Saturday, March 31, 2007

नित प्रियम भारत भारतम्






नित प्रियम भारत भारतम्

मुझे, भारत बडा ही प्रिय है इस तथ्य का कारण बडा सीधा है,

चूँकि, भारत , भारत है, और मैँ -मैँ हूँ !

भारत वह भूमि है, जहाँ पर मैँने जन्म लिया. वहीँ पर मैँ पल कर बडी हुई - मेरी आत्मा, मेरा शरीर, मेरा लहू, मेरी हड्डियोँ का ये ढाँचा और मेरा मन, भारत के आकाश तले ही पनपे - भारत, मेरे पूर्वजोँ की पुण्यभूमि रही है - भारत मेँ ही मेरे पित्री जन्मे और चल बसे !भारत ही वह भूमि है, जहाँ मेरे पिता व माता जन्मे और पल कर बडे हुए -श्री राम ने जब स्वर्णसे दमकती हुई लँकानगरी देखी थी तब उन्हेँ अपनी जन्मभूमि " अयोध्या" याद आ गई थी - तब अपने अनुज लक्ष्मण से कहाथा, " हे लक्ष्मण ! न मे रोचते स्वर्णमयी लँका ! जननी ! जन्मभूमिस्च` , स्वर्गादपि गरीयसी !"

भारत ने मुझे यादोँके भरपूर खजाने दीये हैँ ! मुझे याद आती है, उसकी शस्य श्यामला भूमि, जहाँ घने, लहलहाते वृक्ष, जैसे कि, विशाल वटवृक्ष,चमकीला कदलीवृक्ष, आमोँके मधुर भारसे दबा, आम्रवृक्ष, आकाशको प्रणाम करता देवदारु, शर्मीला नीम का पेड, अमलतास, कनेर, नारिकेल, पलाश तथा और भी न जाने कितने और जो आज भी हर भारतीय को पुकारते हैँ --

कभी याद आती है, मनोरम फूलोँकी ! वे सुँदर फूल, जैसे, कदम्ब, पारिजात, कमल, गुलाब, जूही, जाई, चमेली, चम्पा, बकुल और भीनी भीनी, रात की रानी ! और भी कितनी तरह के फूल अपने चित्ताकर्षक छटासे , अपनी भोली मुस्कान से, व मदमस्त सुगँधसे हर भारतीय की आत्मा को तृप्त कर रहे हैँ -

मुझे याद हैँ वे रसभरे, मीठे फल जो अपने स्वाद व सुगँध मेँ सर्वथा अजोड हैँ ! सीताफल, चीकू, अनार, सेब, आम, अनानास, सँतरा, अँगूर, अमरुद,पपीता, खर्बूजा,जामुन,बेल,नासपाती- और भी कई जो मुँहमेँ रखते ही, मनको तृप्ति और जठराग्नि को शाँत कर देते हैँ -

मुझे याद आती है वह भारतीय रसोईघरॉ से उठती मसालोँ की सुगँध ! कहीँ माँ, या कहीँ भाभी, तो कहीँ बहन या प्रेयसी के आटे सने हाथोँ पर खनकती वह चूडियोँ की आवाज! साथ , हवा मेँ तैरती, जीरे, कालिमीर्च, लौँग, दालचीनी, इलायची, लाल व हरी मिर्च, अदरख, हीँग, धनिये, सौँफ, जायफल, जावन्त्री वगैरह से उठती उम्दा गँध! तरकारी व दाल के साथ, फैलकर,स्वागत करती, आरोग्यप्रद, सुगँधेँ जिसे हर भारतीय बालकने जन्म के तुरँत बाद, पहचाननी शुरु कर दी थी !

भारत की याद आती है तब और क्या क्या याद आता है बतलाऊँ ?

हाँ, काश्मीर की फलो और फूलोँसे लदी वादीयाँ और झेलम नदी का शाँत बहता जल जिसे शिकारे पर सवार नाविक अपने चप्पू से काटता हुआ, सपनोँ पे तैरता सा गुजर जाता है ! कभी यादोँ मेँ पीली सरसोँ से सजे पँजाब के खेत हवामेँ उछलकर मौजोँ की तरँगोँ से हिल हिल जाते हैँ - उत्तराखँड के पहाडी मँदिरोँ मेँ , कोई सुहागिन प्राचीन मँत्रोँ के उच्चार के साथ शाम का दीया जलाती दीख जाती है -- तो गँगा आरती के समय, साँध्य गगन की नीलिमा दीप्तीमान होकर, बाबा विश्वनाथ के मँदिर मेँ बजते घँटनाद के साथ होड लेने लगती है -- मानोँ कह रही है,

" हे नीलकँठ महादेव! आपकी ग्रीवा की नीलवर्णी छाया, आकाश तक व्याप्त है!"

कभी राजस्थान व कच्छ के सूनसान रेगिस्तान लू के थपेडोँ से गर्मा जाते हैँ और गुलाबी, केसरिया साफा बाँधे नरवीर, ओढणी ओढे, लाजवँती ललना के साथ,गर्म रेत पर उघाडे पग , मस्ती से चल देता है !

कभी गोदावरी, कृश्णा, कावेरी मेँ स्नान करते ब्राह्मण , सरयू, नर्मदा या गँगा- यमुना मेँ गायत्री वँदना के पाठ सुनाई दे जाते हैँ - कालिँदी तट पर कान्हा की वेणु का नाद आज भी सुनाई पडता है - लहराते जल के साथ, न जाने कितनी प्रार्थनाएँ घुलमिल जातीँ हैँ --आसाम, मेघालय, मणिपुर , अरुणाँचल की दुर्गम पहाडीयोँ से लोक -नृत्योँ की लय ताल,वन्य जँतुओँ व वनस्पतियोँ के साथ ब्रह्मपुत्र के यशस्वी घोष को गुँजायमान कर देते हैँ !

सागर सँगम पर बँगाल की खाडी का खारा पानी, गँगामेँ मिलकर, मीठा हो जाता है -- दक्षिण भारत के दोनोँ किनारोँ पर नारिकेल के पेड , लहराते, हरे भरे खेतोँ को झाँककर हँसते हुए प्रतीत होते हैँ - भारत का मध्यदेश, उसका पठार, ह्र्दय की भाँति पल पल, धडकता है -- भारत के आकाश का वह भूरा रँग, शाम को जामुनी हो उठता है गुलाबी, लाल, फिर स्वर्ण मिश्रित केसर का रँग लिये, उषाकाश सँध्या के रँगोँ मेँ फिर नीलाभ हो जाता है -- हर रात्रि, काली , मखमली चादर ओढ लेती है जिसके सीनेमेँ असँख्य चमकते सितारे मुस्कुरा उठते हैँ कौन है वह चितेरा, जो मेरे प्यारे भारत को इतने , विविध रँगोँ मेँ भीगोता रहता है ?

मुझे प्यार है, भारत के इतिहास से! भारतीय सँस्कृति, सभ्यता तथा भारत की जीवनशैली, गौरवमयी है -

२१ वीँ सदी के प्रथम चरण के द्वार पर खडा भारत, आज विश्व का सिरमौर देश बनने की राह पर अग्रसर है - उसके पैरोँ मेँ आशा की नई पदचाप सुनाई दे रही है -- भारत के उज्ज्वल भविष्य के सपने, हर भारतीय की आँखोँ मेँ कैद हैँ ! हर भारतीय बालक की मुस्कान मेँ वे छिपे हुए हैँ -- भारत की हर समस्या, हर मुश्किल मेरा दिल दहला जातीँ हैँ --

भारत से दूर रहकर भी मुझे उसकी माटी का चाव है ! मेरा मन लोहा है और भारत, लौहचुम्बक ही रहा ! भारत की रमणीयता, एक स्वछ प्रकाश है और मेरा मन , एक बैचेन पतँगा है ! भारत मेरी यात्रा का, अँतिम पडाव है -- भारत भूमि के प्रति मेरी लालसा , मेरी हर आती जाती, साँसोँ से और ज्यादा भडक उठती है -

भारतभूमि पर ही, मेरा ईश्वर से साक्षात्कार हुआ -- ईश्वरदत्त, इन्द्रीयोँ से ही मैँने, "पँचमहाभूत" का परिचय पाया और अँत मेँ यह स्थूल शरीर सूक्ष्म मेँ विलीन हो जायेगा ! लय की गति, ताल मेँ मिल जायेगी रह जायेँगेँ बस सप्त स्वर!

भारतभूमि मेरी, माता है और मैँ एक बालक हूँ जो बिछूड गया है -- भारत, हरे बाँस की बाँसुरी है, और मेरे श्वास, उसमेँ समाकर, स्वर बनना चाहते हैँ ! मेरी आत्मा का निर्वाण, भारता ही तो है ! प्रेम व आदर से भरे मेरे यह शब्द, उसका बखान, उसकी प्रशस्ती,मेरे तुच्छ विचार ये सभी मिलकर भी अपने मेँ असमर्थ हैँ --

मैँ, बात सिर्फ इतनी ही कहना चाहती हूँ कि, मुझे, भारत क्योँ प्रिय है ?

कितना गर्व है, मुझे, भारत के महान व्यक्तियोँ पर !

अनँत दीपशिखा की तरह उनकी लौ, अबाध, अटूट है -- श्री राम, श्री कृष्ण, बुध्ध, महावीर, कबीर, मीराँ, नानक, तुलसीदास, चैतन्य,रामकृष्ण, विवेकानँद, और अन्य कईयोँ की ज्योति, आज भारत माता की महाज्वाला को, प्रकाशित किये हुए है --भारत के बहादुर, सूरमा , शूरवीर पुत्रोँ की यशोगाथाओँ से आज भी सीना गर्वसे तन जाता है ! चँद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, चाणक्य, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज, प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, सुभाषचँद्र बोज़, भगत सिँह की देशभक्ति आज भी गद्`गद्` किये देती है --

भविष्य के कई " महाप्राण "भारत क मँच पर, प्रकट होने के लिये तैयार खडे हैँ !

