Friday, April 13, 2007

नर्मदे हर ! नर्मेदे हर ! -- भाग - १


नर्मदा, नदी पवित्रता, उपयोगिता और भारतीय सँस्कारोँ की नदी है -
महायोगी श्री मोटाभाई जी जो बाल - ब्रह्माचारी थे, उन्होँने नर्मदा तट पर प्रखर साधना की थी --
पुराण कालसे नर्मदा का आँचल, तपस्वीयोँ की , योगियोँ की, तपोभूमि रही है -
मोटाभाई की पवित्र वाणी मेँ उनकी साधना से जुडे कुछ क्षणोँ के बारे मेँ सुनिये ~~
" नर्मदा का पवित्र जल बडा मीठा हुआ करता था उन दिनोँ ! परँतु, " मीठा" मैँ उस जल को महज भक्ति या आदर से ही नहीँ कह रहा हूँ - ऐसा था कि उस समय मेँ ,जब मैँने नर्मदा माई की गोद मेँ मेरी तपस्या शुरु की थी उस समय नदी के आसपास बडा घना जँगल हुआ करता था ! विशाल , हरेभरे घटादार वृक्ष जैसे जाम्बु और आँवला इत्यादि बडी सँख्या मेँ पाये जाते थे -
इन पर मधु मख्कीयोँ के बृहदाकार छत्त्ते टँगे रहते थे जिन से रीस रीस कर कई सारा मधु, नर्मदा के जल मेँ घुलमिल जाता था !
हम, मैँ और मुझ जैसे अन्य तपस्वी , सूर्य उपासना करने जल मेँ पैठते थे व जल को मुँह मेँ ले कर पीते थे वह जल बडा ही शीतल और मधुर हुआ करता था -- ताजे मधु के मिश्रण से मीठा जल हमेँ बडी तृप्ति देता था ! सँजीवनी की तरह जीवन दान देता हुआ, शरीर को नई उर्जा देता हुआ! "
श्री मोटाभाई ९० वर्ष तक जीवित रहे - मुझे सौभाग्यवश उनका सानिन्ध्य उनके जीवन के पिछले वर्षोँ मेँ मिला चूँकि वे बम्बई शहर के, पूर्व विले पार्ला उप नगर मेँ अपने फ्लेट मेँ रहे -
उन्हेँ नर्मदा नदी की याद, तब भी आती रही !
वह मीठा -मधुर शीतल जल उन्हेँ बारबार याद आता रहा -
बडे दु:खके साथ वे कहा करते थे कि,
" अगर पर्यावरण के दूषण स्वरुप वे पुराने पेडोँ को काट दिया गया हो तब तो वे मधु मख्कीयोँ के छत्ते भी गए तब मेरी नर्मदा माई का जल पहले जैसा मीठा कैसे रहा होगा ? "
पूज्य मोटाभाई का यह कथन, यह सत्य , जो स्वयम पर प्रमाणित हुआ था , हमेँ आस्चर्य मेँ डाल सकता है --
आधुनिक भारत मेँ कई बडे बदलाव आये हैँ हमारी मातृभूमि का स्वरुप काल के प्रवाह के साथ कई प्रकार से बदल चुका है -- उसी तरह, नदीयाँ और उनके बहाव व तटोँ मे अभूतपूर्व परिवर्तन हुए हैँ -
वर्तमान भारत मेँ, " नर्मदा बचाओ आँदोलन " ने फिर एकबार "नर्मदा" नदी पर लोगोँ का ध्यान केँद्रीत कर दिया है --
मध्य भारत की , गँगा, यमुना के बाद, नर्मदा, ही सबसे ज्यादह पूजनीय नदी है --
कहा जाता है कि, नर्मदा " कन्या - कुमारीका नदी " हैँ जबकि, गँगा मैया " सदा सुहागिन नदी " हैँ !
( लेखिका: लावण्या )

6 Comments:

Blogger aditi said...

wah!
ma'm aapne toh an jaaker lagta hai ki apne jyaan ka pitara khola hai..
sabse acchi baat ye hai ki saare lekh mazedaar hone ke saath-saath
kuch vishist arth rakhe te hain..

12:13 PM  
Blogger Harshad Jangla said...

Lavanyaji

Pretty good blog.
Rightly, we call our rivers 'Maiya'

Rgds.

6:10 PM  
Blogger antarman-- said...

Shukriya Aditi,
Kuch der se uttar de rahee hoon --
Kaise ho ? Asha hai thik thak ho -
Bhaiyya aa gaye to khushi badh gayee hogee hai na ?
Sa sneh,
L

8:56 AM  
Blogger antarman-- said...

Yes, Harshad bhai,
Rivers r truly "Mother " to every Great Living civilization & its waters nourish the Culture !
Rgds,
L

2:31 PM  
Blogger Abhijit Dharmadhikari said...

आपका चिठ्ठा पढकर बहुत शान्ती महसूस हुई।
जिंदगी में एक बार तो रेवामैय्या की परिकम्मा करनेकी ख्वाहिश हैं। आशा करता हूं की जल्द ही नर्मदामैया बुलावा भेजेगी।

प्रणाम।

12:16 AM  
Blogger vijay pandya said...

Jannkari Ke Liye Aabhar. Aapko koi Narmada Parikrama Ki Nayee Pustak Ki Jaankari Ho to mere EID : vijay_gpandya@yahoo.co.in per bhej Na. Narmade Har.

9:14 PM  

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