Saturday, April 14, 2007

नर्मदे हर ! नर्मेदे हर! -- भाग - २


इतिहास साक्षी रहा है नदीयोँ के आसपास के इलाकोँ का कि किस तरह प्राचीन सभ्यताओँ का , ग्राम्य व नगरोँ मेँ परिवर्तन होना नदी तट पर ही , सँभव हुआ है.जल की सुविधा, भूमि का बाहुल्य, नदीओँ के समीप, आबादी के बसने मेँ सहायक सिध्ध हुए. नदी की सँपदा से ही कायमी पडाव मनुष्य की सभ्यता के सोपान बने.युप्फेटीस, टाएग्रीस, नदीने मेसोपोटेमीया की सभ्यता रखी, याँग काई शेक व सीक्याँग नदीयोँ के तटोँ पर चीन की सभ्यता पनपी और भारत की सिँधु नदी ने सिँधु घाटी की सभ्यता की नीँव रखी थी - नाइल नदी ने उसी तरह, प्राचीन इजिप्त की सँस्कृति व सभ्यता के सुमन खिलाये थे -गँगा यमुना व इन नदीयोँ की सहभागी धाराओँ ने, उत्तर भारत को सदीयोँसे सीँचा है अपने जल से जीवित रखा हुआ है -- उत्तराखँडॅ आज भी आबाद है ये सारे उदाहरण ही हमसे नदीयोँ को " सँस्कृति और सभ्यता की जननी " की उपमा दीलवाते हैँ -- उन्हीँ के प्राणदायी जल से मनुष्य प्रगति की गाथा के आध्याय लिखे गये हैँ और आगे भी, लिखे जायेँगे -- नदी सभ्यता रुपी शिशु को गोद मेँ लिये दुलार करती हुई " माँ " स्वरुप हैँ --
जो बात हम अन्य वैश्विक स्तर की नदीयोँ के बारे मेँ कह रहे हैँ वही नर्मदा नदी पर भी लागू होती है - नर्मदा नदी के किनारोँ पर बसे लोगोँ के लिये वे " लोक -माता" हैँ इतना ही नहीँ वे " परा ~ शक्ति, जगदम्बा स्वरुपिणी" हैँ जो कि " विश्वमाता स्वरुपा" भी हैँ -- इस वर्तमान समय मेँ, कच्छ, समूचा गुजरात नर्मदा की पावन जल धारा का अमृतदायी जल अपनी भूमि की प्यास बुझाने हेतु चाहता है नर्मदा के आशीर्वाद के बिना इन प्राँतोँ का उत्कर्ष और खुशहाली असँभव जान पडते हैँ --
क्र्मश: --
: लावण्या

3 Comments:

Blogger Udan Tashtari said...

हम भी नर्मदा जी की छ्त्र छाया में पले हैं. बहुत बढ़िया.

4:58 AM  
Blogger antarman-- said...

समीर भाई सच ?
किस प्राँत मेँ आपने नर्मदामाई का सानिन्ध्य पाया था ?
बतलाइयेगा
स - स्नेह,
लावण्या

5:15 AM  
Blogger haridas said...

Respected madam,

Aapke dwaraa likhee gayee kavitaaye padhi.

Bhaarat varsh ke log apne ateet ko bhool gaye hai.

Aaj kal ke logon ko apne poorvajon ki koi parvaah nahin hai.

Ve sonchte hai ki pashchim ka kanakal karna hi theek hai.
maine aapki kuch kritiya padhi aour padhna chata hun


HARIDAS

11:20 PM  

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