भारत, तपस्वीयोँ, शूरवीरोँ, योगियोँ की पुण्यशीला भूमि थी, है और रहेगी -- अमर आत्माएँ शृँखला मेँ बँधे हैँ और भविष्य भी बँधा है --

भारत के ऋषि मुनियोँ ने, "ॐ" शब्द की " महाध्वनि" प्रथम बार अनुभव सिध्ध की थी -- महाशिव ने, "प्रणव मँत्र " की दीक्षा दे कर, ऋक्`- साम्` - यजुर व अथर्व वेदोँ को , वसुँधरा पे अवतीर्ण किया था -- ब्रह्माँड, ईश्वर का सृजन है -- इस विशाल ब्रह्माँड मेँ, अनेकोँ नक्षत्र, सौर मँडल, आकाश गँगाएँ, निहारीकाएँ, व ग्रह मॅँडल हैँ - इन अगणित तारकोँ के मध्य मेँ पृ थ्वी पर, भारत ही तो मेरा उद्`भव स्थान है !

इस समय के पट पर " समय" आदि व अँतहीन है -- इस विशाल उथलपुथल के बीच, जो कि, एक महासागर है जिसका न ओर है न छोर, मैँ एक नन्ही बूँद हूँ !

इस बूँद को भारत के किनारे की प्यास है -- उसी की तलाश है -- मुझे, भारत हमेशा से प्रिय है और रहेगा ! समय के अँतिम छोर तक! भारत मुझे प्रिय रहेगा ! मेरी अँतिम श्वास तक, भारत मुझे प्रिय रहेगा, नित्` प्रिय रहेगा !

" नित प्रियम भारत भारतम ...

स्वागतम्, शुभ स्वागतम्, आनँद मँगल मँगलम्`,

नित प्रियम भारत भारतम , नित प्रियम्, भारत्, भारतम "

( ये गीत एशियाड खेल के समय, भारत गणराज्य की राजधानी दिल्ली मेँ बजाया गया था -- जिसे शब्द दीये-- मेरे स्वर्गीय पिता पँडित नरेन्द्र शर्माजी ने और स्वर बध्ध किया था पँडित रविशँकर जी ने - इसी गीत के अँग्रेजी अनुवाद को पढा था श्री अमिताभ बच्चन जी ने )


