल !


समय ! धीरे धीरे चल !

कितने हैँ बाकी काम अभी,
कुछ तुझको भी है ध्यान ?
सब तुझसे बँध कर चलते हैँ
उन्हेँ भी याद कर , नादान!
ओ समय ! धीरे धीरे चल !

जो बिछडे साथी हैँ उनका भी
कर लिहाज धर बाँह सभी,
भूखे, प्यासे मानव दल का,
बनना होगा विश्वास अभी -
ओ समय ! धीरे धीर चल!

ना व्यर्थ गँवाना अपने को,
शोर शराबे भरी गलियोँ मेँ,
जहाँ सिर्फ,खुमारी, रँग रेली हो,
क्या उनसे ही हो बात सभी ?
ओ समय ! धीरे धीर चल !

तेरे लिये, जलाये आशा दीप,
राह तकेँ राजा रँक, यही रीत!
तज पुरानी गाथाओँ के इतिहास,
रच आज कोई नव शौर्य गान!
ओ समय ! धीरे धीर चल!

इस पृथ्वी पट पर तू है,
भूत, भविष्य, का ज्ञाता,
सँवार रे, नये बरस को,
हो सुखमय, ये जग सारा!
ओ समय ! धीरे धीर चल !

-- लावण्या

2 Comments:

Blogger Dr.Bhawna said...

पर समय बडा बेरहम होता है खुशियों में तो दौड लगाता है पर दुख में मानो ठहर ही जाता है।

9:19 AM  
Blogger antarman said...

तभी हमेँ "स्थित -प्रज्ञता" का पाठ सिखला गये श्री कृष्ण
- भगवद्` गीता मेँ ~

स - स्नेह, लावण्या

10:46 AM  

Post a Comment

<< Home