Friday, February 02, 2007

कुब्जा - ७ - भाग - पारस -स्पर्श

कुब्जा :

श्री कृष्ण गोविँद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेवा

जिह्वै पिबस्वामृत मित दैव, गोविन्द दामोदर माधवेति


दोहा: मिटहईँ पाप प्रपँच सब, अखिल अमँगल भार

लोक सुजस, परलोक सुख, सुमिरत नाम तुम्हार !

अक्रूर के सँग बलभद्र व श्री कृष्ण मथुरापुरी आ पहुँचे -- दोनोँ ने शहर देखने का निर्णय किया और घूमने निकल पडे -


जहाँ कहीँ से भी दोनोँ भाई निकलते, प्रजा उन्हे देखती रह जाती -- बलराम गोरे तो कृष्ण श्याम वर्ण के !


मथुरा के हाट बाजार मेँ से गुजरे तो लोग श्री कृष्ण का मनोहारी रुप देखकर मँत्रमुग्ध हो गये !


टहलते हुए, अब दोनोँ मथुरा के राजा कँस के महल के निकट आये - देखा तो मार्ग मेँ एक स्त्री जिसे पीठ मेँ कुबड था वह एक स्वर्ण पात्र मेँ अँगराग लिये , हाथोँ से सम्हाले, बडी परेशानी से चलती हुई , जा रही थी -- वह ३ जगहोँ से टेठी थी - उसका नाम था कुब्जा !


वह रुक गई और एक राहगीर से पूछने लगी, " अरे! यह मनोरम रुपधारी लडके कौन हैँ ? इस साँवरे की छटा देखकर तो मैँ अपना भान भूल गई ! "


कृष्ण जो ये सुनकर मुस्कुरा रहे थे, आगे आये और कहा, " " आर्या ! प्रणाम ! कहाँ जा रही हो ? "


कुब्जा: " जा तो रही थी, कँस के अँत:पुर मेँ , यह सुँगधी अँगराग लिये ! परँतु हे नाथ ! अब न जाने क्यूँ मन कर रहा है कि, थोडा तुम्हारे सलोने चेहरे पे मल दूँ !"


कृष्ण: ( ठ्ठाकर हँसते हुए ) " तो लगाओगी मुझे अँगराग ? "


- इतना कहते, कृष्ण समीप आये और कुब्जा की ठोडी को एक ऊँगली से छू लिया


- हमेशा नीचे रहनेवाला कुब्जा का मुख, श्री कृष्ण की एक ऊँगली से उपर उठ गया !


अब कृष्ण फिर हँसे ! और बोले," तुम तो बडी सुँदर हो !


" कुब्जा सकपकाई - झेँपी और कहा, " कौन मैँ ? सुँदर ? न न .."


तभी, श्री कृष्ण के स्पर्श मात्र से, कुब्जा की बरसोँ की कुबड दूर हो गई -


- पलकेँ झपकीँ और सब स्तँभित रह गए !


ये क्या हुआ ? उनके देखते देखते, कुब्जा सर्वाँग सुँदरी ( सारे अँगोँ से सुँदर ) भुवन मोहिनी स्त्री बन गई !


कुब्जा प्रभु के चरणोँ पर गिर पडी


-- बोली, " नाथ ! प्रभु ! मेरे प्रणाम स्वीकार कीजिये ! आप दीनबँधु हो ! अँतर्यामी हो !


"जिस दिन देखी प्रभु सुँदरता तेरी, बाढी अँग अँग , सुँदरता मेरी "


...कुब्जा हर्षातिरेक मेँ दौडी -चिल्लाती हुई, " नगरवासीयोँ देखो ! मैँ अब सुँदर हूँ ! कुब्जा आज से त्रिवक्रा नहीँ रही - मैँ सुँदरी हूँ -- मैँ सुँदरी हूँ "


वह खूब खुश होकर नाचने लगी -- श्री कृष्ण उसका हर्ष देखकर हँसे


-- श्री कृष्ण: " प्रकृति का हर जीव, हर प्राणी सुँदर है ! मुझे सभी प्रिय हैँ मेरे पास आओ - सुँदरता ही सुँदरता है "



प्रभु के मधुर -स्पर्श से कुब्जा रुपवती हुई पारस ने लौह को स्वर्ण बनाया !


" सब जानत प्रभु, प्रभुता सोई, तदपि कहे बिनु रहा न कोई "




1 Comments:

Blogger antarman said...

Namaste,

I saw your blog..It is so rich...culturally and lietrary. Sub kuchh hai wahan, bhakti, kaavya, painting, yaaden...
I was not able to sign in so I am sending my comments in e-mail. You may please post my comments on my behalf. Also, my best wishes for your travel and kavi-sammelan next week. Please convey my regards to all there.
Harsha is sending her regards to both of you.
Regards,
Amarendra

6:41 AM  

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