Thursday, March 29, 2007

मेरे हस्ताक्षर



सूरज दादा

सूरज दादा हँसकर उग आये पूर्व दिशा मेँ
काली रात के पर्दे को चीरकर, उगा प्रकाश,
सारे जानवर, खुश हैँ, जाग कर,अब,
फिर नये दिन का उगा है ये प्रात
आज,उमँगोँ की पतँग डोर के सहारे उड चली,
नीले आसमान के पार, हिलती डुलती,
थामे हैँ हाथोँ मेँ "जिम्मी जी", पीली डोर !
"टाइगर" छतरी ताने सुस्ताये,
ऊँघेँजागेँ,"टोमसन" घूरे नीली गेँद को बारबार,
और मछलियाँ जल से झाँक मुस्कायेँ!
छिप गई "मिन्नी" ऊँचे पेड जा दुबकी,
पहरे पे " टोमी जी" बैठकर, गुर्रायेँ !
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ये कविता चित्र को देखकर लिखी गई है
आशा है, पसँद आयेगी
~~~ लावण्या

चाँद उग आया पूनम का + " क्षितिज पत्रिका"

सौ. हर्षा व अम्ररेन्द्रजी - ग्रेन्ड केनीयन के आगे खडे हुए हैँ


चाँद उग आया पूनम का ...

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चाँद उग आया पूनम का ...

नीले स्याह आकाश मेँ,

क्षितिज रेखा से उतर,

उज्ज्वलतम, चँद्र शरद का,

ठिठुरती, काली रात मेँ,

चाँद उग आया पूनम का ...
सूखी टहनियोँ ने भी

अपनी बाँहेँ उचकाकर,

सहलाया, दुलराया, पास बुलाया,

जाडे की सिहरन मेँ, हिल हिलकर,

जर्जर आँचल मेँ, उसे छिपाया !

चाँद उग आया पूनम का ...



" क्षितिज पत्रिका" , वेब पर भी उपलब्ध है जिसे बडे जतन से

मेरे युवा मित्र , भाई श्री अमरेन्द्र जी कडी कठिनायोँ के बावजूद,

नियमित रुपसे प्रकाशित करते हैँ -

हिन्दी सेवा का ये सफल प्रयास उत्तर अमरीका मेँ ,

कार्यरत रहते हुए,

बिना किसीके सहयोग के भी

अमरेन्द्र जी ने कर दीखलाया है.

उनकी पत्नी सौ . हर्षा ने भी ये जिम्मेवारी को सुँदर चित्रोँ से सजाकर

एक आदर्श दम्पत्ति का उदाहरण पेश किया है.

मेरी यह कृति "मैँ ," क्षितिज " पत्रिका व उसीके वेब सँस्करण के लिय्रे,

शुभेच्छाओँ के साथ, समर्पित करती हूँ -

- साथ ही,

"नव - दम्पत्ति जहाँ भी रहेँ, सुख से रहेँ "

ये भी कामना करती हूँ -

- अस्तु,

प्रस्तुत है क्षितिज के लिये लिखी मेरी निम्न कविता : ~~

Wednesday, March 28, 2007

दिवा -स्वप्न


दिवा -स्वप्न

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बचपन कोमल फूलोँ जैसा,

परीयोँ के सँग जैसे हो सैर,

नर्म धूप से बाग बगीचे खिलेँ

क्यारीयोँ मेँ लता पुष्पोँ की बेल

मधुमय हो सपनोँ से जगना,

नीड भरे पँछीयोँ के कलरव से

जल क्रीडा करते खगवृँद उडेँ

कँवल पुष्पोँ,पे मकरँद के ढेर!

जीवन हो मधुबन, कुँजन हो,

गुल्म लता, फल से बोझल होँ

आम्रमँजरी पे शुक पीक उडे,

घर बाहर सब, आनँद कानन हो!

कितना सुखमय लगता जीवन,

अगर स्वप्न सत्य मेँ परिणत हो!

--- लावण्या

Monday, March 26, 2007

मानवता

" मानवता " किन,किन रुपोँ मेँ दीख जाती है ?
सोचो सोचो, अरे साथीयोँ गौर करो इन बातोँ पे
कहीँ मुखर हँसी मेँ खिलती वो, खिली धूप सी,
और कहीँ आशा- विश्वास की परँपरा है दर्शाती,
कहीँ प्राणी पे घने प्रेम को भी बतलाती
-वात्सल्य, करुणा,खुशी,हँसी,मस्ती के तराने,
आँसू,या विषाद की छाया बन कर भी दीख जाती
यही मानव मन से उपजे भाव अनेक अनमोल,
मानवता के पाठ पढाते युगोँ से, अमृत घोल !
-- लावण्या -

Friday, March 23, 2007

आमँत्रण



समय की धारा मेँ बहते बहते,
हम आज यहाँ तक आये हैँ
-बीती सदीयोँ के आँचल से,
कुछ आशा के, फूल चुरा कर लाये हैँ !
हो मँगलमय प्रभात, पृथ्वी पर,
मिटे कलह का कटु उन्माद !
वसुँधरा हो हरी -भरी फिर,
चमके खुशहाली का प्रात: !!
-- लावण्या

उर्जा



उर्जा :
उर्जा का दुरउपयोग अणु विस्फोट मेँ देखा गया.
जब प्रकाश नियँत्रित साधनोँ मेँ दीखलाई पडे जैसे कि दीये मेँ
तब यही उर्जा व प्रकाश सुख समृध्धि और खुशहाली के सँदेश लाता है.
अर्जुन ने ईश्वर का विश्वरुप दर्शन, कुरुक्षेत्र के युध्ध मैदान मेँ किया -
जो ऐसे असम्ख्य अणु विस्फोटोँ से भी ज्यादा कई गुणा प्रखर था ऐसी मान्यता है.

एक धमाका ! भूकम्पोँ से भी ज्यादा

-आकाश पर उठता जहरीला गुबार-

मौत से साक्षात्कार, मशरुम आकार !

हिरोशीमा शहर की हस्ती नहीँ रही!

-मौत की भेँट, हरेक रुह हो गई

-हील गई नीँव, मानव सभ्यता की -

और फिर,

देर तक छाई रही...खामोशी !!



Wednesday, March 21, 2007

..७० फीट समुद्र के गर्भ मेँ..: Oceans






धरर्ती का अधिकाँश हिस्सा समुद्र, सागर, सँमँदर से पटा हुआ है. असँख्य जीव जँतु विशालकाय मत्स्य,जीँघे, शँख, सीपीयाँ और भी न जाने क्या क्या समुद्र के पानी की तहोँ मेँ छिपे रहते हैँ !
कितनी खुशी की बात है जब, आज के युग मेँ, पानी मेँ गहरे तक उतर कर, प्रवाल के फूलोँ के बाग दीख जाते हैँ और तेज यँत्र चालित नौका मेँ बैठ कर, खारे पानी की तेज बौछार से भीगते हुए,
हवा और पानी पर साथ साथ, उडने का एहसास भी होता है तब बिलकुल नया रोमाँच महसूस किया जा सकता है .
मुझे खुशी है कि, बिटिया सिँदुर ने 'डीप डाइवीँग" = मतलब " समुद्र की गोताखोरी " का बाकायदा प्रशिक्षण लिया अपने पति ब्रायन के साथ और कैरेबीयन समुद्र मेँ ७० फीट तक की गहराई तक सफलता से उतर कर, प्रवाल के, जल मेँ लहराते पौधे देखे !!.
.सेँट लुसीया के टापू पर अपने प्रशिक्षक के साथ
..व ब्रायन व सिँदूर, ७० फीट गहराई मेँ, तैरते हुए...

चाँद मेरा साथी है.............


चाँद मेरा साथी है.............और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके, मेरी सारी बात!
चाँद मेरा साथी है.............

चाँद चमकता क्यूँ रहता है ?
क्यूँ घटता बढता रहता है ?
क्योँ उफान आता सागर मेँ ?
क्यूँ जल पीछे हटता है ?
चाँद मेरा साथी है.............
और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके, मेरी सारी बात!

क्योँ गोरी को दिया मान?

क्यूँ सुँदरता हरती प्राण?

क्योँ मन डरता है, अनजान?

क्योँ परवशता या अभिमान?

चाँद मेरा साथी है.............
और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके, मेरी सारी बात!

क्यूँ मन मेरा है नादान ?

क्यूँ झूठोँ का बढता मान?

क्योँ फिरते जगमेँ बन ठन?

क्योँ हाथ पसारे देते प्राण?

चाँद मेरा साथी है.............
और अधूरी बात
सुन रहा है, चुपके चुपके, मेरी सारी बात!





कल

कल कल कल...करता,
बीत गया कल !
अब कल है, आनेवाला !
जीवन के निर्झर से झर, झर
झरना, रीत गया !
झर, झरना, रीत गया !
कल सा ही बीत गया !
सागर के स्वर से मर्र मर्र कर,
जब सपना टूट गया
-कोई अपना छूट गया !
कल सा ही बीत गया !
रवि के कण से,
निसृत, छन कर,
जब अँबर टूट गया !
घन अँबर रुठ गया !
री, कल सा टूट गया!
सरिता के जल से विकल , निकल,
कल कल स्वर रीस गया !
स्वर आगे निकल गया
-कल सा ही बिखर गया !
-- लावण्या

Monday, March 19, 2007

हुस्न पहाडोँ का : ~~


" पर्बत के पीछे चँबे दा गाँव मेँ , गाँव मेँ २ प्रेमी रहते हैँ "

लता जी का गाया हुआ ये गीत ...अकसर पहाडोँ की याद दीला जाता है!
किसी पहाडी युवती के सीने से उठती आग से वादीयाँ धूँआ धूँआ हो जातीँ हैँ कोहरे से लिपटी सर्द हवाओँ को चीरती हुई आवाज, बरबस, परदेश से पधारे, सैलानीयोँ के पैर रोक लेती है ...मानोँ कह रही होँ कि,
" कुछ पल को रुक जाओ !हमारे ख्वाबगाह मेँ तशरीफ ले आये हो
तब कुछ पल इस सुकून को महसूस करो "


Kanchanjangha : कँचनजँघा हिमालय पर्बत की एक विस्तृत शृँखला

माँ धरती प्यारी

A Bird named TOUCAN
Gulabee Champe ke phool
कितनी सुँदर अहा, कितनी प्यारी,
ओ सुकुमारी, मैँ जाऊँ बलिहारी
नभचर, थलचर,जलचर सारे,
जीव अनेक से शोभित है सारी,
करेँ क्रीडा कल्लोल, नित आँगन मेँ,
माँ धरती तू हरएक से न्यारी !
अगर सुनूँ मैँ ध्यान लगाकर,
भूल ही जाऊँ विपदा,हर भारी,
तू ही मात, पिता भी तू हे,
भ्राता बँधु, परम सखा हमारी !
-- लावण्या


Friday, March 16, 2007

सृजनगाथा´´ --


आदरणीय लावण्या दीदी,
चरण स्पर्श
हम " सृजनगाथा´´ में एक नये स्तंभ – 'प्रवासी कलम ' की शुभ शुरूआत आपसे करना चाहते हैं । आपसे इसीलिए कि विदेश में बसे प्रवासियों में आप सबसे वरिष्ठ हैं । साथ ही भारत के प्रतीक पुरुष पं. नरेन्द्र शर्मा की पुत्री भी । भारतीयता का तकाजा है कि श्रीगणेश सदैव बुजुर्गों से ही हो । यह प्रवासी भारतीय साहित्यकारों से एक तरह की बातचीत के बहाने भारतीय समाज, साहित्य, संस्कृति का सम्यक मूल्यांकन भी होगा जो http://www.srijangatha.com/ के 1 जुलाई 2006 के अंक में प्रकाशित होगा । साथ ही हिन्दी के कुछ महत्वपूर्ण लघुपत्रिकाओं में ।
