Tuesday, February 20, 2007


प्रलय
देख रही मैँ, उमड रहा है, झँझावात प्रलय का !

निज सीमित व्यक्तित्त्व के पार,उमड घुमड, गर्जन तर्जन!

हैँ वलयोँ के द्वार खुले,लहराते नीले जल पर !

सागर के वक्षसे उठता, महाकाल का घर्घर स्वर,

सृष्टि के प्रथम सृजन सा, तिमिराच्छादीत महालोक

बूँद बनी है लहर यहाँ, लहरोँ से उठता पारावार,

ज्योति पूँज सूर्य उद्`भासित, बादलके पट से झुककर

चेतना बनी है नैया, हो लहरोँके वश, बहती जाती ~

क्षितिज सीमा जो उजागर, काली एक लकीर महीन!

वही बनेगी धरा, हरी, वहीँ रहेगी
, वसुधा, अपरिमित!

गा रही हूँ गीत आज मैँ, प्रलय ~ प्रवाह निनादित~

बजते पल्लव से महाघोष, स्वर, प्रकृति, फिर फिर दुहराती!

~~ लावण्या

9 Comments:

Blogger mahashakti said...

अच्‍छी कविता, शब्‍दो का सुन्‍दर प्रयोग

4:35 AM  
Blogger priyankar said...

आपकी कविता पढ कर छायावादी युग के दिग्गज याद हो आए . वैसी ही शब्दावली और वैसी ही भंगिमा .

5:51 AM  
Blogger manya said...

बहुत प्र्भावित हूं आपकी रचना पढ्कर.. प्रवाह में बहती गई,..

8:43 AM  
Blogger Harshad Jangla said...

Sundar Rachna Hai. Bahut Abhinandan.
I wish I could write in Hindi !!!

1:10 PM  
Blogger antarman said...

प्रमेन्द्र जी,
उर्फ "महाशक्ति" - नाम बडा शक्तिशाली है आपके ब्लोग का!
धन्यवाद! कविता की सराहना के लिये -
स स्नेह,
लावण्या

1:55 PM  
Blogger antarman said...

प्रियँकर जी,
आपको भी मेरे बहोत धन्यवाद! कविता की सराहना के लिये -
मेरे स्व. पिता पँडित नरेन्द्र शर्मा जी छायावादी शैली के सफल कवि रहे हैँ -
सो, आपकी प्रतिक्रिया से हर्ष हुआ मुझे !
स स्नेह,
लावण्या

1:58 PM  
Blogger antarman said...

हैलो, मन्याजी,
आपको कविता पसँद आई - धन्यवाद!
आपका ब्लोग भी देखा श्री कृष्णजी पर लिखी कविता व कन्या भृण पर लिखी विशेष पसँद आईँ हैँ
लिखती रहिये ..
स्स स्नेह,
लावण्या

2:00 PM  
Blogger antarman said...

Harshad bhai,
aapko kavita achee lagee - mujhe bhee khushee huee.
aapki comments ka shukriya !
Rgds,
L

2:01 PM  
Blogger Divine India said...

Hello Madam,
उमंड़ते हुऐ दृष्याव्लोकन की प्रलय धारणा
अत्यंत विशिष्ट अर्थ को संकेत करती है…
बहुत अच्छा…सार्थक चित्रण!!

12:01 PM  

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