Thursday, February 22, 2007

" न हम होँगेँ न तुम होगे "





" न हम होँगेँ न तुम होगे "

ROME (AFP) - A pair of 6,000-year-old skeletons found by Italian archaeologists in a dying embrace will not be separated, team leader Elena Menotti has told AFP.
"We will do everything possible to preserve the bodies in the exact position of their grave,"
"There's no question of breaking their embrace."
The skeletons were found last week during digging in an industrial zone near the northern city of Mantua and the find will be displayed at the city's archaeological museum.
While scientists are still puzzling over how the pair died and why they were buried in this way, Menotti said their embrace was "testimony to a great feeling of love that has transcended time.
"For regardless of why they were buried in each other's arms, there had to have been feelings between them."

यह एक समाचार ने 'मुहब्बत " लफ्ज़ पर फिर एक बार सारा ध्यान केँद्रीत कर दीया !--

क्या कुछ नहीँ लिखा या कहा गया है इस एक शब्द पर !
अरे ..ढाई आखर है ना "प्रेम " का !
"प्यार" का भी एक से ज्यादा ही पडता है गिनती मेँ हिसाब
-पर " इश्क " किसी हिसाब से बँधा है कहीँ ?
..ये सुना होगा , कि,
" हीज़ाबे मुहोब्बत, हम उसको थे कहते, ना वो बोलते थे , न हम बोलते थे "
या फिर ये कि,
" मोहोब्बत की किस्मत बनाने से पहले, ज़माने के मालिक, तू रोया तो होगा "

उफ्फ
~

क्या और कहेँ ????

कल एक बेशकिमती तोहफा डाक से आया !

श्रीमान राधेक़ाँत दवे जी ने व श्रीमती कुसुम दवे जी ने एक सँगीत ओडीयो टेप भेजी -

नाम था " हुस्न -ए - जाँ : ~~सँगीत निर्देशक हैँ मुज़फ्फर अली -
गीतोँ को गा रहीँ थीँ छाया गाँगुली -
१) " यारो मुझे मुआफ रखो" ( मीर )
२) खूनेज करिश्मा नाज़ सितम ( नज़ीर अकबराबादी )
३) जब फागुन रँग ( नज़ीर)
४) पिया ब्याज प्याला ( कुतुब शाह) *( छाया व इकबाल सिद्दीकी )
५) निठुरे निठुरे..अँगना बुहारुँ पहन के कँगना * (ज़रीना बेगम )और अँत का गीत था ~
६) न तुम होँगेँ न हम होँगेँ .." ( नज़ीर) * ( रोली सरन और नवेद सिद्दीकी )


अँतिम गीत, बडी, सहजता से आरँभ हुआ ~
~शब्द / अलफाज़् यूँ घुल रहे थे मानोँ, ज़िन्दगी की हुबहु तस्वीर उभर रही हो !
~माशूका कह रही थी कि, ' आज हँस कर बोसा ले लो, प्यार से गले मिलो, चुहल करने के लिये, लतीफे सुनने सुनाने के लिये, आज का वक्त है, तो,
...मुहब्बत से पेश आओ हम से आकर मिलो, फिर न जाने, क्या हो ?

- न तुम होँगे न हम होँगेँ . ---

गीत कुछ इस तरह से दीलोदीमाग मेँ बसने लगा कि पता भी न चला कब आँखेँ नम हुईँ , न जाने कब दबी सिसकीयाँ रह रह कर, मन मसोस कर, गहरे, कहीँ धधकते ज्वालामुखी की तरह, रुह को झकझोर कर सँगीत के साथ साथ, एकाकार हो गईँ !

ये नज़ीर का कलाम था कि, सब कुछ ले डूबा !

मेरे जीवन के दाम्पत्य के क्षण, ३३ सालोँ का लँबा सफर, उससे पहले, १६ /१७ साल की आयु मेँ , अपने जीवन साथी से , पहली बार मिलना, उससे पहले, एक ही गुजराती स्कूल मेँ कक्षा १ से , उन्हेँ देखना, साथ साथ, बडे होना, बचपन की देहलीज को पार कर, वयस्क होना, फिर, परिवार के सभी से जान पहचान , एक दूसरे के घर पर , भोजन करना, गप्पे लडाना, शादी ब्याह, २ सँतानोँ के अभिभावक बनना ~

पुत्री सौ. सिँदुर का ब्याह, फिर कु. सोपान की मँगेतर कु. मोनिका से मिलना और अगले माह उनकी शादी है ~
~ ज़िँदगी, पलक झपकाती, किसी, तिलस्मी दुनिया से उतरी 'नाज़्नीन परी सी , मुस्कुराती, शरारत से, आँखेँ मुँद कर, हल्के से,माथा चूमकर, कह रही है,

" बता मैँ कौन हूँ ?" --

इतना ही दील से निकला,


" तू मेरी सहेली है....रुह की परछाईँ है " ---

--- लावण्या

2 Comments:

Blogger Divine India said...

यह वर्णन निश्चय ही हृदय के कई पोरों को
स्पर्श कर गया…अनोखे ढ़ंग से जीवन की
गीता को जिसप्रकार दृश्य किया अति सराहनीय!!

12:12 PM  
Blogger antarman said...

दीव्याभ जी,
आपकी टिप्पणी के लिये बहोत बहोत शुक्रिया,

स्नेह्,

लावण्या

9:36 AM  

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