हम जानते हैं कि उम्र के इस मुकाम में आपको लिखने-पढ़ने में कठिनाई होती होगी । पर यथासमय हमें किसी तरह आपके ई-मेल से उत्तर प्राप्त हो जाये तो यह एक ऐतिहासिक कदम होगा ।
दीदी जी, इसके साथ यदि आपकी कोई तस्वीर अपने पिताजी के साथ वाला मिल जाये तो उसे भी स्केन कर अवश्य ई-मेल से भेज दें । आशा है आप हमारा हौसला बढा़येगीं । हम आपका सदैव आभारी रहेंगे ।
(नीचे प्रश्न वर्णित हैं ।)
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प्रश्न- लावण्या जी, आप उम्र के इस मुकाम में वह भी विदेशी भूमि में रहते हुए भी रचना-कर्म से संबंद्ध हैं । यह हम भारतीयों के लिए गौरव की बात है । लेखन की शुरूआत कैसे हुई ? अपनी रचना यात्रा के बारे में हमारे पाठकों को बताना चाहेंगी । अपनी कृतियों के बारे में विस्तार से बतायें ना !
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( उत्तर 1 ) -- जयप्रकाशजी व अन्य लेखक व कवि मित्रोँसे , और समस्त पाठकोँ से, मेरे सादर नमस्कार !
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रचना यात्रा :
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ " भारतसे मेरी भौगोलिक दूरी अवश्य हई है किँतु, आज भी हर प्राँतके प्रति मेरा आकर्षण उतनाही प्रबल है -यूँ लगता है मानो, विश्वव्यापी, विश्वजाल का सँयोजन और आविष्कार शायद बृहत भू- मँडल के बुध्धिजीवी वर्गको एक समतल ,पृष्ठभूमि प्रदान करना और अन्यन्योआश्रित , विचार व सँप्रेरणा प्रदान करना ही इसका आशय हो और उद्भव का हेतु ! "
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( आप उम्र के इस मुकाम में वह भी विदेशी भूमि में रहते हुए भी रचना-कर्म से संबंद्ध हैं । )
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" और अगर आप मेरे निजी जीवन के बारे मेँ पूछ रहेँ हैँ तो, यह कहना चाहती हूँ कि,
" उम्र का बढना न कह कर, उम्र का घटना कहो ! सफर मेँ हर एक डग को, सफर का कटना कहो ! "
( उनके ( भारत के प्रतीक पुरुष पं. नरेन्द्र शर्मा ) -- अप्रकाशित काव्य सँग्रह " बूँदसे साभार " )

और एसी अनेक काव्य पँक्तियाँ मेरे दिवँगत पिताजी , स्व. पॅँ नरेन्द्र शर्माजी की लिखी हुई हैँ और वे दीप ~ शिखा की तरह, मेरा मार्ग प्रशस्त करतीँ रहतीँ हैँ !
कविता देवी के प्रति रुझान और समर्पण शायद पितासे पाई हुई , नैसर्गिक देन ही है --
मेरी अम्मा , स्व. श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्माजी ने, एक खास " बेबी - रेकोर्ड - बुक " मेँ लिखा था कि,

" 'लावण्या , आज, ३ वर्षकी हो गई और कहती है कि, उसने कविता रची है- " मैँ तो माँ को मेरा मन कहती हूँ रे ! "
और उसके बाद, मेरी बडी मौसीजी, स्व. विध्यावतीजी जिन्हे हम " मासीबा " पुकारते थे, उन्होँने एक बडी सुँदर हल्के पीले रँगकी, डायरी मुझे उपहार स्वरुप दी थी और आशिष के साथ कहा था कि, " इसमेँ अपनी कथा - कहानी और गीत लिखती रहना " --

बाल - कथा, ३ सहेलियोँ की साहस गाथा, इत्यादि उसीसे शुरु किया था मैँने ,लिखना --और आज मुडकर देखती हूँ तब भी वही शैशव के वे मीठे दिवस और उत्साह, को अब भी अक्षुण्ण पाती हूँ --

मैने लिखकर बहुत सारा रखा हुआ है -- अब उसे छपवाना जरुरी, लग रहा है -- प्रथम कविता ~ सँग्रह, " फिर गा उठा प्रवासी " बडे ताऊजीकी बेटी श्रीमती गायत्री, शिवशँकर शर्मा " राकेश" जी के सौजन्यसे, तैयार है --
--" प्रवासी के गीत " पापाजी की सुप्रसिध्ध पुस्तक और खास उनके गीत " आज के बिछुडे न जाने कब मिलेँगे ? " जैसी अमर कृति से हिँदी साहित्य जगत से सँबँध रखनेवाले हर मनीषी को यह बत्ताते अपार हर्ष है कि, ' यह मेरा विनम्र प्रयास, मेरे सुप्रतिष्ठित कविर्मनीष पिताके प्रति मेरी निष्ठा के श्रध्धा सुमन स्वर स्वरुप हैँ --
शायद मेरे लहू मेँ दौडते उन्ही के आशिष , फिर हिलोर लेकर, माँ सरस्वती की पावन गँगाको, पुन:प्लावित कर रहे होँ क्या पता ?
जो स्वाभाविक व सहज है, उस प्रक्रिया को शब्द बँधन से समझाना निताँत कठिन हो जाता है --

" सृजन " --- स्वाभाविक व सहज है, उस प्रक्रिया को शब्द बँधन से समझाना उतना ही कठिन होजाता है --

"" सृजन " भी कुछ कुछ एसी ही दूरुह सी क्रिया है -- हो सकता है कि, आप जैसे उत्साही बुध्धीजीवीयँ के इस प्रयास से " सृजन - गाथा " - " यशो- गाथा " मेँ परिणत हो जाये !
आप भारत के छत्तीस गढ प्राँतसे आज हिँदी साहित्य के सवाँगीण विकासके प्रति सजग हैँ, क्रियाशील हैँ, कटिबध्ध हैँ - और आपका यह यज्ञ सफल हो, ये मेरी भी इच्छा है --

अस्तु: सस्नेहाषिश व बधाई !
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प्रश्न- आपकी रचना प्रक्रिया के बारे में बतायें । आप भारत के अलावा इन दिनों विदेश में बस गयी हैं । क्या प्रवासी संसार में आपकी रचनाधर्मिता प्रभावित नहीं होती ? यदि हाँ, तो कैसे ? जहाँ आप निवसती हैं, वहाँ का सृजनात्मक माहौल क्या है । खास कर हिन्दी, साहित्य लेखन के कोण में ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ( उत्तर --2 ) : प्रवासी भारतीय अलग अलग परिस्थितीयोँ मेँ रहते हैँ -- सबका अपना अपना कार्य -क्षेत्र होता है - पारीवारिक जिम्मेदारीयाँ और अन्य सँगठन होते हैँजिनमे उनकी सक्रियता समय ले लेती है --
मेरी रचना प्रक्रिया, स्वाँत: सुखाय तो है ही, साथ साथ, विश्व - जाल के जरिये, असँख्य हिँदी भाषी वेब - पत्रिकाओँ व जाल घरोँ से मेरा लगातार सँबँध बना रहता है -- जैसे --

http://www.aparnaonline.com/lavanyashah.html


http://www.nrifm.com/

Remembering Pt Narendra Sharma: Bollywood's greatest Hindi poet
Hindi poet Pt Narendra Sharma fought for India's independence and then went to Mumbai to write some memorable songs like 'Jyoti Kalash Chalke' and 'Satyam Shivam Sundaram'. Lata Mangeshkar revered him like her father. In this interview, first broadcast on Cincinnati local radio, his daughter Lavanya Shah remembers her legendary father. The All India Radio's entertainment channel was named by him as 'Vividh Bharati'. To listen click here (Hindi)
A rare Photograph of Hindi's three great poets A rare photograph of 1940sSumitra Nandan Pant (seated), Harivansh Rai Bachchan (left) and Pt Narendra Sharma (right)

http://www.manaskriti.com/kaavyaalaya/smritidp1.stm

http://www.hindinest.com/lekhak/lavanya.htm

http://www.hindinest.com/bachpan/bodh.htm

http://www.abhivyakti-hindi.org/phulwari/natak/ekpal01.htm

http://www.boloji.com/women/wd5.htm

http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/bachchan/patra_mool.htm

http://www.abhivyakti-hindi.org/visheshank/navvarsh/vinoba.htm

आजके युग का " गूगल " चमत्कारिक आविष्कार, आपको , अँतर्जाल पर, ' मेरा नाम, " लावण्या शाह " टाइप करेँगेँ तो तुरँत कई सारी मेरी लिखी सामग्री , आपके सामने, अल्लादीन के चिराग की तरह, सिर्फ चँद क्षणोँमेँ , आपके सामने, प्रस्तुत कर देँगीँ --

आज २१ वीँ सदी के आरँभ मे, लेप टोप के जरिये, समस्त जगत की गतिविधियोँसे जुडना आसान सा तरीका हो गया है

मेरे पति श्री. दीपकजी के साथ अक्सर कामके सिलसिले मेँ , यात्रा पर , लिखने पढने की सामग्री , मेरे साथ रहती है -- और विशुध्ध शाकाहारी, खानपान की सुविधा भी !! :-))
आजकल मैँ पापाजीकी कविताओँको गुजराती अनुवाद करती रहती हँ -- गुजराती अम्मासे विरासत मेँ मिली मेरी मातृभाषा रही है, और पापाजीने हम ३ बहनोँको गुजराती माध्यमकी पाठशाला मेँ ही रखा था -
उनका कहना था कि, " पहले, अपनी भाषा सीखलो, फिर विश्वकी कोई भी भाषा को सीखना आसान होगा " ---

मेरे इस उत्तर मेँ यह भी साफ है कि, पाश्चात्य जगत मेँ, अँग्रेजी का वर्चस्व है - भारत और चीनकी उन्नति ने इस समाजकी आँखेँ खोल दीँ हँ -
अगर भारत विश्व का तेजीसे सम्पन्न होता हुआ, विकासशील देश है तब, उसके वैभव व सम्पन्नता मेँ शामिल होना समझदारी का पहला कदम होगा----
परँतु, स्वयम भारत मेँ बदलाव जरुरी है -- भारत के महानगरोँसे पढ लिख लर शिक्षित वर्ग, जीवन यापन की दौड मेँ अक्सर विदेश ही पहुँचा है ---
एँजीनीयर, डोक्टर और तकनीकि विशेषज्ञ बहुधा ब्रिटन या अमरिका आकर तगडा वेतन पाना चाहते हैँ - भले ही, मनसे वे भारतेय सँस्कृतिसे विलग नही हो पाते -- फिर भी परिवार की सम्रुध्धि व खुशहाली के लिये, परदेस आकर बस जाते हैँ ..

.यह स्थिती आज बदलने लगी है और ये खुशी की बात है की आनेवाले कल को , प्रबुध्ध विश्व नागरिक जैसी अपनी सँतानोँ के पुनरागमन से और ज्यादा सम्पन्नता मिले !
मेरी यही प्रार्थना है कि, आनेवाला कल, ये शताब्दि, भारतीय सँस्क्रुति की गौरव - गाथा बने जिसका वर्णन हम और आप साथ साथ पढेँ --
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हिँदी लेखन जब तक हिँदी लिखनेवाले और बोलनेवाले, जहूँ कहीँ भी रहेँगेँ, अबाध गति से , आगे बढता रहेगा -- हाँ , आगामी पीढी हिँदी से जुडी रहती है या नहीँ -- इस बात से ही भविष्य के हिँदी लेखन का स्वरुप स्पष्ट होगा --~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- अपने वर्तमान निवास राज्य में आप हिन्दी और हिन्दी साहित्य, संस्कृति और सभ्यता की स्थिति कैसे मापना चाहेंगी ? 21 वीं सदी में वहाँ हिन्दी का भविष्य कैसा होगा ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ( उत्तर - ३ ) जैसा कि मैँने आगे कहा है, हिँदी भाषा का विकास पहले तो हम भारतीय, भारत मेँ प्रशस्त करेँ -- राजधानी नई देहली मेँ ही, कितने वरिष्ठ नेता हिँदी को अपनाये हुए हैँ ? बडे शहेरोँ के अँग्रेजी माध्यम से पढे लिखे, लोग क्या हिँदी को फिल्मोँके या टी.वी. कार्यक्रमोँ से परे, की भाषा मानते हैँ ?

सोचिये, अगर आप खुद उसी वर्गके होते तब आपका झुकाव हिँदी साहित्य के प्रति इतना ही समर्पित रहता ? उत्तर भारत हिँदी भाषा का गढ रहा है ---
और हपारी साँस्कृतिक घरोहर को हमेँ, एक सशक्त्त और सम्पन्न भारत मेँ, एस २१ वीँ सदी मेँ, आगे बढाना है --
अमरिका और ब्रिटनकी अपनी अलग सभ्यता और सम्रुढ्ध भाषा है -- अमरीका के विषय मेँ इतना अवश्य कहूँगी कि, आज, एडी चोटीकी मेहनत से, विश्व का सर्विपरि देश बना हुआ है -- येहाँ, सँगीत की कई भिन्न शाखाएँ हैँ और हर सप्ताह, हर विधामेँ हजारोँ नए गीत रचे जाते हैँ -- लोक प्रसारण के माध्यमोँ का अपने हितमेँ, अपने प्रचारमेँ उपयोग करना इन सभी क्रियाओँ मेँ वे सिध्धहस्त हैँ --अफसोस की बात यह है कि एम्. टी. वी. MTV / CNN --
जैसे कार्यक्रमोँकी देखादेखी भारत के मीडीया भी अँधा अनुकरण कर रहे हैँ --

सर्वथा भारतीय विषय वस्तु और ढोस तत्वोँसे सँबँधित , सर्वथा भारतीय प्रकारके कार्यक्रम ही कालजयी बन पायेँगेँ --

जिसमेँ सार नहीँ वह, काल की लपटोँमेँ जलकर भस्मीभूत हो जायेगा - एसा मेरा मानना है --
हिँदी के भविष्य के प्रति मैँ आशावान हूँ परँतु, अटकलेँ नहीँ लगाऊँगी -- आखिरकार, आजके हिँगी भाषी क्या योगदान कर रहे हैँ और किश्व की परिस्थीती पर भी बहुत कुछ निर्भर रहेगा -- हमेँ तो यही याद रख कर कार्य कर्ते रहना होगा कि,
" कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन" ...

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प्रश्न- आप मूलतः गीतकार हैं । आपका प्रिय गीतकार (या रचनाकार) कौन ? क्यों ? वह दूसरे से भिन्न क्यों है ?
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( उत्तर - ४ )
अगर मैँ कहूँ की, मेरे प्रिय गीतकार मेरे अपने पापा - , स्व. पॅँ नरेन्द्र शर्माजी के गीत मुझे सबसे ज्यादा प्रिय हैँ --
तो अतिशयोक्ति ना होगी --

हाँ, स्व. श्रेध्धेय पँतजी दादाजी, स्व. क्राँतिकारी कवि ऋषि तुल्य निरालाजी , रसपूर्ण कवि श्री बच्चनजी, अपरामेय श्री प्रसादजी , महान कवियत्री श्री. महादेवी वर्माजी, श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी विभूतियाँ हिँदी साहित्य गगनके जगमगाते नक्षत्र हैँ जिनकी काँति अजर अमर रहेगी --
( क्यों ?? )
इन सभी के गीतोँ मेँ सरस्वती की वैखरी वाणी उदभासित है -- और सिर्फ मेरे लिये ही नहीँ, सभी के लियेउनकी कृतियाँ प्रणम्य हैँ ----
( वह दूसरे से भिन्न क्यों है ? ) -- भिन्न तो नही कहूँगी -- अभिव्यक्त्ति की गुणवत्ता , ह्रदयग्राही उद्वेलन, ह्रदयगँम भीँज देनेवाली , आडँबरहीन कल्याणकारी वाणी --- सजीव भाव निरुपण, नयनाभिराम द्र्श्य दीख्लानेकी क्षमता, भावोत्तेजना, अहम्` को परम्` से मिलवानेकी वायवी शक्त्ति ,शस्यानुभूति, रसानुभूति की चरम सीमा तक प्राणोँको , सुकुमार पँछीके , कोमल डैनोँ के सहारे ले जानेकी ललक....और भी कुछ जो वाणी विलास के परे है --

वो सभी इन कृतियोँ मेँ विध्यमान है --
जैसा काव्य सँग्रह " प्यासा ~ निर्झर " की शीर्ष कविता मेँ कवि नरेँद्र कहते हैँ,
: मेरे सिवा और भी कुछ है , जिस पर मैँ निर्भुर हूँ ~~ मेरी प्यास हो ना हो जग को, मैँ, प्यासा निर्झर हूँ " ~~
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ प्रश्न- लंबे समय तक हिन्दी-गीतों को नई कविता वालों के कारण काफी संघर्ष करना पड़ा था । आप इसे कैसे देखती हैं । गीत के भविष्य के बारे में क्या कहना चाहेंगी ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ( उत्तर - ५ )
नई कविता भी तो हिँदी की सँतान है -- और हिँदी के आँचल मेँ उसके हर बालक के लिये स्थान है -- क्योँकि, मानव मात्र को, अपनी अपनी अनुभूति को पहले अनुभव मेँ रच बसकर, रमने का जन्मसिध्ध अधिकार है - उतना ही कि जितना खुली हवा मेँ साँस लेनेका --

ये कैसा प्रश्न है की किसी की भावानुभूति अन्य के सृजन मे आडे आये ?

नई कविता लिखनेवालोँ से ना ही चुनौती मिली गीत लिखनेवालोँको नाही कोई सँघर्ष रहा ---

" किसी की बीन, किसी की ढफली, किसी के छँद कीसी के फँद ! "

~~ ये तो गतिशील जीवन प्रवाह है , हमेँ उसमेँ सभी के लिये, एकसा ढाँचा नहीँ खोजना चाहीये --

हर प्राणीको स्वतँत्रता है कि, वह, अपने जीवन और मनन को अपनाये -- यही सच्चा " व्यक्ति स्वातँत्रय " है -
बँधन तो निषक्रीयताका ध्योतक है --

और जब तक खानाबदोश व बँजारे गीत गाते हुए, वादीयोँमेँ घूमते रहेँगेँ,

प्रेमी और प्रेमिका मिलते या बिछुडते रहेँगेँ,

माँ बच्चोँ को लोरीयाँ गा कर सुलाया करेँगीँ

और बहने, सावन के झूलोँ पर अपने वीराँ के लिये सावनकी कजली गाती रहेँगीँ ...

या, पूजारी मँदिरमेँ साँध्य आरती की थाल धरे स्तुति भजन गायेँगेँ,

या गाँव मुहल्लेह भर की स्त्रीयाँ .....बेटीयोँ की बिदाई पर " हीर " गायेँगीँ, "......

गीत " ....गूँजते रहेँगेँ ....
ग़ीत प्रकृति से जुडी और मानस के मोती की तरह पवित्र भेँट हैँ -- उनसे कौन विलग हो पायेगा ?

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प्रश्न- हिन्दी के जानेमाने गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की बेटी होने का सौभाग्य आपके साथ है । आप स्वयं को एक गीतकार या पं.नरेन्द्र शर्मा जी की पुत्री किस रूप में देखती हैं ? और क्यों ?
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( उत्तर - - ६ )
आपने यह छोटा - सा प्रश्न पूछ कर मेरे मर्म को छू लिया है -- सौभाग्य तो है ही कि मैँ पुण्यशाली , सँत प्रकृति कवि ह्रदय के लहू से सिँचित, उनके जीवन उपवन का एक फूल हूँ --

उन्हीँके आचरणसे मिली शिक्षा व सौरभ सँस्कार, मनोबलको हर अनुकूल या विपरित जीवन पडाव परमजबूत किये हुए है --

उनसे ही ईश्वर तत्व क्या है उसकी झाँकी हुई है -- और, मेरी कविता ने प्रणाम किया है --
" जिस क्षणसे देखा उजियारा,
टूट गे रे तिमिर जाल !
तार तार अभिलाषा तूटी,
विस्मृत घन तिमिर अँधकार !
निर्गुण बने सगुण वे उस क्षण ,
शब्दोँ के बने सुगँधित हार !
सुमन ~ हार, अर्पित चरणोँ पर,
समर्पित, जीवन का तार ~ तार !!
( गीत रचना ~ लावण्या )

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प्रश्न- अपने पिता जी के साथ गुजारा वह कौन-सा क्षण है जिसे आप सबसे ज्यादा याद करती हैं । आपके पिता जी के समय घर में साहित्यिक माहौल कैसा था ?
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( उत्तर - - - ७ )
मेरे पापा उत्तर भारत, खुर्जा , जिल्ला बुलँद शहर के जहाँगीरपुर गाँवके पटवारी घराने मेँ जन्मे थे.
प्राँरभिक शिक्षा खुर्जा मेँ हुई - अल्हाबाद विश्वविध्यालयसे अँग्रेजी साहित्य मेँ M/A करनेके बाद,
कुछ वर्ष आनँद भवन मेँ अखिल भारतीय कोँग्रेस कमिटि के हिँदी विभाग से जुडे और नजरबँगद किये गए -
देवली जेल मेँ भूख हडताल से .. ( १४ दिनो तक ) ....
जब बीमार हाल मेँ रिहा किए गए तब गाँव , मेरी दादीजी गँगादेवी से मिलने गये - ---
वहीँ से भगवती बाबू (" चित्रलेखा " के प्रेसिध्ध लेखक ) के आग्रह से बम्बई आ बसे -
वहीँ गुजराती कन्या सुशीला से वरिषठ पँतजी के आग्रह से व आशीर्वाद से पाणि ग्रहण सँस्कार रम्पन्न हुए --

बारात मेँ हिँदी साहित्य जगत और फिल्म जगत की महत्त्व पूर्ण हस्तीयाँ हाजिर थीँ --

दक्षिण भारत कोकिला : सुब्बुलक्षमीजी, सुरैयाजी, दीलिप कुमार, अशोक कुमार, अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, भगवती बाब्य्, सपत्नीक, अनिल बिश्वासजी, गुरु दत्तजी, चेतनानँदजी, देवानँदजी इत्यादी ..
..और जैसी बारात थी उसी प्रकार १९ वे रास्ते पर स्थित उनका आवास

डो. जयरामनजी के शब्दोँ मेँ कहूँ तो , " हिँदी साहित्य का तीर्थ - स्थान " बम्बई जेसे महानगर मेँ एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया --

उस साहित्य मनीषीकी अनोखी सृजन यात्रा निर्बाध गति से ६ दशकोँ को पार करती हुई,

महाभारत प्रसारण १९८९ , ११ फरवरी की काल रात्रि के ९ बजे तक चलती रही ---
आज याद करूँ तब ये क्षण स्मृति मेँ कौँध - कौँध जाते हैँ ........................................................................................................................................................................................................................
( अ ) हम बच्चे दोपहरी मेँ जब सारे बडे सो रहे थे, पडोस के माणिक दादा के घर से कच्चे पक्के आम तोड कर किलकारीयाँ भर रहे थे कि, अचानक पापाजी वहाँ आ पहुँचे ----
गरज कर कहा, " अरे ! यह आम पूछे बिना क्योँ तोडे ? जाओ, जाकर माफी माँगो और फल लौटा दो "
एक तो चोरी करते पकडे गए और उपर से माफी माँगनी पडी !!!

-- पर अपने और पराये का भेद आज तक भूल नही पाए -- यही उनकी शिक्षा थी --
( ब ) मेरी उम्र होगी कोई ८ या ९ साल की - पापाजी ने, कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति " मेघदूत " से पढनेको कहा -- सँस्कृत कठिन थी परँतु, जहीँ कहीँ , मैँ लडखडाती, वे मेरा उच्चारण शुध्ध कर देते -- आज, पूजा करते समय , हर श्लोक के साथ ये पल याद आते हैँ --
( क ) मेरी पुत्रा सिँदूर के जन्म के बाद जब भी रात को उठती, पापा , मेरे पास सहारा देते , मिल जाते -- मुझसे कहते, " बेटा, मैँ हूँ , यहाँ " ,..................
आज मेरी बिटिया की प्रसूती के बाद, यही वात्सल्य उँडेलते समय, पापाजी की निस्छल, प्रेम मय वाणी और स्पर्श का अनुभव हो जाता है ..

.जीवन अत्तेत के गर्भ से उदित होकर, भविष्य को सँजोता आगे बढ रहा है --

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प्रश्न- अपने पिताश्री के साहित्य-वैभव को किस तरह संरक्षण दिया जा रहा है ? आप या आपका परिवार निजी तौर पर इसमें किस हद तक समर्पित है ?

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( उत्तर - ८ )
मेरे छोटे भाई कु. परितोष नरेन्द्र शर्मा ने अथक परिश्रम के बाद, पूज्य पापाजी की , सभी साहित्यिक कृतियाँ एकत्र कर एक भागीरथ यज्ञ को सँपन्न करने का आरँभ किया है --- मैँ पुत्री होनेके नाते, अपना सहयोग दे रही हूँ --

--भारत सरकार से हमेँ सुझाव मिला था कि, राजकीय सँग्रह कोष के लिये वे इस साहित्य वैभव को ले जाना चाहते हैँ

परँतु, मेरे भाई ने अब तक उसे अपन पास सहेज कर रखा है और वह शीघ्र ही, वेब - पोर्टल का निर्माण करेगा --
साथ साथ,........................ " "ज्योति ~ कलश ~ स्व. पँ. नरेन्द्र शर्मा सम्पूर्ण ग्रँथावली " का विधिवत लोकार्पण समारोह / उत्सव भी सम्पन्न होगा --
जिसकी अध्यक्षता स्वर साम्राज्ञी कु. लता मँगेशकरजी जो मेरी बडी दीदी हैँ उन्होने हामी भरी है आनेकी -- वे करेँगीँ -- '
और अमिताभजी भी कविता पाठ करेँगे -- हमारा उनसे ये विनम्र अनुरोध रहेगा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
- प्रश्न- भारत में रचे जा रहे हिन्दी गीतों को तो आप पढ़ती ही होंगी । आप तब और अब हिन्दी गीतों में क्या अंतर देखती हैं ? एक श्रेष्ठ गीत की विशेषता क्या होनी चाहिए ?

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( उत्तर - ९ )
भारत के ज्यादातर गीत , या तो अन्तर्जाल के विभिन्न जाल घरोँ के माध्यम से, या फिल्मी गीतोँ के जरिये ही विदेश मेँ पहुँच रहे हैँ - दुसरा साहित्य प्राप्त करने के कडे प्रयास करने पडते हैँ --
एक श्रेष्ठ गीत की विशेषता या की महत्ता यही है कि, जो दिलोदीमाग मेँ बस जाये -- देर तक हम जिसे गुनगुनायेँ, कालजयी साहित्य हो या एक श्रेष्ठ गीत --- विशेषता दोनोँ की .....

खास बात यही होती है जो गीत की रचना, उसकी गेयता और माधुर्य ही हमेँ बाँधे रखते हैँ --

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प्रश्न- समकालीन अँगरेज़ी साहित्य से तो आप अवगत होती होंगी ही । शायद पढ़ती लिखती भी होंगी । इस प्रसंग में आपकी टिप्पणी क्या है ? अंगरेज़ी साहित्य और हिन्दी साहित्य की विभाजन रेखा कहाँ है ?
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( उत्तर १० )
-- हर प्राँतके अपने अनुभवोँका साहित्य , " दर्पण " होता है --
अँग्रेजी साहित्य लेँ तब मध्य युगीन व नए पुन: स्थापित युरोपीय प्रजा से बसे अमरीका के साहित्य मेँ भी काफी अँतर है --
वीक्टोरीयन साहित्य मेँ गृहस्थ जीवन के प्रति आदर, आदर्शवाद के गुलाबी चश्मे से दुनिया के नजारे देखना , मासूम लगता है --
अमरीका , गणराज्य की सार्वभोमकता , स्वाधीनता , अबाध गति से २०० वर्षोँ से चली आरही है --
२ विश्व - युध्ध, आँतरिक युध्ध के बाद , अश्वेतोँ की आजादी के बाद
तकनीकी विकास, व्योम व अवकाश पर पहुँच , चँद्रमा पर विजय पताका लहराती हुई, तकनीकीअगवानी के साथ समाज की बदलती हुई छवि उभरना अनिवार्य सा था --
भारत को आजाद हुए अभी कुछ दशक ही हुए हैँ -- प्रगति हो रही है --
उन्नति अवश्य होगी -- साहित्य सृजन भी अनुरुप होगा --
इन दोनो के बीच की विभाजन रेखा साँस्कृतिक है,
जिसे आजका आधुनिक रचनाकार , लाँघनेको उध्ध्यत है --
सफलता कितनी मिलेगी यह मैँ नहीँ कह सकूँगी -- क्योँकि, अमरीका मेँ रहती जरुर हूँ परँतु, आज भी, नारी मनके , गुप्त भावोँको प्रकट करता हुआ साहित्य मैँ नहीँ लिखना चाहती -- यह मेरा अपना रवैया है ---
शायद आप मुझे " पुतरातनपँथी " ही कहेँ -- तो वही सही --
ज़ो एसा साहित्य लिख्नना चाहते हैँ उनसे मेरा विरोध भी नहीँ -- " तुँडे तुँडे मतिर्भिन्ना " ..........

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प्रश्न- कहते हैं अब पठनीयता खासकर साहित्यिक बिरादरी में कम हुई है । इसे आप किस तरह लेती हैं ?
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( उत्तर - ११ )
साहित्योक बिरादरी के लोग अब शायद अन्य कार्य - क्षेत्रोँ से जुडकर , आजके महत्त्वपूर्ण विधाओँ से कुछ
नया सीख रहे होँ - -- क्या पता ?
आज का युग, मशीन युग से भी आगे, सँचार व सम्प्रेषणाओँ का युग है --

मनुष्य भौतिक सुख भोग, स्व केन्द्रीत आत्मानुभूतियोँ से समाज से जुडे रहकर भी स्वेच्छाचारी और स्वतँत्र निर्णय लेने का हिमायती होता जा रहा है ----

युग बदला है, और जोर जबर्दस्ती से नहीँ मगर जब साहित्य आकर्षण का केन्द्र बिँदू बनेगा तब शायद झुकाव भी ज्यादा होगा ---

जिस किसी को भी साहित्य के प्रति भक्ति भाव य समर्पण भाव हो उसे बाहरी गतिविधियोँकी चिँता किये बिना ,
एक लक्ष्य को साम्ने रख कर अपना काम इमानदारी से करते रहना चाहिये -- ये मेरा मत है --

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प्रश्न- कहते हैं आजादी के बाद भारत अन्दरुनी तौर पर कमजोर हुआ है पर सारे जहान में इसका कद बढ़ा है ? यह कैसा अंतर्विरोध है ? वह कौन –सी अच्छाई है जो पश्चिम में है किन्तु यहाँ भारत में नहीं ? और वह कौन-सी बुराई है जो पश्चिम में किन्तु भारत में नहीं ।

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( उत्तर १२ )
जयप्रकाशजी , नाही तो मैँ कोई विशेषज्ञ हूँ ना ही प्रकाँड विद्वान !!

फिर भी आपने जो मुझे आज इतना बडा सन्मान दिया है, इतने कठिन सवाल पूछ कर जिसे मैँ एक साधारण स्त्री, अप्ने अनुभवोँ से तौलकर आपके सामने रख रही हूँ तो आशा करती हूँ कि, पाठक गण मेरी इस परीक्षा मेँ मुझे अपने समकक्ष खडा रहने देँगेँ --

और, अपनी टिप्पणीयोँसे हमारा ज्ञान- वर्धन करेँगेँ --

हर पाठक के अभिप्राय से कुछ सीखने की आशा है --
तो हाँ, आपके प्रश्न के उत्तर मेँ यही कहना चाहूँगी कि, बदलाव के पहले, घर्षण होता ही है --
सँघर्ष के बिना क्राँति और अँतर्द्वँदोँ के बाद ही निषष्कर्षनिकलता है --

आशा वान हूँ तो यही कामना है कि, भारत भूमि फिर " शस्य श्यामला स्वरुप " मेँ परिमार्जित हो --
सम्पन्न हो --
किसी भी एक देश मेँ , या व्यक्ति मेँ -- सभी अच्छाईयाँ होँ ये असँभव सी बात है -- -
भारत के पास प्राचीन सँस्कृति के विभिन्न वरदान हैँ --

पाश्चात्त्य देशोँ ने कटु अनुभवोँ की दुर्गम लडाईयाँ लडी हैँ ---
विश्व - युध्धोँ के दर्म्यान, हर पुरुष ने पराई धरती पर मर खप कर, स्वाधीनता की ध्वजा को, उठाये रखा था
-जब कि, स्त्रीयोँ ने फेक्टरी, कारखानोँ और खेत खलिहानोँ मेँ काम करते हुए, बालकोँ को पाला पोसा, बडा किया --

ये आसान तो नहीँ था - समाज व्यवस्था मेँ इस के कारण परिवर्तन हुए --
भारत मेँ कर्मठता का बोध, जागा है -- स्त्री शक्ति को लाँछित य अपमानित ना करके, उन्हे सक्षम बनाते हुए, पश्चिम के स्वयम् पर प्रमाणित अनुशासन से सीखकर , २१ वीँ सदी के नजरिये से देखना जरुरी है --

हाँ पश्चिम की, समाज के कुछ वर्ग और तबकोँ मेँ आध्यात्मिक अनुशासनहीन अराजकता को नकारना भी अनिवार्य है -- सँम्`-लैँगिक विवाह, विवाह - विच्छेद, १ ही वरिष्ठ / मुखियावाला परिवार, कामसाधनोँका असीमित -- अविवेकी उपयोग, सँवेदनहीन मानस से उपजी भाव शून्यता, उदासीनता , सिमटते पारिवारिक दायरोँ मेँ पनपती घुटन इत्यादि भी इसी पश्चिम की विशिष्ट्ताएँ हैँ --
और उनसे बच कर, उनको लाँघकर , आगे निकलते हुए, भारतीय या पूर्व के सुविचार / सँस्कारओँ को सहेजे हम अबश्य, सुखद मनोनभूमि पर आ पायेँगे एसा मेरा विश्वास है ---

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
--- प्रश्न- इन दिनों वैश्वीकरण, विश्व बाजार, उदारीकरण और कंप्युटर प्रौद्योगिकी का नारा सकल जहान में तैर रहा है, एक दीर्घ अनुभवी, बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी होने के कारण इसे आप किस नज़रिए से देखती हैं ? खास कर भारत जैसे नवविकासशील देश के परिप्रेक्ष्य में --
( उत्तर: १३ ) :
आपने जो इतने सारे अलँकरण मुझे पहना दीए !!!
" एक दीर्घ अनुभवी, बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी "
कह कर :-))
उनके लिये आपकी आभारी हूँ --

भारत को आज विश्व के सामने अपनी प्रतिभा दीखलाने का अवसर इन्हीँ " कंप्युटर प्रौद्योगिकी" --- " उदारीकरण " etc . से मिला है --- परँतु याद रहे, यह विश्व के बाजार मेँ हर विक्रेता अपनी मँडी सजाये, अपना सामान बेचनेकी पहल मेँ पैँतेरे आजमा रहा है --

अगर अमरीका का हथियारोँ के उपत्पादन मेँ अग्रणी स्थान है तो युध्ध कहीँ भी हो, अपने आयुध बेचकर फायदा तो लेगा ही ?
चीन भले ही छोटे मोटे लघु उध्योग कर , निकास बढाले, पर २० जम्बो जेट खरीद कर वही धन फिर BOEING CO. ( बोइँग क्पनी ) को मिल जायेगा --

हाँ इतना जरुर हुआ है कि, आज जो भी घटना घटती है, वह दुनिया के हर अखबार मेँ सुर्खीयोँके साथ छप जाती है -- इस लिहाजसे, " वैश्वीकरण, विश्व बाजार," -- शब्द अवश्य चरितार्थ हुए हैँ --

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रश्न- अन्य वह बातें जो आप हम सबके बीच बाँटना चाहेंगी ।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
( उत्तर- १५ ) --
जयप्रकाशजी, " सृजन ~ गाथा परिवार " के सभी को धन्यवाद कहना चाहूँगी -- आपने इतनी धैर्यसे मेरे उत्तरोँको सुना / पढा --
आज यहीँ बातोँ का सिलसिला समाप्त करते हैँ क्युँकि, यूँभी स्त्रीयाँ बदनाम हैँ -- बहुत ज्यादा बोलने के लिये -- :-))

अब ज्यादा कह कर लोगोँको उबाना नहीँ चाहती --

आपने बडे गँभीर मुद्दे उठाये हैँ -- और लोग भी अपने विचार रखेँ जिनके उत्तर मैँ भी पढना चाहूँगी ताकि कुछ नया सीख पाऊँ -
अब आज्ञा ...

और , आपके साथ सदैव मेरी सद्` भावना , शुभ कामना रहेगी ..." शुभम्` -अस्तु : इति "
लावण्या
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

आपका भाई ही,
-- Jayprakash Manas

Friday, March 02, 2007

घुघूती बासूती जी के प्रश्न : .....मेरे उत्तर...

(मेरी अम्मा सुशीला नरेन्द्र शर्मा मेरे छोटे भाई परितोष के साथ )
\
अरे ये क्या हुआ ? ........
कैसे हुआ ...
घुघूती बासूती जी ने फिर मुझे प्रश्नोँ के घेरे मेँ ला खडा किया !! ;-)
(जिनसे पूछे जा रहे हैं वे हैं.
.१ महेन्द्र जी
२ लावण्या जी )
घुघूती जी, ये कविता आपको सादर सप्रेम अर्पित करती हूँ ~~

" मस्त गगन पर उडती एक चिडिया,
पूछ रही है पहाडोँ से,
"क्यूँ ना जगाया ?
भैया था आया, मिलने मुझसे,
लेकर के मोती का हार ! "
छलक रही आँखेँ ,
पनिहारीन की,
पनघट पे,
रीति गगरी सा मन रीता
मैँ, बाट जोहती लिये,
मैके की प्यास !
घुघूती बासूती, हूँ,
मैँ, उडती फिरती,
जँगल, झरने,
बनफूल लजाती,
फिर फिर करती
मिलने की आस ! "
अब मेरे प्रश्न ....
देखती हूँ ....
+
मेरे उत्तर...
और उनके उत्तर,

यथासँभव :
सही सही लिखने की कोशिश...
पेश है !
१ आपको गीत, कविता, कहानी, लेख इनमें से क्या अधिक पसन्द है ?

मुझे , सबसे प्रिय गीत ही हैँ
-- जिसे गुनगुनाया जाये, अगर गानेवाले कलाकार की आवाज़ नफीस और दिल को छूनेवाली हो तब तो सोने पे सुहागा ही लगता है ~
` जैसे कि, लता दीदी के हज़ारोँ गीत मेरे प्रिय हैँ !
जिनके लिखनेवाले भी हमेशा उन गीतोँ से जुडे हुए याद आते हैँ.

२ क्या आपको सपने याद रहते हैं ? कोई दिलचस्प सपना सुनाइये ।
यदि याद नहीं तो कैसा देखना पसन्द करेंगे ?
जी हाँ, सपनो का मनोविज्ञान बडा अजीबोगरीब है
- कुछ यादगार सपने मैँने भी देखे हैँ !
-- एक बार सुबह का स्वप्न देखकर हडबडा कर नीँद तूटी थी !
कारण था, हमारे एक मित्र को उनके पूरे परिवार के साथ किसी नाव मेँ बैठे देखा था
-- उनकी कोलेज मेँ जाती बेटी, सामने आयी, आँखोँमेँ आँसू थे और,
बडे कातर स्वर मेँ कहे जा रही थी,
" आण्टी, देखिये, डेड ( पापा) को क्या हुआ है!"
उनके डेड
( उनके अपने पिताजी याने कि दादाजी )
=( जिनकी मृत्य़ु कई बरसोँ पहले हो गई थी )
व माँ के साथ, एक बेँच पर बैठे थे!

उनकी पत्नी भी माँ के बगल मेँ दिखीँ
और हमारे मित्र की कमीज मेँ एक लँबा छूरा गडा दीखा !!
जिससे खून बहे जा रहा था और वे बोले कि,
" देखो, मैँ मरा जा रहा हूँ !"
-- मैँने आगे बढकर उनकी बेटी के माथे को सहलाते हुए कहा,
" ना ना..कुछ नहीँ होगा ..सब ठीक हो जायेगा"
और आँख खुल गई !
सपना टूट गया !!
पर मेरा मन अशाँत और उदास हो गया :-((
-- मैँ मेरे भाई ( मौसी का बेटा ) के घर
( उत्तर केरोलाएना) से ओहायो ,
घर लौटी और इन्हेँ ( मेरे पति दीपक को ) सारा सपना सुनाया
और कहा कि, "फलाँ मित्र के लिये ये कैसा अशुभ स्वप्न देखा !!
अब क्या हो? "
इन्होँने साँत्वना देते हुए कहा,
" आज तुम ज्यादा प्रार्थना कर लेना .."
और हम इसे भूल ही जाते .....
किँतु,
२ दिन बाद ....
सवेरे, हमारे मित्र की धर्मपत्नी का टेलिफोन आया,कहा,
" जल्दी मेँ हूँ, इनको ( हमारे वही मित्र - जिनका नाम नहीँ लिख रही हूँ ) ओपरशेन के लिये ले जा रहे हैँ, " ट्रीपल बाय -पास" है,
(ह्र्दय की ३ धमनीयोँ को खोलने की शल्य -चिकित्सा )
~~ आप आज इनकी सलामती के लिये दुआ भेजिये !! "
हम सन्न रह गए !!
-- खैर, बात को लँबाना नहीँ चाहती पर ये सपना ज़िँदगी भर याद रहेगा !
और खुशखबरी ये है कि, हमारे मित्र भी अब स्वस्थ हैँ :)
जब हम उनसे मिलने गये,
तब उनके दीवँगत पिताजी की तस्वीर देख कर और एक अचँभा हुआ !
क्योँकि उनकी शक्ल मैँने, पहले मेरे इस चेतावनी भरे सपने मेँ देखी थी हूबहू वही चेहरा देखकर ,
मेरी मनोदशा कैसी हुई इसका बयान नहीँ कर सकती --
-- इसे क्या कहेँगे ? इन्ट्यूशन? अँदेशा ? या दैवी सँकेत?
३ क्या कभी कोई चिट्ठा आपको ऐसा लगा कि यह तो मेरे मन के भाव कह रहा है ? कौनसा?
एक कविता मेँ मैँने लिखा है -- " मन का क्या है ! सारा आकाश कम है ! "
तो सच कहूँ तो, एक का नाम न लेते हुए, सभी ब्लोग जगत के साथीयोँ को मेरे स्नेहसिक्त अभिवादन भेजते ~~
यही कहूँगी कि, जहाँ कहीँ कोई बात सीधे दीलसे निकली है, या कि दार्शनिकता लिये हुए हो
या प्रवास वर्णन, प्राकृतिक छवि समेटे बयानी हो, भाषा की रवानी हो, अपनी माटी की खुशबु लिये कोई मीठी दर्दभरी कहानी हो,
वे सारे " चिठ्ठे "= या " जालघर"
-- मेरे, "अन्तर्मन" ब्लोग के दूर के साथी से ही लगे हैँ और इस यात्रा के सहयात्री भी जिन्हेँ मैँ चाव से पढती हूँ और कुछ नया सीखने पर उन्हेँ मन ही मन शाबाशी भी देती हूँ --
४ जीवन का कोई मर्म स्पर्शी पल जो भूले नहीं भूलता ?
सबसे मर्मस्पर्शी पल आज याद करते ही अपने को एक नन्ही बच्ची सा पाती हूँ..
जब अलसाई दोपहरी मेँ, मेरी थकी हुई अम्मा की बगल मेँ, अम्मा पर पाँव फैलाकर सोने से जो सुख मिलता था और जो बेफीक्री महसूस की वो फिर कभी नहीँ ~
~ आज भी आँखेँ बँद कर लूँ तब,
एक लँबी साँस ले कर वही भाव के कुछ अँश जी पाती हूँ ~
~~ जो मेरे लिये, तनाव दूर करने की शक्ति देते हैँ..
नई उर्जा देते हैँ ~~~
"माँ तुम चली गईँ ..,
देह के बँधन सब तोड,
सारे रिश्ते नाते छोड,
सीमित सीमाओँ के पार,
जीर्ण शीर्ण देह के द्वार!
ममता का उजियाला बाल,
थके कदमसे, मूँदे नयन से,
हमेँ छोड कर गईँ!
माँ तुम चली गईँ !"

५ आपके जीवन का दर्शन (philosophy) क्या है ?

मेरा जीवन दर्शन बडा सँक्षिप्त व सरल है ~
" जीयो और जीने दो! खुश रहो और खुशी फैलाओ !"

आशा करती हूँ कि, आपके सवालोँ के सही जवाब दे पाई हूँ __

स -स्नेह,

लावण्या




अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड


अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड

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हमारे असफल रहने की वजह क्या है ??

इस उत्तर को आप सुधिजनोँ के सामने लाते , सबसे पहले, ये स्पष्ट कर दूँ कि, मैँ--" उत्तर अमरीका" मेँ रहती अवश्य हूँ परँतु, फिर भी मेरा अवलोकन व मत सर्वथा, "निष्पक्ष " है -

-चूँकि, "ओस्कर" अमरीकन चयन प्रणाली है , हम ये भी समझ लेँ कि,
अमरीका की सोच , उसकी पृष्ठभूमि है.

अमरीका हमेशा "लोक -तँत्र " को फैलाने के प्रचार, प्रसार से अपने आप को जुडा दीखाता हो पर वास्तव मेँ, जो एक राष्ट्र प्रमुख ने कहा वही मूलभूत विचार धारा, कई सारे मुद्दोँ पर भी लागु होती है
-याद है क्या आपको, जो " गौ-बालक " [ COW -BOY ] टेक्सास के निवासी, राष्ट्रपति ने कहा था ?
" अगर आप हमारे साथ नहीँ हैँ, तब आप,हमारे, विपक्ष मेँ हैँ"
यही बात " ओस्कर" के साथ भी है
- हमारे अभिनेता / निर्माता निर्देशकोँ/ सँगीतज्ञ / इत्यादी का कुसूर
कम मात्रा मेँ है
-कई अभिनेता हिन्दी के बजाय, अँग्रेजी मेँ बोलते नजर आते हैँ
-सार्वजनिक माध्यमोँ के उपकरणोँ से प्रसारित होनेवाले ,
उनके साक्षात्कारोँ मेँ !!

हाँ, हिन्दी का आग्रह, उचित है ---
( & Now -- Regarding this observation ) :

" भाषा की इज्जत नही करना है जिस भाषा में वो फिल्म बनी है। अगर हिन्दी फिल्मों के कलाकार ही फिल्म के डायलॉग भर बोल के इति समझ लेंगे तो हम कैसे दूसरे विदेशियों से ये आशा करें की वो इन फिल्मो को देखेंगे ही। "(तरुण) -पर ये ना भूलेँ हम की, भारत की राष्ट्र भाषा अवशय हिन्दी हो,
दूसरे प्राँतोँ की भाषाएँ भी अपना उतना ही महत्त्व रखतीँ हैँ
- जैसे, बाँग्ला, तमिल, कन्नड, या फिर मराठी या गुजराती --
-" ऑस्कर" व उसके " तमगे " या "तोहफे" = "Awarda" --अमरीकन वर्चस्व को कायम रखने मेँ कोई कसर बाकी नहीँ रखता --
--अगर भारतीय फिल्म ऐसी हो, जो भारत को दकियानूसी, रुढीवादी , पुरातनपँथी बता रही हो, जैसे दीपा मेहता जी की,"वोटर" या (सत्यजीत रे की पुरानी फील्म, " पाथेर पँचाली" तो,
उसे अवश्य "तेज केँद्र मेँ चुँधियाती रोशनी " = मतलब " लाइम लाईट" मेँ खडा कर के ऐवोर्ड से नवाजा जाता रहा है

--" देवदास" = नई , उसके गीत सँगीत, आम अमरीकी " मस्तिक्ष प्रवाह" = " वेव लेन्थ" से अलग है -
- भारतीय सँस्कृति, हमारी जड से फूली, कोँपलोँ से सिँचित वृक्ष है -
जिसकी छाया भारतीय, मानस के अनुरुप है
-उसी तरह, अमरीका का अपना अलग रोजमर्रा का जीवन है जिस के आयाम, उसके सँगीत, रहन सहन, प्रथाएँ , त्योहार, जीवन शैली सभी मेँ प्रत्यक्ष होते हैँ
-- ये कहना, शायद उन सभी को बुरा भी लग सकता है कि, जब तक आप अमरीका आकर, एक लँबी अवधि तक ना रहेँ, आप इस देश को अच्छी तरह पहचान नहीँ पाते !
- पर मैँ जो कह रही हूँ वो है बिलकुल सच!
अमरीकन " छाया चित्रोँ " = ( फिल्मोँ ) पर यहूदी कौम की गहरी पकड है -- दूसरी यूरोप की कई नस्लेँ, जातियाँ भी प्रतिनिधित्व रखतीँ हैँ
-ज्यादातर, वे जुडाओ, क्रिस्चीयन, ऐँग्लो ~ सेक्सकन, प्रोटेस्टेँट प्रणाली से सँबँधित होते हैँ
-और उन्हीँ का वर्चस्व रहे, उनके विचारोँ का बाहुल्य, व बहुमत रहे उस बारे मेँ वे सजग व, प्रयत्नशील रहते हैँ
-इस दशा मेँ " भारत को बहोत ज्यादा ऊँचाई मिले " = ग्लैमरस " वैसी छवि दीखलाने मेँ उन्हेँ क्यूँ रस रहेगा?

भारत के साथ १ अबज भारतीय हैँ - विदेश मेँ बसे भी असँख्य भारतीय मूल के दर्शक हैँ जो बडे ही चाव से, आजकल बन रही नई , आधुनिक फिल्मेँ देखते हैँ --कम मात्रा मेँ विदेशी भी, कौतुहल या जिज्ञासा वस, कभी कभार , भारतीय फिल्मेँ देख लेते हैँ
- अच्छी फिल्मेँ जैसे किसी भारतीय को पसँद आतीँ हैँ उसी तरह, विदेशी शख्स को भी पसँद आतीँ हैँ - परँतु, आज भी उतनी लोक प्रियता विशुध्ध हिन्दी फिल्मोँ को नहीँ मिलती जितना कि, होलीवुड प्रेषित फिल्मोँ को !

--- ये होलीवुड का व्यावसायिक सफल तँत्र , प्रचार -प्रसार की सशक्त विधा, किसी भी आयु के दर्शक को जिसे दर्शक पसँद करे उसी को परोस कर, मँत्र मुग्ध करने की परम चेष्टा, प्रबल आकर्षण पैदा करने के सारे हथकँडे अपनाने का रवैया ये कई बातेँ "खाद= फर्टीलाइजर" सा काम करतीँ हैँ

-- इन सरी बातॉम मेँ " होलीवुड" सिध्ध हस्त" है -- बिलकुल उसी तरह जैसे - भारत , सदीयोँ से, कई सारे शुध्ध इत्तर का निकास करता आया है परँतु, जो वित्तीय व व्यापारीक सफलता फ्रान्स ने हासिल की है, पर्फुम बन्नने व उन्हेँ बेचकर अबजोँ की तादाद मेँ नफा कमाने की, वो भारत क्यूँ हासिल नहीँ कर पाया आज तक? पेरिस मेँ बनी इत्र की शीशीयोँ मेँ नकली इत्र भरकर बेचने से मुनाफा कमाने की नकलची बँदर वाली हमारी सोच हम क्यूँ नहीँ बदल सके ??

शायद, आज भारत जाग गया है --

कई सफल व्यापार आज आगे आ रहे हैँ तो भविष्य मेँ हम सभी इस तरह की चुनौतीयोँ को स्वीकार के, अपने को सफल सिध्ध कर पायेँगे --
दूसरा मुद्दा है कि,


" फैशन की गुडियों की दौड में बहुत कुछ हासिल कर लिया। " "(तरुण) ~~~

उसके बारे मेँ यूँ सोचिये कि, सबसे ज्यादा सिगरेट का उत्पादन करने वाला अमरीका " देश खुद अपने शहेरोँ मेँ + जीवन मेँ " धूम्रपान" के विरुध्ध प्रचार करता है -

- अपने मकानोँ से "धूम्रपान" हटाकर , कानूनन अवैध घोषित कर, अपने मकानोँ, रेस्तराँ, दफ्तरोँ को धूम्रपान से मुक्त कर उन्हेँ " ग्रीन ज़ोन" कहलाने मेँ फख्र महसूस करता है -- तो दूसरी तरफ, इँडोनेशिया, भारत या चीन इत्यादी मेँ जोश खरोश के साथ, इसी दूषण को फैलाने मेँ बिलकुल सँकोच नहीँ इनके व्यापारीयोँ को ..... जिसे सरकार भी अनदेखा कर देती है !!

-- खैर! समूचे विश्व को सुधारने की जिम्मेवारी भला अमरीका क्यूँ अपने माथे ले ??
क्या इतना कम नहीँ कि सारी दुनिया की "पुलिस" बन कर वह "सुरक्षा " के सामान मुहैया करवाती है ?? ;-)

इसी भाँति, "रेवेलोन" "ऐवोन" -- "ऐस्टी लोडर" जैसी सौँदर्य उत्पादन सँस्थाएँ करोडोँ डोलर का मुनाफा करतीँ हैँ बल्के, उसे द्वीगुणीत करतीँ हैँ -- चारगुना बढातीँ हैँ --- जब भारत्त्य सुँदरी, " विश्व सुँदरी" घोषित होती हैँ !!
भारत के बडे शहरोँ से विस्तरीत होकर सौँदर्य प्रसाधनोँ की लालसा और माँग छोटे शहरोँ की बस्तीयोँ पार कर, कस्बोँ या गाँवोँ तक फैल जाती है और तब भी कहा जाता है कि, "भारत का मध्यम वर्ग" जाग गया है

और आय बढने से खर्च की क्षमता बढी है !!

-- तो अमरीकी सौँदर्य प्रसाधन बनानेवाली कँपनी भी क्यूँ ना हिस्सा लेँ ??

और सौँदर्य प्रतियोगिता आयोजनोँ से क्यूँ ना मुनाफा व सेँध लगाकर प्रवेश किया जाये उन बाजारोँ मेँ व प्रदेशोँ मेँ, जहाँ आज तक प्रवेश नहीँ मिला ??

मुझे अचरज इसी बात का है कि, भारत का हर क्षेत्र क्यूँ "अमरीकन समाज प्रणाली " का अँधा अनुकरण कर, अपने को " आधुनिक" कहलवाने की कोशिश मेँ लगा, ये भूल रहा है कि, भारत दुनिया के पूर्वी गोलार्ध मेँ है जहाँ से सूर्य पस्चिम गोलार्ध को प्रकाशित करता है

-- एक काल , एक फूल, एक समय नहीँ खिलता !!
-- हर देश की सँस्क़ृति उसे अपनी जड से जोडे रखे तभी वह मजबूत होकर पनपती है
-- ना कि दूसरे से उधार ली गई सोच या समझ !!

इसलिये, भारत की समझदार , शिक्षित प्रजा से मैँ विनम्र प्रार्थना करुँगी कि,

वे अपना योगदान देते रहेँ -- अपनी जडोँ के प्रति निष्ठा से अपना "जल रुपी " " अर्घ्य " चढाते रहेँ !
जिससे एक शक्तिशाली भारत, विश्व के सामने, अपनी प्राचीन सँस्कृति के साथ साथ, आधुनिक कार्य क्षमता के बूते पर, एक सशक्त व सफल राष्ट्र का उज्ज्वल दृष्टाँत बन कर दीखला सके !!

यही मेरे सपनोँ का भावी भारत होगा !!

जिसे मेरे कोटी कोटी प्रणाम !!


--लावण्या





झूलणी : ~


राधे सँग सखी लालाजी, झूला झूलेँ हो!
तेरो कौन बने बनमाली, मुरलिया सोहत हो!
मुरली माँगन आयी राधे,तू ने ना कह दी !
स्याम बजाये बाँसुरिया, सुध बुध राधे,बिसराये हो!
राधे चलीँ सँग लेकर नारी, झूला झूलन हो!
झूले पर झाँझरिया बाजे, राधे झूलन लागी हो!
स्याम बजाये बाँसुरिया, सुध बुध राधे बिसराये हो!
राधे झूलत, कान्हा झूलत, दोनोँ झूलन लागैँ हो!

--लावण्या